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रविवार, दिसंबर 25, 2011

कस्म गोया तेरी खायी न गयी

दिल से तस्वीर मिटायी न गयी।
याद तेरी थी भुलायी न गयी।।

ज़ीनते-गुफ़्तगू हो जाती बस
बात बाक़द्र चलायी न गयी।

खोजता रह गया ता’उम्र जिसे,
वह खुशी हमसे तो पायी न गयी।

खा लिया मैंने बादे-ज़िन्दाँ भी,
कस्म गोया तेरी खायी न गयी।

नज़्रे-आतिशे-तग़ाफ़ुले-जाना
दिल की दुनिया थी, बचायी न गयी।

बढ़के पल्लू को थाम लेने की,
रस्म ग़ाफ़िल से निभायी न गयी।।
(ज़ीनते-गुफ़्तगू=गफ़्तगू की रौनक़, बादे-ज़िन्दाँ=ज़ेल की हवा, नज़्रे-आतिशे-तग़ाफ़ुले-जाना=प्रेमिका की उपेक्षा की आग के हवाले)
                                                               -ग़ाफ़िल 

सोमवार, दिसंबर 05, 2011

शब है तारीक अभी

शब है तारीक अभी, माहताब भी होगा।
मेरी इस बज़्म का आख़िर शबाब भी होगा।।

चाँद कब तक छिपेगा अब्र की पहरेदारी,
एक झोंके मे ही वह बेनक़ाब भी होगा।

तू यार! ख़ुश रहे, भले मेरे रक़ीब के साथ,
मगर ख़्याल रहे के अज़ाब भी होगा।

हुए तबाह तेरे नेक इरादों के सबब,
नहीं हैं दूर वो दिन इन्क़िलाब भी होगा।

जो गिनता रहता है ग़ाफ़िल की हमेशा ग़फ़लत,
ग़फ़लतों का तेरी मौला! हिसाब भी होगा।।

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, नवंबर 08, 2011

चिकनी राह बुलाए गाफिल!

मन का घोड़ा बाँध रखा था, छोड़ा नहीं मचलने को।
पानी सर से ऊपर है, अब मौका नहीं सँभलने को॥

चाँद रहा है मिसाल हरदम रुखे-माहपारावों का,
हम हैं के आमादा उसको पावों तले कुचलने को।

आता भी है जाता भी है दुनिया का हर एक बसर,
भरम है तेरा लगा हुआ जो यह दस्तूर बदलने को।

यह तो तेरी रह का एक पड़ाव है यार! नहीं मंजिल,
हुआ बहुत आराम, हो अब तैयार भी आगे चलने को।

फ़ित्रत है तो चलते रहना मज़्बूरी सी है गोया
चिकनी राह बुलाए ग़ाफ़िल अपनी सिम्त फिसलने को।

बुधवार, अक्तूबर 12, 2011

आयी न क्या हुआ है

मेरे पास वो अदा से आयी न क्या हुआ है?
मेरी बोल उसके मन को भायी न क्या हुआ है?

कितनी ही तमन्ना से इक गीत मैं रचा था,
वह गीत अब तलक वो गायी न क्या हुआ है?

ये हुस्न वाले सारे क़स्में हैं सारी खाते,
वो एक भी क़सम तो खायी न क्या हुआ है?

'तेरे पास-पास रहना मेरी ज़िन्दगी का मक़सद',
यह बात वो भी लब पे लायी न क्या हुआ है?

गुज़रा है जब भी 'ग़ाफ़िल' शीशे के सामने से,
पूछा है आइना, वो आयी न क्या हुआ है?

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, सितंबर 15, 2011

जज्बात भी रूमानी है


मदभरी रात है जज्बात भी रूमानी है।
सामने छत पे मचलती हुई जवानी है॥


जिस्म बलखाए तो नागन को शरम आ जाये,
लट जो लहराये तो काली घटा सी छा जाये,
आँख में नाचती जैसे शराब की मस्ती,
किसी की याद में खोई वो रातरानी है॥


मन के आँगन में खुली फिर से नई मधुशाला,
ख़ुम* का इतराव नया, फिर से नई मधुबाला,
दौर चलता रहे और साकी तेरा साथ रहे,
आज पूरी भी हो जो चाह इक पुरानी है॥


ऐ बहारों मेरे जज्बात पे तरस खावो,
ऐ नज़ारों मेरे हालात पे तरस खावो,
इस भरे जाम में साकी की नज़र खँजर सी,
मेरे ही साथ ये अक्सर हुई कहानी है॥


बहक रहे हैं क़दम हर अदा बहक सी रही,
बहक रही है जुबाँ हर सदा बहक सी रही,
तू भी ग़ाफ़िल बहक के होश न आए फिर से,
मौक़ा-ए-जश्न है और जश्न-ए-जवानी है॥


* खुम=वह बड़ा घड़ा जिसमें शराब स्टोर होती है। उसी में से सुराही में निकाल कर फिर पैमानो में ढाल कर पेश की जाती है।
                                                                                -ग़ाफ़िल

रविवार, सितंबर 11, 2011

कहैं सब गालोबीबी

गालोबीबी जो दिखी, तरुन नयन की भ्रान्ति।
रहकर परदूसित जगह, बिगड़ गई मुँह कान्ति॥
बिगड़ि गई मुँह कान्ति, रहा ना कहीं ठिकाना;
घरमा हो या घर के बाहर, हुआ बेगाना।
ग़ाफ़िल कैसे समझाए की क्या है ख़ूबी?
मुँह मा दोहरा भरा कहैं सब गालोबीबी॥

