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रविवार, जुलाई 31, 2011

'बच्चन' जी की 'मधुशाला' पर दो शब्द अपने भी

ये पंक्तियां आदरणीय बच्चन जी की कालजयी रचना "मधुशाला" पढ़ने के बाद उसकी मशहूर रूबाईयों पर प्रतिक्रिया स्वरूप लिखी थीं कभी उन्हीं की रवानी में, लगभग उन्हीं के शब्दों को प्रयुक्त करते हुए, जिससे पता चले कि किस रूबाई पर प्रतिक्रिया है। यदि आप मधुशाला कायदे से पढ़े होंगे तो अवश्य सम्यक् रूप से समझ जाएंगे। इसे अब पोस्ट कर रहा हूँ। जिन महानुभाव को इन पंक्तियों से इत्तिफ़ाक न हो उनसे मुआफ़ी चाहूँगा। कृपया इसे अन्यथा न लेंगे। -ग़ाफ़िल


1-
हर्ष विकम्पित कर में लेकर, मद्यप झूम रहा प्याला,
क्षीण वसन, उन्नत उरोज, कृश लंक, मचलती मधुबाला।
जलतरंग को मात दे रही, मधु-प्याले की मधुर खनक;
मधु सौरभ से महक रही, मदमस्त नशीली मधुशाला॥


2-
किन्तु जाम देने को जब भी, झुकती है साकी बाला,
नयन-अक्श-खंजर से सज्जित, दिखता है मधु का प्याला।
अहो क्रूर दुर्भाग्य! समर्पित मदिरा भी है साकी भी;
पर हाला की धार लपट सी, रोज जलाती मधुशाला॥


3-
जीवन में चालिस बसंत आया और चला गया लाला!
लालायित अधरों से प्रतिदिन जमकरके चूमी हाला।
हाथ पकड़ लज्जित साकी का पास बहुत अब तक खींचा;
फिर भी व्यर्थ सूखती जाती मधुमय जीवन-मधुशाला॥


4-
तब मदिरालय में रौनक थी, बाँका था पीने वाला,
तब संजीवनि सी हाला थी, बाँका था जीने वाला।
मृदु भावों की अंगूर लता जाने कब की है सूख चुकी;
सद्यसुहागिन के सिंगार में फन फैलाये मधुशाला॥


5-
पंडित, मोमिन, पादरियों को ख़ूब रिझायी मधुशाला,
हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई ख़ूब छके पीकर हाला।
यह ग़ाफ़िल भी देख रहा क्या मदहोशी का आलम है।
हे मदिरालय के संस्थापक! तुम्हें मुबारक मधुशाला॥
                                                                       -'ग़ाफ़िल'

शनिवार, जुलाई 30, 2011

और ये पूछते हो के क्या देखते हो

जो हुस्नो-हरम में अज़ा देखते हो।
अरे शेख़ जन्नत कहाँ देखते हो?

निगाहों में तेरी भरम का ये आलम!
हमारी वफ़ा भी जफ़ा देखते हो।

जुनूने-मुहब्बत का ही ज़ोर है जो,
भरी भीड़ में तख़्लिया देखते हो।

भला ऐसी ख़ूबी पे क्यूँ रश्क़ न हो,
जहन्नुम में भी मर्तबा देखते हो।

अभी चश्मे-ग़ाफ़िल खुले भी नहीं हैं,
और ये पूछते हो के क्या देखते हो।

(अज़ा=दुःख, ज़फ़ा=बेवफ़ाई, तख़्लिया=एकान्त, रश्क=प्रतिस्पर्द्धा का भाव, जहन्नुम=नर्क, मर्तबा=प्रतिष्ठा, रुत्बा)

                                                                       -'ग़ाफ़िल'

सोमवार, जुलाई 25, 2011

थे कभी पँखुड़ी गुलाब के से नाज़ुक लब


वो तरन्नुम न रहा और वो तराना न रहा,
साज ऐसा हूँ के अब जिसका बजाना न रहा।

गुल का हर शख़्स हमेशा ही तलबगार रहा,
शाखे- गुल का कोई महफूज ठिकाना न रहा।

थे कभी पँखुड़ी गुलाब के से नाज़ुक लब,
अब तो शोला हैं मीर! अब वो फसाना न रहा।

तू जो कहता है इन्तिजार और कर लूँगा,
वैसे भी क़ब्र पे मेरी तेरा आना न रहा।

'आग इक थी लगी' यह बात याद करने को,
ज़िश्तरूई का मेरे कम तो बहाना न रहा।

ज़ीनते- चश्म वो मेरी है अब कहाँ ग़ाफ़िल?
चश्म के ज़ेरे- असर कोई दीवाना न रहा॥

(ज़िश्तरूई=बदसूरती, ज़ीनते-चश्म=आँखों की रौनक, जेरे-असर=प्रभाव में)
                                                                        -ग़ाफ़िल

मौत का और तो कोई सबब नहीं होता

मौत का और तो कोई सबब नहीं होता।
ग़रचे इक शोख नज़र का ग़जब नहीं होता॥

जब हो मुस्कान की तासीर भी मानिन्दे ज़हर,
फिर तो बह्रे-फ़ना किस ओर, कब नहीं होता?

