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गुरुवार, सितंबर 01, 2011

उसका भी फ़ैसला है

ऐ हुस्न तुझे इश्क़ का पता ही नहीं है।
पेश आया भी जैसे के कुछ हुआ ही नहीं है।।

उसका भी फ़ैसला है याँ दरबारे-हुस्न में,
जिस इश्क़ की कभी कोई ख़ता ही नहीं है।

तड़पे है तेरे ज़ेरे-क़दम इश्क़ बेतरह,
और तू कहे के ये तो कुछ सज़ा ही नहीं है।

ग़ाफ़िल को ना ग़ुमान था याँ के रिवाज़ का,
सब कुछ है यहाँ एक बस वफ़ा ही नहीं है।।

                                            -ग़ाफ़िल

32 टिप्‍पणियां:

  1. ग़ाफ़िल को ना ग़ुमान था याँ के रिवाज़ का,
    सब कुछ है यहाँ एक बस वफ़ा ही नहीं है।।
    ग़ाफ़िल को ना ग़ुमान था याँ के रिवाज़ का,
    सब कुछ है यहाँ एक बस वफ़ा ही नहीं है।।क्या बात है ,बहुत खूब गाफिल साहब !बेहतरीन अंदाज़े बयाँ !मुबारक !

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  2. वाह वाह उचित मौके पर आपका यह कलाम काम मे लाया जायेगा

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  3. उसका भी फ़ैसला है याँ दरबारे-हुस्न में,
    जिस इश्क़ की कभी कोई ख़ता ही नहीं है।

    ...बहुत ख़ूबसूरत गज़ल ...

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत बढ़िया ग़ज़ल...
    सादर बधाई..

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  5. ग़ाफ़िल को ना ग़ुमान था याँ के रिवाज़ का,
    सब कुछ है यहाँ एक बस वफ़ा ही नहीं है।।

    क्या बात है....

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  6. ईद की सिवैन्याँ, तीज का प्रसाद |
    गजानन चतुर्थी, हमारी फ़रियाद ||
    आइये, घूम जाइए ||

    http://charchamanch.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  7. ग़ाफ़िल को ना ग़ुमान था याँ के रिवाज़ का,
    सब कुछ है यहाँ एक बस वफ़ा ही नहीं है।।

    बहुत बढ़िया...

    उत्तर देंहटाएं
  8. तड़पे है तेरे ज़ेरे-क़दम इश्क़ बेतरह,
    और तू कहे के ये तो कुछ सज़ा ही नहीं है।


    ग़ाफ़िल को ना ग़ुमान था याँ के रिवाज़ का,
    सब कुछ है यहाँ एक बस वफ़ा ही नहीं है।।
    vaah kya baat hai taarif ke liye shabd chote hain.

    उत्तर देंहटाएं
  9. ग़ाफ़िल को ना ग़ुमान था याँ के रिवाज़ का,
    सब कुछ है यहाँ एक बस वफ़ा ही नहीं है।।

    बहुत खूब

    उत्तर देंहटाएं
  10. तड़पे है तेरे ज़ेरे-क़दम इश्क़ बेतरह,
    और तू कहे के ये तो कुछ सज़ा ही नहीं है।

    ग़ाफ़िल को ना ग़ुमान था याँ के रिवाज़ का,
    सब कुछ है यहाँ एक बस वफ़ा ही नहीं है।।

    बहुत खूबसूरत गज़ल

    उत्तर देंहटाएं
  11. बहुत सुन्दर ग़ज़ल ...गाफिल साहब !
    हर शेर जानदार ...

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  12. वाह ....बहुत खूब लिखा है आपने

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  13. सब कुछ है यहाँ एक बस वफ़ा ही नहीं है।।
    ये पंक्ति सीधे दिल में असर करती है। वफ़ा जिनसे की बेवफ़ा हो गए...

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  14. बहुत भाव पूर्ण रचना है |बधाई
    आशा

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  15. ग़ाफ़िल को ना ग़ुमान था याँ के रिवाज़ का,
    सब कुछ है यहाँ एक बस वफ़ा ही नहीं है।।

    जबरदस्त बात कह डाली. उम्दा गज़ल.

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  16. बहुत बढ़िया.... सुन्दर गज़ल..बधाई

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  17. ग़ाफ़िल को ना ग़ुमान था याँ के रिवाज़ का,
    सब कुछ है यहाँ एक बस वफ़ा ही नहीं है।।

    वाह, ग़ाफ़िल साहब,
    एकदम सच्ची बात कही है।

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  18. बहुत ख़ूबसूरत गज़ल .

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  19. तड़पे है तेरे ज़ेरे-क़दम इश्क़ बेतरह,
    और तू कहे के ये तो कुछ सज़ा ही नहीं है...

    Waah ! Awesome !

    .

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