(इस रचना का उत्स, मेरे एक अभिन्न मित्र, जो कभी अपने को 'तरुन' कहलाने की मशक्कत में थे, का मेरे लिए इस सवाल कि- 'तुम बोलते क्यों नहीं! गालोबीबी हुई है क्या?' में निहित है। गालोबीबी= मेरे शुभचिन्तक सुधीजनो गालोबीबी एक प्रकार का गले का रोग होता है जो इन्फैक्शन से हो जाता है। इसमें गले पर सूजन आ जाती है आदमी न तो खा सकता है और न ही बोल सकता है। फीवर भी हो जाता है और आदमी कमजोरतर होता जाता है। यह वायरल बीमारी है जिसके लिए हार्ड एंटीबॉयोटिक लेनी पड़ती है। तब जाकर बहुत झेलाने के बाद कहीं ठीक होता है। मेरे अंचल में इस बीमारी को गालोबीबी कहा जाता है हो सकता है अन्यत्र इसे और कुछ कहा जाता हो। इसकी व्याख्या इस लिए करनी पड़ रही है कि हमारे बहुत से शुभचिन्तक इसके बारे में जानते ही नहीं या जानते भी हों तो किसी और नाम से।)
                                                                                   -ग़ाफ़िल

शनिवार, सितंबर 10, 2011

सौदा हरजाने का है

साथियों! फिर प्रस्तुत कर रहा हूँ एक पुरानी रचना, तब की जब 'बेनज़ीर' की हत्या हुई थी; शायद आप सुधीजन को रास आये-

उनके पा जाने का है ना इनका खो जाने का है।
पाकर खोना, खोकर पाना, सौदा हरजाने का है॥

तिहीदिली वो ठाट निराला दौलतख़ाने वालों का,
तहेदिली वो उजड़ा आलम इस ग़रीबख़ाने का है।

एक दफ़ा जो उनके घर पे गाज गिरी तो जग हल्ला,
किसको ग़म यूँ बेनज़ीर के हरदम मर जाने का है।

वो चाहे जो कुछ भी कह दें ब्रह्मवाक्य हो जाता है,
पूरा लफड़ा तस्लीमा के सच-सच कह जाने का है।

शाम-सहर के सूरज से भी सीख जरा ले ले ग़ाफ़िल!
उत्स है प्राची, अस्त प्रतीची बाकी भरमाने का है॥

(तिहीदिली=हृदय की रिक्तता, तहेदिली=सहृदयता)
                                                                             -ग़ाफ़िल

रविवार, सितंबर 04, 2011

बलमुआ लउटि चलौ वहि ठाँव


बलमुआ लउटि चलौ वहि ठाँव,
सबसे सुन्नर, बहुत पियारा बाटै आपन गाँव।
                                                  बलमुआ लउटि चलौ...
बीते राति सबेरा होई, चिरइन कै कलराँव,
यहि ठौं दिनवा रतियै लागै, घाम कहाँ? कहँ छाँव?
                                                  बलमुआ लउटि चलौ...
बिछुड़ि गये सब टोल-पड़ोसी, बिछुड़ि गयीं गऊ माँ,
वह नदिया, वह नदी-नहावन, वह निबरू की नाँव।
                                                  बलमुआ लउटि चलौ...
मोरि मुनरकी सखिया छूटलि, केहि सँग साँझ बिताँव?
ग़ाफ़िल छोट देवरवउ छूटल, अब काको हरचाँव।
                                                  बलमुआ लउटि चलौ...
                                                                                      -ग़ाफ़िल

गुरुवार, सितंबर 01, 2011

उसका भी फ़ैसला है

ऐ हुस्न तुझे इश्क़ का पता ही नहीं है।
पेश आया भी जैसे के कुछ हुआ ही नहीं है।।

उसका भी फ़ैसला है याँ दरबारे-हुस्न में,
जिस इश्क़ की कभी कोई ख़ता ही नहीं है।

तड़पे है तेरे ज़ेरे-क़दम इश्क़ बेतरह,
और तू कहे के ये तो कुछ सज़ा ही नहीं है।

ग़ाफ़िल को ना ग़ुमान था याँ के रिवाज़ का,
सब कुछ है यहाँ एक बस वफ़ा ही नहीं है।।

                                            -ग़ाफ़िल

सोमवार, अगस्त 29, 2011

हँसके मेरे क़रीब आओ तो

फिर भले रस्म ही निभाओ तो
हँसके मेरे क़रीब आओ तो

इक पड़ी चीज़ जो मिली तुमको
मेरा गुम दिल न हो दिखाओ तो!

आईना आपकी करे तारीफ़
यार अपना नक़ाब उठाओ तो

तुमको मानूँ मैं आगजन असली
आग दिल में अगर लगाओ तो!

