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बुधवार, फ़रवरी 26, 2014

कभी मेरा निशाना था

हवाएं गीत जो गाएं, कभी मेरा फ़साना था।
फ़जाएं मस्त हो जाएं, मेरे मय का बहाना था।।

मेरे महबूब ने फिर आज मुझको एक ख़त भेजा,
बड़े दिल से जो खोला तो वही मजमूँ पुराना था।

हैं करते वार सोते में निशानेबाज अब सारे,
उड़ा के बुलबुलें मारूँ कभी मेरा निशाना था।

ये ‘ग़ाफ़िल’ चाँद था अपने फ़लक का इक जमाने में।
नज़ारे सब बदल जाते जो मेरा मुस्कुराना था।।

-‘ग़ाफ़िल’

28 टिप्‍पणियां:

  1. हैं करते वार सोते में निशानेबाज अब सारे,
    उड़ा के बुलबुलें मारूँ कभी मेरा निशाना था।

    -बेहतरीन!!

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  2. बहुत सुंदर .... आपने शब्दों को बहुत ख़ूबसूरती से पिरोया है ... शुभकामनाएं

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  3. उम्दा लेखन
    कमाल की प्रस्तुति वाह... क्या बात है

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  4. हैं करते वार सोते में निशानेबाज अब सारे,
    उड़ा के बुलबुलें मारूँ कभी मेरा निशाना था।

    बहुत सुंदर ...

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  5. वाह...क्या ग़ज़ल लिखी है.....बहुत ही सुन्दर....धन्यवाद...:)

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  6. जात - पांत न देखता, न ही रिश्तेदारी,
    लिंक नए नित खोजता, लगी यही बीमारी |

    लगी यही बीमारी, चर्चा - मंच सजाता,
    सात-आठ टिप्पणी, आज भी नहिहै पाता |

    पर अच्छे कुछ ब्लॉग, तरसते एक नजर को,
    चलिए इन पर रोज, देखिये स्वयं असर को ||

    आइये शुक्रवार को भी --
    http://charchamanch.blogspot.com/

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  7. वाह!! बहुत सुन्दर ग़ज़ल...

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  8. हवाएं गीत जो गाएं, कभी मेरा फ़साना था।
    फ़जाएं मस्त हो जाएं, मेरे मय का बहाना था।।

    मेरे महबूब ने फिर से शिकायत का है ख़त भेजा,
    बड़े दिल से जो खोला तो वही मजमूँ पुराना था।
    गाफ़िल साहब!एक से बढ़के एक अशआर आपके .काबिले दाद सभी शैर !यक़ीनन ! .कायर कौन ?
    किस्मत वालों को मिलती है "तिहाड़".
    http://veerubhai1947.blogspot.com/

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  9. मेरे महबूब ने फिर से शिकायत का है ख़त भेजा,
    बड़े दिल से जो खोला तो वही मजमूँ पुराना था।...

    lovely couplets...

    .

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  10. ख़ूबसूरत रचना , सुन्दर प्रस्तुति , बधाई

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  11. खूबसूरत गज़ल । कहानी पढ कर मुझे प्रोत्साहित करने के लिये धन्यवाद

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  12. मेरे महबूब ने फिर से शिकायत का है ख़त भेजा,
    बड़े दिल से जो खोला तो वही मजमूँ पुराना था.

    ग़ज़ब का रूमानी टच

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  13. क्या बात है गाफ़िल साहब !

    हैं करते वार सोते में निशानेबाज अब सारे,
    उड़ा के बुलबुलें मारूँ कभी मेरा निशाना था।इसी भाव का विस्तार देखिये इस आमंत्रित ग़ज़ल में .....
    बृहस्पतिवार, ८ सितम्बर २०११
    गेस्ट ग़ज़ल : सच कुचलने को चले थे ,आन क्या बाकी रही.
    ग़ज़ल
    सच कुचलने को चले थे ,आन क्या बाकी रही ,

    साज़ सत्ता की फकत ,एक लम्हे में जाती रही ।

    इस कदर बदतर हुए हालात ,मेरे देश में ,

    लोग अनशन पे ,सियासत ठाठ से सोती रही ।

    एक तरफ मीठी जुबां तो ,दूसरी जानिब यहाँ ,

    सोये सत्याग्रहियों पर,लाठी चली चलती रही ।

    हक़ की बातें बोलना ,अब धरना देना है गुनाह

    ये मुनादी कल सियासी ,कोऊचे में होती रही ।

    हम कहें जो ,है वही सच बाकी बे -बुनियाद है ,

    हुक्मरां के खेमे में , ऐसी खबर आती रही ।

    ख़ास तबकों के लिए हैं खूब सुविधाएं यहाँ ,

    कर्ज़ में डूबी गरीबी अश्क ही पीती रही ,

    चल ,चलें ,'हसरत 'कहीं ऐसे किसी दरबार में ,

    शान ईमां की ,जहां हर हाल में ऊंची रही .

    गज़लकार :सुशील 'हसरत 'नरेलवी ,चण्डीगढ़

    'शबद 'स्तंभ के तेहत अमर उजाला ,९ सितम्बर अंक में प्रकाशित ।

    विशेष :जंग छिड़ चुकी है .एक तरफ देश द्रोही हैं ,दूसरी तरफ देश भक्त .लोग अब चुप नहीं बैठेंगें
    दुष्यंत जी की पंक्तियाँ इस वक्त कितनी मौजू हैं -

    परिंदे अब भी पर तौले हुए हैं ,हवा में सनसनी घोले हुए हैं ।
    http://veerubhai1947.blogspot.com/

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  14. शनिवार (१०-९-११) को आपकी कोई पोस्ट नयी-पुरानी हलचल पर है ...कृपया आमंत्रण स्वीकार करें ....और अपने अमूल्य विचार भी दें ..आभार.

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  15. ग़ाफ़िल साहब!
    एक और बेहतरीन ग़ज़ल!

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  16. ये 'ग़ाफ़िल' चाँद था अपने फ़लक का इक जमाने में।
    नज़ारे सब बदल जाते जो मेरा मुस्कुराना था।।

    बेहतरीन गज़ल.हर शेर लाजवाब.

    ये गाफिल चाँद था, है चाँद , रहेगा चाँद ही बनकर
    ये गाफिल का जमाना है , वो गाफिल का जमाना था.

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  17. ये 'ग़ाफ़िल' चाँद था अपने फ़लक का इक जमाने में।
    नज़ारे सब बदल जाते जो मेरा मुस्कुराना था।।
    बहुत खूबसूरत गज़ल :)

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  18. आपकी पोस्ट आज "ब्लोगर्स मीट वीकली" के मंच पर प्रस्तुत की गई है /आप आयें और अपने विचारों से हमें अवगत कराएँ /आप हमेशा ऐसे ही अच्छी और ज्ञान से भरपूर रचनाएँ लिखते रहें यही कामना है /आप ब्लोगर्स मीट वीकली (८)के मंच पर सादर आमंत्रित हैं /जरुर पधारें /

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  19. हैं करते वार सोते में निशानेबाज अब सारे,
    उड़ा के बुलबुलें मारूँ कभी मेरा निशाना था।

    बहुत सुन्दर शेर है गाफिल जी ! वैसे तो सम्पूर्ण गज़ल ही लाजवाब है ! यह शेर विशेष रूप से प्रभावित करता है ! बधाई स्वीकार करें !

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