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गुरुवार, अक्तूबर 07, 2010

त्रासदी : जो खो गया वो ख़ाब था

क्या हसीं शरीके-हयात थी,
क्या चुलबुली सी रात थी।
क्या फूलोँ की बारात थी,
ये कल की ही तो बात थी॥

वो हसीन लम्हा कहाँ गया?
वो हसीन रातें कहाँ गयीं?
वो हसीन साथी कहाँ गया?
वो हसीन बातें कहाँ गयीं?

शोला उठा इक फ़र्श से,
सब कुछ उसी में जल गया;
इक ख़ून की दरिया बही,
बाकी भी उसमें गल गया।

ग़ाफ़िल न हो यूँ ग़मजदा,
जो खो गया वो ख़ाब था;
ना तब रहा, ना अब रहा,
वो कब रहा? वो सराब था॥
                                      -ghafil

बुधवार, अक्तूबर 06, 2010

सुबरन गिरि बेकार

एक ऐसी रचना जो सहज ही रीतिकाल की सैर करा दे-

पीनपयोधर प्रबलतम, तन्वी तन का सार।
तासु तुलन मा जानिए, सुबरन गिरि बेकार॥
सुबरन-गिरि बेकार, सदा सबका भरमावै;
रहै कल्पना मध्य, हाथ तँह पहुँचि न पावै।
'ग़ाफ़िल' नैन निहाल, निरखि कुच रचना सुन्दर;
साहस कर कर बढ़ै, हाथ मँह पीनपयोधर॥
                                                                  -ghafil

बेचारा सीबी बाबू

पुस्तकालय-कार्यालयी समस्याओँ से सन्दर्भित प्रस्तुत रचना, सीबी बाबू का 'ग़ाफ़िल' होने से पूर्व की है।
रचना-
बाबू सीबी व्यथित मन, करै किताबी बाँट।
सीत-सरद, गरमी-गरम, मिला पत्थरी पाट॥
मिला पत्थरी पाट, पूर्णत: धूल-धूसरित;
स्वसन गर्द-परिपूर्ण, बाल राखी से विलसित।
उदासीन अफ़सर, हो गर्दा कैसे काबू;
सिर धुनता पछिताय, बेचारा सीबी बाबू॥
                                                              -ghafil