दिल है नाशाद ये भी कम है क्या
जो कहे हो के क़स्म खाओ तो

यूँ भी क्या रूठना है ग़ाफ़िल से
एक अर्सा हुआ सताओ तो

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, अगस्त 26, 2011

एक ग़ाफ़िल भी पायमाल हुआ

जो बरतर था वो फटा हाल हुआ।
जो बदतर था वो बे-मिसाल हुआ॥

सिफ़र जबाब मिला हर सू से,
मेरी उल्फ़त का जो सवाल हुआ।

अन्दलीबों तेरा चहकना भी
रास आया ना, फिर बवाल हुआ।

नुमाइश आबरू की हर जानिब,
ये नज़ारा भी क्या कमाल हुआ।

हश्र दीवानगी का देखो तो,
एक ग़ाफ़िल भी पायमाल हुआ।

(सू=तरफ़, सिफ़र=शून्य, अन्दलीब=बुलबुल, ज़ानिब=तरफ़, हश्र=बुरा परिणाम,पायमाल=असमर्थ)
                                                    -ग़ाफ़िल

मंगलवार, अगस्त 23, 2011

मंजिल वही पुरानी है

नयी है राह पर मंजिल वही पुरानी है।
फिर नये ज़िल्द में लिपटी वही कहानी है॥

इक नये रूप में गिरधर भी वही है यारों,
नये लिबास में मीरा वही दीवानी है।

नया सा सुर तो है, सरगम वही पुराना है,
नयी सी ताल पर नचती वही जवानी है।

यह शबे-वस्ल भी ग़ाफ़िल! है मुख़्तसर ही हुई,
मनचली सहर ने की फिर वही नादानी है।

(शबे-वस्ल=मिलन की रात, मुख़्तसर=संक्षिप्त, सहर=सुबह)
                                                             -ग़ाफ़िल

मंगलवार, अगस्त 16, 2011

एक 'ग़ाफ़िल' से मुलाक़ात याँ पे हो के न हो

यार तेरी वो मुआसात याँ पे हो के न हो।
फिर सुहानी वो हसीं रात याँ पे हो के न हो॥

ऐसी ख़्वाहिश के रहे चाँद भी इन क़दमो में,
आबे- हैवाँ की फिर बरसात याँ पे हो के न हो।

अंदलीबों यूँ ख़िज़ाओं में ना रहो गुम- सुम,
फिर बहारों की करामात याँ पे हो के न हो।

सुर्ख़ लब के निशाँ हैं या के ख़ूँ अरमानों के,
जी डरे, फिर से इख़्तिलात याँ पे हो के न हो।

लोग अश्क़ों को भी आँखों में छुपा लेते हैं,
फिर तो गौहर का इख़्राजात याँ पे हो के न हो।

मुझ सा नादाँ भी यहाँ अफलातूँ से ना कमतर,
एक ‘ग़ाफ़िल’ से मुलाक़ात याँ पे हो के न हो॥ 

(मुआसात= मिह्रबानी, आबे- हैवाँ= अमृत, इख़्तिलात= चुम्बन- आलिँगन, गौहर= मोती, इख़्राजात= जोड़- घटाव)

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गुरुवार, अगस्त 11, 2011

सजनवा तू भी तो कुछ बोल


(मौन की महिमा तो निराली है ही किन्तु समय पर न बोलना भी कितना घातक हो जाता है यह बात सहज स्वीकार्य है। मेरी यह प्रविष्टि इससे पूर्व की प्रविष्टि ‘मौन-महिमा’ पर आई तमाम ऐसी प्रतिक्रियाओं, जिससे प्रतिक्रियाकर्ता के मौन साधने का उपक्रम ज़ाहिर होता है, का प्रतिफलन है)

सजनवा तू भी तो कुछ बोल,
तू क्यूँ होके मौन है बैठा, बोल न मिलती मोल।
                                                                सजनवा तू भी...
देख तो यह जग बोल रहा है, अपनी-अपनी खोल रहा है,
कुछ तेरे भी मन में होगा, मन की गाँठें खोल।
                                                               सजनवा तू भी...
ना बोला तो जग बोलेगा, इस दुनिया में बिस घोलेगा,
अब ललकार दे बाचालों को, अब बतियाँ ना तोल।
                                                                सजनवा तू भी...

ग़ाफ़िल! ओंठ खुलें अब तेरे, लघुता-मरजादा के घेरे
कब तक बाँध रखेंगे तुझको, अब ये बन्धन खोल।
                                                                सजनवा तू भी...
                                                                                     -ग़ाफ़िल

मंगलवार, अगस्त 09, 2011

मौन-महिमा

(कई दिनों से ब्लॉग जगत 'मौन' पर कुछ ज्यादा ही मुखर हो गया है। सो सोचा कि मैं यदि मौन रहा तो इसे मेरी धृष्टता न मान ली जाय अतः लिख डाली मौन-महिमा पर कुछ लाइनें फटाफट। मौका-बेमौका अग़र आप इन्हें अमल में ले आएं तो शर्तिया बल्ले-बल्ले)

पेश है सूरते-हाल पर क़ाबिले-आजमाइश नुस्ख़ा 'मौन'

भाई यहि संसार महं, मौन मूल है जानि!
अवगुन जादा बोलना, मौन गुनन करि खानि॥
मौन गुनन करि खानि, सहज अग्यान छिपावै;
सन्मुख हों सुरसती, मौन तिनहुंक भरमावै।
'ग़ाफ़िल' कहैं अगर कटुभाषिनि मिलै लुगाई,
मौन बरत को साधि मस्त ह्वै रहिये भाई॥

