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गुरुवार, अक्तूबर 07, 2010

त्रासदी : जो खो गया वो ख़ाब था

क्या हसीं शरीके-हयात थी,
क्या चुलबुली सी रात थी।
क्या फूलोँ की बारात थी,
ये कल की ही तो बात थी॥

वो हसीन लम्हा कहाँ गया?
वो हसीन रातें कहाँ गयीं?
वो हसीन साथी कहाँ गया?
वो हसीन बातें कहाँ गयीं?

शोला उठा इक फ़र्श से,
सब कुछ उसी में जल गया;
इक ख़ून की दरिया बही,
बाकी भी उसमें गल गया।

ग़ाफ़िल न हो यूँ ग़मजदा,
जो खो गया वो ख़ाब था;
ना तब रहा, ना अब रहा,
वो कब रहा? वो सराब था॥
                                      -ghafil

7 टिप्‍पणियां:

  1. ग़ाफ़िल न हो यूँ ग़मजदा,
    जो खो गया वो ख़ाब था;
    ना तब रहा, ना अब रहा,
    वो कब रहा? वो सराब था॥
    बहुत दर्द भरी प्रस्तुति ।

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  2. त्रासद स्थिति का एक भावपूर्ण एहसास

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  3. ग़ाफ़िल न हो यूँ ग़मजदा,
    जो खो गया वो ख़ाब था;
    ना तब रहा, ना अब रहा,
    वो कब रहा? वो सराब था॥

    भले ही ख्वाब खो जाय, वह संकेत होता है, एक आधार होता है, ब्लू प्रिंट सा होता है; अगला कदम बढाने का. बेहतर होगा उस सकारात्मक, मनोरम ख्वाब की पूर्ति के लिए प्रयासरत हुआ जाय.

    तर्ज, धुन और अहसास वास्तव में दिल को फोड़ कर छलक पड़े हैं. मर्म स्पर्शी गजल. आभार इस प्रस्तुति के लिए.

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  4. ग़ाफ़िल न हो यूँ ग़मजदा,
    जो खो गया वो ख़ाब था;
    ना तब रहा, ना अब रहा,
    वो कब रहा? वो सराब था॥
    काव्यात्मक सौन्दर्य और नाद से भर पूर रचना .
    जो चला गया उसे भूल जा वो न खाब था न करार था .

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  5. आह से निकला होगा गान !!! जगत मिथ्या का अहसास !!
    करुण कविता !! जन जन की कहानी !!

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