एक बात और-
ग़ाफ़िल हूँ मेरी बात हँसी में उड़ाइए, ख़ुद पे यक़ीन हो तो मुस्कुराइए ज़नाब!
                                                                    -ग़ाफ़िल

सोमवार, अगस्त 08, 2011

शोले को नहाते देखा

हाय मैंने जो कभी उसको लजाते देखा
खंज़रे चश्म को हाथों से छुपाते देखा

डसके बलखाती हुई कौन गयी नागन इक
होश हँसते हुए इस दिल को गँवाते देखा

ग़ुस्लख़ाने के दरीचों से लपट का भभका
जाके जो देखा तो शोले को नहाते देखा

लोग मानेंगे नहीं फिर भी बता देता हूँ
आज शब् चाँद को मैं नींद चुराते देखा

तेरी ही मिस्ल हुई जा रही क़ुद्रत ग़ाफ़िल
बिजलियाँ ज़ुल्फ़ों को ही दिल पे गिराते देखा

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, अगस्त 07, 2011

आज ख़ुश हूँ बहुत

आज ख़ुश हूँ बहुत, उनका ख़त आ गया,
सूनी बगिया में फिर से बहार आ गयी।
थी उमस से भरी, चिपचिपी दुपहरी,
भीगे सावन सी ठंढी फुहार आ गयी॥


मैं तड़पता रहा धूप में रेत पर,
वो मचलते रहे लहलहे खेत पर,
यक-ब-यक जाने कैसा है जादू हुआ,
इस तपन में बसन्ती बयार आ गयी।


लोग समझें न इस ख़त के मजमून को,
मैं समझता हूँ स्याही की हर बून को,
धूल से कैस की फिर इबारत उड़ी,
यार के वास्ते बन पुकार आ गयी।


किस क़दर तू है 'ग़ाफ़िल' अनाड़ी निरा,
तीर तरकश से जाकर कहाँ पे गिरा,
चाक कर डाला जो उनका नाज़ुक ज़िग़र,
तेरे लहजे मे कैसे वो धार आ गयी॥
                                                         -'ग़ाफ़िल'

शुक्रवार, अगस्त 05, 2011

आग लगायी लोगों ने

मेरी झिलमिल सी रातों में आग लगाई लोगों ने
मेरी बर्बादी की कैसे हँसी उड़ाई लोगों ने

मेरे बचपन का साथी था एक खिलौना छूट गया
अब तक उससे खेल रहा था नज़र लगाई लोगों ने

अपनी अपनी किस्मत है ये बाग़ संवारा हमने ही
पतझड़ मेरे हिस्से आया मौज मनाई लोगों ने

ग़ाफ़िल उलझा है गुलाब के काँटो भरे छलावे में
दामन उसका चिन्दी चिन्दी ख़ुश्बू पाई लोगों ने

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, अगस्त 03, 2011

जो तोड़ी गयी है वो नाज़ुक कली है

तेरे सिम्त सजती हैं बज़्मे-बहाराँ,
मेरे सू तो मेरी ही शैदादिली है।
तुझे हो मुबारक़ जमाने की रँगत,
ता'हद्दे-नज़र मेरे स्याही खिली है॥

नयी क़ैफ़ियत ये नये दौर की है,
तिहीदस्ती फ़ैय्याज़ों में जोर की है।
समन्दर के दर पे भी जा करके देखा,
मेरी प्यास उससे कहीं भी भली है॥

वो ताबानी सूरज की बदली में गुम है,
चमक चाँदनी की भी जुगुनू से कम है।
हैं दरिया की लहरें सराबी-शिगूफा,
सज़र भी हैं मुफ़लिस, हवा बद चली है॥

गया सूख बेवक़्त आँखों का पानी,
नहीं गीत में भी है कोई रवानी।
छमक भी है गायब सभी पायलों से,
पड़ी आज सूनी सी सुर की गली है॥

अगन ने जलाया मेरा आशियाना,
ग़ाफ़िल भी है आज कैसा बेगाना।
हरी वादियों का हुआ रंग खूनी,
चिता आल की सबसे पहले जली है॥

हुई किस क़दर रात चोरी यहाँ पे,
बता चाँद सबकी है ख़ूबी कहाँ पे।
जो गुल ख़ूबसूरत तो ख़ुश्बू जुदा है,
जो तोड़ी गयी है वो नाज़ुक कली है॥

(सू=तरफ़, तिहीदस्ती=हाथ का खालीपन, फ़ैयाज=दानी, सराबी-शिगूफ़ा=मृगमरीचिका जैसा भ्रम, आल=नाती,पोते)
                                                                            -‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, अगस्त 02, 2011

क्या बताऊँ के क्या ग़ज़ब देखा

आँख भर मैंने तुझको जब देखा।
क्या बताऊँ के क्या ग़ज़ब देखा॥

दिल भी धड़का है, ओंठ भी मचले,
मैंने जो यह तेरा ग़बब देखा।

लाम से ग़ेसुओं की गुस्ताख़ी,
तेरे रुख़सार का करब देखा।

ये ख़ुदकुशी है या अदा-क़ातिल,
के चमिश में भी इक अदब देखा।

दिल मेरा तेरी कमाने-अब्रू,
और न मौत का सबब देखा।

तीर आकर जिगर के पार हुआ,
हाय! 'ग़ाफ़िल' ने उसको तब देखा।

( ग़बब=ठुड्ढ़ी के नीचे का मासल भाग, क़रब=बेचैन होना, बेचैनी, दुःखी होना
चमिश=लचक, इठलाहट )
                                    -'ग़ाफ़िल'

रविवार, जुलाई 31, 2011

'बच्चन' जी की 'मधुशाला' पर दो शब्द अपने भी

ये पंक्तियां आदरणीय बच्चन जी की कालजयी रचना "मधुशाला" पढ़ने के बाद उसकी मशहूर रूबाईयों पर प्रतिक्रिया स्वरूप लिखी थीं कभी उन्हीं की रवानी में, लगभग उन्हीं के शब्दों को प्रयुक्त करते हुए, जिससे पता चले कि किस रूबाई पर प्रतिक्रिया है। यदि आप मधुशाला कायदे से पढ़े होंगे तो अवश्य सम्यक् रूप से समझ जाएंगे। इसे अब पोस्ट कर रहा हूँ। जिन महानुभाव को इन पंक्तियों से इत्तिफ़ाक न हो उनसे मुआफ़ी चाहूँगा। कृपया इसे अन्यथा न लेंगे। -ग़ाफ़िल


1-
हर्ष विकम्पित कर में लेकर, मद्यप झूम रहा प्याला,
क्षीण वसन, उन्नत उरोज, कृश लंक, मचलती मधुबाला।
जलतरंग को मात दे रही, मधु-प्याले की मधुर खनक;
मधु सौरभ से महक रही, मदमस्त नशीली मधुशाला॥


2-
किन्तु जाम देने को जब भी, झुकती है साकी बाला,
नयन-अक्श-खंजर से सज्जित, दिखता है मधु का प्याला।
अहो क्रूर दुर्भाग्य! समर्पित मदिरा भी है साकी भी;
पर हाला की धार लपट सी, रोज जलाती मधुशाला॥


3-
जीवन में चालिस बसंत आया और चला गया लाला!
लालायित अधरों से प्रतिदिन जमकरके चूमी हाला।
हाथ पकड़ लज्जित साकी का पास बहुत अब तक खींचा;
फिर भी व्यर्थ सूखती जाती मधुमय जीवन-मधुशाला॥


4-
तब मदिरालय में रौनक थी, बाँका था पीने वाला,
तब संजीवनि सी हाला थी, बाँका था जीने वाला।
मृदु भावों की अंगूर लता जाने कब की है सूख चुकी;
सद्यसुहागिन के सिंगार में फन फैलाये मधुशाला॥


5-
पंडित, मोमिन, पादरियों को ख़ूब रिझायी मधुशाला,
हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई ख़ूब छके पीकर हाला।
यह ग़ाफ़िल भी देख रहा क्या मदहोशी का आलम है।
हे मदिरालय के संस्थापक! तुम्हें मुबारक मधुशाला॥
                                                                       -'ग़ाफ़िल'

शनिवार, जुलाई 30, 2011

और ये पूछते हो के क्या देखते हो

जो हुस्नो-हरम में अज़ा देखते हो।
अरे शेख़ जन्नत कहाँ देखते हो?

निगाहों में तेरी भरम का ये आलम!
हमारी वफ़ा भी जफ़ा देखते हो।

जुनूने-मुहब्बत का ही ज़ोर है जो,
भरी भीड़ में तख़्लिया देखते हो।

भला ऐसी ख़ूबी पे क्यूँ रश्क़ न हो,
जहन्नुम में भी मर्तबा देखते हो।

अभी चश्मे-ग़ाफ़िल खुले भी नहीं हैं,
और ये पूछते हो के क्या देखते हो।

(अज़ा=दुःख, ज़फ़ा=बेवफ़ाई, तख़्लिया=एकान्त, रश्क=प्रतिस्पर्द्धा का भाव, जहन्नुम=नर्क, मर्तबा=प्रतिष्ठा, रुत्बा)

                                                                       -'ग़ाफ़िल'

सोमवार, जुलाई 25, 2011

थे कभी पँखुड़ी गुलाब के से नाज़ुक लब


वो तरन्नुम न रहा और वो तराना न रहा,
साज ऐसा हूँ के अब जिसका बजाना न रहा।

गुल का हर शख़्स हमेशा ही तलबगार रहा,
शाखे- गुल का कोई महफूज ठिकाना न रहा।

थे कभी पँखुड़ी गुलाब के से नाज़ुक लब,
अब तो शोला हैं मीर! अब वो फसाना न रहा।

तू जो कहता है इन्तिजार और कर लूँगा,
वैसे भी क़ब्र पे मेरी तेरा आना न रहा।

'आग इक थी लगी' यह बात याद करने को,
ज़िश्तरूई का मेरे कम तो बहाना न रहा।

ज़ीनते- चश्म वो मेरी है अब कहाँ ग़ाफ़िल?
चश्म के ज़ेरे- असर कोई दीवाना न रहा॥

(ज़िश्तरूई=बदसूरती, ज़ीनते-चश्म=आँखों की रौनक, जेरे-असर=प्रभाव में)
                                                                        -ग़ाफ़िल

मौत का और तो कोई सबब नहीं होता

मौत का और तो कोई सबब नहीं होता।
ग़रचे इक शोख नज़र का ग़जब नहीं होता॥

जब हो मुस्कान की तासीर भी मानिन्दे ज़हर,
फिर तो बह्रे-फ़ना किस ओर, कब नहीं होता?

मेरे जानिब से गुज़रते हैं अज्नबी की तरह,
अब उन्हें इश्क़ में शायद तरब नहीं होता।

हश्र मेरा भी सनम अबके यूँ नहीं होता,
दिल जो गुस्ताख़ यार तेरा तब नहीं होता।

आह को उम्र मिले लाख बे-असर ही रहे,
उसका एहसास किसी दिल को जब नहीं होता।

क़त्ल भी मेरा ही, इल्ज़ाम भी है मेरे सर,
कोई ऐसा भी तो ग़ाफ़िल अज़ब नहीं होता॥
                                                 -ग़ाफ़िल

शनिवार, जुलाई 23, 2011

नफ़्रत ही कोई ढब से निभाये कभी-कभी

तेरे बग़ैर गीत तो गाये कभी-कभी।
पर हर्फ़ कोई छूट सा जाये कभी-कभी॥

मिस्ले-सराय, दिल में तो आये तमाम लोग,
मेह्मान कोई चाँद भी आये कभी-कभी।

'हम तो लिबास में हैं सितारे सजा रहे',
दामन को इस भरम में जलाये कभी-कभी।

तेरे जमाल के सबब अपने हुये रक़ीब,
तन्हा ही जश्ने-मौत मनाये कभी-कभी।

रिश्ते तो मोहब्बत के सभी ज़िश्तरू हुये,
नफ़्रत ही कोई ढब से निभाये कभी-कभी।

है इशरते-सुह्बत-ए-हुस्न किस्मतन अता,
'ग़ाफ़िल' भी क्यूँ न मौज मनाये कभी-कभी॥

(रक़ीब=एक ही प्रेमिका के दो प्रेमी आपस में रक़ीब कहलाते हैं, ज़िश्तरू=बदसूरत, इशरत=खुशी)  
                                                                 -ग़ाफ़िल

गुरुवार, जुलाई 21, 2011

या ख़ुदा याँ पे कोई हमसफ़र नहीं होता

मैं तेरे चश्म के ज़ेरे- असर नहीं होता।
दिल में पेवस्त जो तीरे- नज़र नहीं होता॥

तेरे कूचे की सिफ़त संगज़ार की सी है,
आता अक्सर जो सफ़र पुरख़तर नहीं होता।

क्यूँ जमाने की है इस मिस्ल हौसला-पस्ती,
या ख़ुदा याँ पे कोई हमसफ़र नहीं होता।

शम्अ-ए-हुस्न में मेरी तरह लाखों अख़्ग़र,
रोज जलते हैं मग़र कुछ ज़रर नहीं होता।

मुझको बरबाद किया यह शहर रफ़्ता- रफ़्ता,
गोया इल्जाम कभी इसके सर नहीं होता।

इक नज़र देख ले इस सिम्त भले नफ़्रत से,
यूँ भी ग़ाफ़िल पे मिह्रबाँ क़मर नहीं होता॥

(अख़्गर=पतिंगा, क़मर=चाँद)
                                                              -ग़ाफ़िल

बुधवार, जुलाई 13, 2011

क्यूँ?

क्यूँ अब इस बस्ती में अक्सर हैवान ही पाए जाते हैं?
भोली-भाली सूरत वाले शैतान ही पाए जाते हैं॥

क्यूँ इंसानों की बदहालत बदतर ही होती जाती है?
सतरंगी सपने दिखलाकर नादान नचाए जाते हैं।

उनके मतबख में शाम सरह है गोश्त पके इंसानों का,
सूखी लकड़ी के बदले क्यूँ इंसान जलाये जाते हैं?

क्यूँ ममता रोज़ बिलखती है? क्यूँ भाईचारा मरता है?
इक प्यार की सिसकन के सुर में, क्यूँ गीत सजाये जाते है?

‘ग़ाफ़िल’ यह कैसी अनहोनी यह कैसे बेड़ा ग़र्क़ हुआ
क्यूँ दो कौड़ी की क़ीमत पर ईमान भुनाये जाते हैं?

(मतबख=पाकशाला)

-‘ग़ाफ़िल’                        

शनिवार, जुलाई 02, 2011

चाँदनी भी जलाया करती है

यूँ शबो-रोज़ आया करती है,
याद उसकी रुलाया करती है।
वो मुसाफ़िर हूँ मैं जिसे अक्सर;
चाँदनी भी जलाया करती है।।

मेरे सपनों ने नहीं साथ दिया,
मेरे अपनो ने नहीं हाथ दिया।
दिल में रहकर ही तमन्ना-ए-दिल;
मुझको हरदम सताया करती है।।

मैंने भी आह का असर देखा,
एक भूचाल सा अक्सर देखा।
और देखा कि आह इक पल में;
सल्तनतें मिटाया करती है।

ग़ाफ़िल अब सैफ़ का भी करना क्या,
फ़ज़ूल ग़ैब का भी मरना क्या।
जब सरे-शाम अदा-ए-खंज़र;
शोख चश्मी दिखाया करती है।।

(शबो-रोज़=रात-दिन, सैफ़=तलवार, ग़ैब=परोक्ष, शोख़ चश्मी=चंचल नयनो वाली)
                                                                         -ग़ाफिल

गुरुवार, जून 30, 2011

वो तेरी कब थी दीवानी

फ़ज़ाएं मस्त मदमाती, अदाएं शोख दीवानी।
ये हूरों की सी महफ़िल है नज़ारा है परिस्तानी।।

घनी काली घटाओं में खिला ज्यूँ फूल बिजली का,
घनेरे स्याह बालों में चमकते रुख हैं नूरानी।

कशिश कैसी के बेख़ुद सा चला जाए वहीं पर दिल,
जहाँ ललकारती सागर की हर इक मौज़ तूफ़ानी।

भला ये ज्वार कैसा है नशा-ए-प्यार कैसा है,
हुआ जो ज़ुल्फ़ ज़िन्दाँ में क़तीले-चश्म जिन्दानी।

ऐ ग़ाफ़िल ख़ुद के जन्नत से जहाँ को ख़ुद किया दोज़ख,
हुआ तू जिसका दीवाना वो तेरी कब थी दीवानी।।

(जिन्दाँ=क़ैदख़ाना, क़तीले-चश्म=नज़र से क़त्ल किया गया हो जो, ज़िन्दानी=क़ैदी)

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, जून 27, 2011

वन्दहु सदा तुमहि प्रतिरक्षक

जै जै प्रतिरच्छक जै हे सोक निवारक!
जै हो तुम्हार हे सब नीचन के तारक।

तुम हो त्रिदेव कै रूप बुद्धि-बल खानी,
संग सूरसती लछमी औ रहति भवानी।

सब कहनहार चाहे जौ मुँह मा आवै,
ऊ बतिया चाहे केतनौ का भरमावै।

सब ठीकै है जौनै कुछ तुमहि सुहायी,
पानी पताल से की सरगे से आयी।

तुम आला हाक़िम हौ तुम्हार सब चाकर,
तुम सब केहू कै ईस सरबगुन आगर।

सब कुछ तुम्हकां छाजै जउनै कै डारौ,
मनई का पैदा करौ या मनई मारौ।

ई ग़ाफ़िल मूरख नाय जो अलग नसावै,
सबके साथे मिलि गुन तुम्हार ही गावै।
                                                       -ग़ाफ़िल

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शनिवार, जून 25, 2011

ख़ारों की हिफ़ाज़त लाज़िम

दिल हमारे जिसे हैवान कहा करते हैं।
हम तो उसको भी मिह्रबान कहा करते हैं।।

अब के और आदिमों के बीच फ़र्क़ बेमानी,
जिस्म से हट रहे बनियान कहा करते हैं।

तमाम उम्र परवरिश में गुज़ारी जिनकी,
फूल वे ही हमें नादान कहा करते हैं।

बामुरौवत को यहाँ मात मिली है हरदम,
बेमुरौवत को हमी डॉन कहा करते हैं।

गुलों से बेस्तर ख़ारों की हिफ़ाज़त लाज़िम,
कैक्टस को चमन की शान कहा करते हैं।

कैसी फ़ित्रत के मस्त होकर सो रहा ग़ाफ़िल!
तेरे जैसों को ही बेजान कहा करते हैं।।
                                                           -ग़ाफ़िल

बुधवार, जून 15, 2011

ग़ाफ़िल का ढाबा (चीनी मिल परिसर, बभनान, में हुए कवि सम्मेलन की पुष्पिका)

आइए! हम आपको कविता जिमाते हैं।
हम कविता के पाकशास्त्री हैं,
बड़ी लज़ीज कविता बनाते हैं।।

क्या खाइएगा? वही न! जो हम पकाएंगे,
हम परोसेंगे और आप खाते ही जाएंगे।
क्योंकि हमारे परोसने का अन्दाज है निराला,
कविता भले ही कच्ची हो,

पर मजेदार होगा हर निवाला।।

ये मेरा दावा है कि आप नहीं होंगे बोर,
इत्मिनान रखिए! छन्दों के बर्त्तनों में
होता नहीं है शोर।
ये आपस में कभी-कभार टकराते तो जरूर हैं,
पर बड़े ही प्रेम से, आदत है, मगरूर हैं।।

दोहा, घनाक्षरी, चौपाई, पद हो या सवईया,
बड़े ही सुपाच्य हैं, हज़मुल्ला की जरूरत नहीं
बस खाइए भईया।।

इस घनाक्षरी की थाली में देश-भक्ति की पूरियां
जो कड़कड़ाती दिखायी दे रही हैं, घबराइए नहीं!
इसमें देशी घी का मोयन है जादा, मुँह में रखते ही
गल जाएंगी, आप मस्त हो जाएंगे ऐसा है मेरा वादा।।

हम नहीं कहते कि इसे खाकर आप 

भगत सिंह, हमीद और आज़ाद हो जाएंगे
पर इतना है कि पत्नी के आगे ही सही,
आपके बाजू, चाहे हवा में ही, ज़ुरूर फड़फड़ाएंगे।।

इसको ‘बौखल’ और ‘बौझड़’ की हास्य चटनी के साथ
खाइए, ‘वाहिद’ के साम्प्रदायिक सद्भाव के मिक्सवेज़
का भी लुत्फ़ उठाइए अथवा ‘सुरेश’ की यायावरी प्रवृत्ति
को अपनाना हो जरूरी, तो एक मुखौटा ‘विजय
का अवश्य
खरीदिए वर्ना यात्रा रह जाएगी अधूरी।।

अब चूँकि गेहूँ के दाने, चावल, और समस्त खद्यान्न

यहां तक कि जंगल, जानवर और जंगली उत्पाद
सब कुछ ‘आशू’ भाई के मुताबिक होने जा रहे हैं
लोरियों और कहानियों में, तो अभी भी समय है
चेत जाइए और आइए
ग़ाफ़िल के ढाबे में आइए!

‘सन्त’ समागम की भक्ति-प्रेम-रस पूरित तस्मयी का
मज़ा है कुछ और, हाँ!
ग़ाफ़िल के ढाबे की यह
‘व्याख्या’ गर समझ में न आए तो चुप-चाप
चले जाना मत करना कुछ शोर वर्ना
हम पाकशास्त्रीगण लाल-पीले हो जाएंगे
और आप हो जावोगे बोर।
                                                               -ग़ाफ़िल

तेरा नाम लिख रहा हूँ

सुबो-शाम लिख रहा हूँ, तेरा नाम लिख रहा हूँ।
मैं इबारते-मुकद्दस का जाम लिख रहा हूँ॥

ग़ैरों पे करम तेरे, और दिल पे सितम मेरे,
मैं ख़ुद पे आज इसका इल्जाम लिख रहा हूँ।

यूँ भी तेरी जफ़ाई, क्या-क्या न गुल खिलाई?
तेरे वास्ते भी अच्छा सा काम लिख रहा हूँ।

आया हूँ क्यूँ यहाँ पे? और जाऊँगा कहाँ पे?
इस बात से नावाक़िफ़ अंजाम लिख रहा हूँ।

ग़ाफ़िल, बे-होशियारी और बे-तज़ुर्बेकारी,
आल्लाहो-ईसा, साहिब-वो-राम लिख रहा हूँ॥
                                                                     -ग़ाफ़िल

मंगलवार, जून 14, 2011

अपनी है तरफ़दारी मग़र ग़ैर की करे

जी की उड़ान जैसे नक़्ल तैर की करे
है मेरा तर्फ़दारी मगर गैर की करे

जाना से यकज़बाँ मैं कभी हो नहीं सका
मैं सर की कहूँ और वो है पैर की करे

सीनःफ़िगार मुझसा और कौन हो भला
के वस्ल की शब बात भी वो ग़ैर की करे

वो जाँसिताँ है और मैं जाँबर नहीं हूँ यार!
देखें के कौन आके मेरी ख़ैर की करे

हुस्नो-हरम पे जाँनिसार हो रहा है क्यूँ
ग़ाफ़िल तू जाके सैर किसी दैर की करे

(तैर= परिन्दा, यकजबाँ= सहमत, जाना= प्रेमिका, बारहा= अक्सर, सीनःफ़िगार= टूटे हुए दिलवाला, वस्ल की शब= मिलन की रात, ग़ैर= दूसरा, जाँसिताँ= जान लेने वाली, जाँबर= जान बचाने का सामर्थ्य रखने वाला, हुस्न= सौन्दर्य, हरम= अन्तःपुर, जाँनिसार= जान न्योछावर कर देने वाला, दैर= बुतख़ाना, मूर्ति-घर)

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, जून 11, 2011

मेरी तश्नगी

मेरी तश्नगी मुझे ही दीवाना न बना दे।
तश्नालबी ही मौत का गाना न बना दे॥

ये उम्र तो तेरे ही तसव्वुर में कट गयी,
मरने का कोई और बहाना न बना दे।

मेरे दिलो-दिमाग में तेरा ही फ़साना,
यह वक़्त कोई और फ़साना न बना दे।

इक चाँद ही ता'शब तो मेरे साथ रहा है,
डर है उसे भी कोई बेगाना न बना दे।

अब तक तो बेवफ़ा है जमाना मेरे लिए,
अब बेवफ़ा मुझे ये जमाना न बना दे।

तीरे-नज़र की तेरे ख़लिश से तड़प रहे
ग़ाफ़िल को कोई और निशाना न बना दे॥

( तश्नगी- प्यास, तश्नालबी- ओंठों का प्यासा होना अर्थात् सूख जाना )
                                                                    -ग़ाफ़िल

शनिवार, जून 04, 2011

तू भी है आदमजात क्या?

हारिश न हो जो हुस्न में तो इश्क़ की भी बात क्या?
आँखों से बरसे मै नहीं तो सावनी बरसात क्या?

वैसे तो हम शामो सहर मिलते हैं दौराने सफ़र
पर हो न जो बज्मे तरब तो फिर है मूलाक़ात क्या?

जज़्बातों का मेरे करम जो पाल रक्खा है भरम
वर्ना हो शब तारीक तो फिर चाँद की औक़ात क्या?

वो बाग की नाजुक कली सहमी हुई सी कह पड़ी
के इस तरह घूरे मुझे तू भी है आदमजात क्या?

ऐ हुस्न की क़ातिल अदा! सुन इश्क़ की भी ये सदा
के तुझको भी मालूम हो होती है ता’जीरात क्या?

ग़ाफ़िल गया जिस भी शहर वाँ हर गली हर मोड़ पर
पत्थर बरसते दर-ब-दर तो फिर हैं खुशहालात क्या?

(हारिश=अपने को बना-चुना कर दिखाने का शौक, बज़्मे-तरब=महफ़िल का आनन्द, तारीक=काली, ता’जीरात=कानून की वह किताब जिसमें दण्ड विधान निहित होता है)

-‘ग़ाफ़िल’