मेरे जानिब से गुज़रते हैं अज्नबी की तरह,
अब उन्हें इश्क़ में शायद तरब नहीं होता।

हश्र मेरा भी सनम अबके यूँ नहीं होता,
दिल जो गुस्ताख़ यार तेरा तब नहीं होता।

आह को उम्र मिले लाख बे-असर ही रहे,
उसका एहसास किसी दिल को जब नहीं होता।

क़त्ल भी मेरा ही, इल्ज़ाम भी है मेरे सर,
कोई ऐसा भी तो ग़ाफ़िल अज़ब नहीं होता॥
                                                 -ग़ाफ़िल

शनिवार, जुलाई 23, 2011

नफ़्रत ही कोई ढब से निभाये कभी-कभी

तेरे बग़ैर गीत तो गाये कभी-कभी।
पर हर्फ़ कोई छूट सा जाये कभी-कभी॥

मिस्ले-सराय, दिल में तो आये तमाम लोग,
मेह्मान कोई चाँद भी आये कभी-कभी।

'हम तो लिबास में हैं सितारे सजा रहे',
दामन को इस भरम में जलाये कभी-कभी।

तेरे जमाल के सबब अपने हुये रक़ीब,
तन्हा ही जश्ने-मौत मनाये कभी-कभी।

रिश्ते तो मोहब्बत के सभी ज़िश्तरू हुये,
नफ़्रत ही कोई ढब से निभाये कभी-कभी।

है इशरते-सुह्बत-ए-हुस्न किस्मतन अता,
'ग़ाफ़िल' भी क्यूँ न मौज मनाये कभी-कभी॥

(रक़ीब=एक ही प्रेमिका के दो प्रेमी आपस में रक़ीब कहलाते हैं, ज़िश्तरू=बदसूरत, इशरत=खुशी)  
                                                                 -ग़ाफ़िल

गुरुवार, जुलाई 21, 2011

या ख़ुदा याँ पे कोई हमसफ़र नहीं होता

मैं तेरे चश्म के ज़ेरे- असर नहीं होता।
दिल में पेवस्त जो तीरे- नज़र नहीं होता॥

तेरे कूचे की सिफ़त संगज़ार की सी है,
आता अक्सर जो सफ़र पुरख़तर नहीं होता।

क्यूँ जमाने की है इस मिस्ल हौसला-पस्ती,
या ख़ुदा याँ पे कोई हमसफ़र नहीं होता।

शम्अ-ए-हुस्न में मेरी तरह लाखों अख़्ग़र,
रोज जलते हैं मग़र कुछ ज़रर नहीं होता।

मुझको बरबाद किया यह शहर रफ़्ता- रफ़्ता,
गोया इल्जाम कभी इसके सर नहीं होता।

इक नज़र देख ले इस सिम्त भले नफ़्रत से,
यूँ भी ग़ाफ़िल पे मिह्रबाँ क़मर नहीं होता॥

(अख़्गर=पतिंगा, क़मर=चाँद)
                                                              -ग़ाफ़िल

बुधवार, जुलाई 13, 2011

क्यूँ?

क्यूँ अब इस बस्ती में अक्सर हैवान ही पाए जाते हैं?
भोली-भाली सूरत वाले शैतान ही पाए जाते हैं॥

क्यूँ इंसानों की बदहालत बदतर ही होती जाती है?
सतरंगी सपने दिखलाकर नादान नचाए जाते हैं।

उनके मतबख में शाम सरह है गोश्त पके इंसानों का,
सूखी लकड़ी के बदले क्यूँ इंसान जलाये जाते हैं?

क्यूँ ममता रोज़ बिलखती है? क्यूँ भाईचारा मरता है?
इक प्यार की सिसकन के सुर में, क्यूँ गीत सजाये जाते है?

‘ग़ाफ़िल’ यह कैसी अनहोनी यह कैसे बेड़ा ग़र्क़ हुआ
क्यूँ दो कौड़ी की क़ीमत पर ईमान भुनाये जाते हैं?

(मतबख=पाकशाला)

-‘ग़ाफ़िल’                        

शनिवार, जुलाई 02, 2011

चाँदनी भी जलाया करती है

यूँ शबो-रोज़ आया करती है,
याद उसकी रुलाया करती है।
वो मुसाफ़िर हूँ मैं जिसे अक्सर;
चाँदनी भी जलाया करती है।।

मेरे सपनों ने नहीं साथ दिया,
मेरे अपनो ने नहीं हाथ दिया।
दिल में रहकर ही तमन्ना-ए-दिल;
मुझको हरदम सताया करती है।।

मैंने भी आह का असर देखा,
एक भूचाल सा अक्सर देखा।
और देखा कि आह इक पल में;
सल्तनतें मिटाया करती है।

ग़ाफ़िल अब सैफ़ का भी करना क्या,
फ़ज़ूल ग़ैब का भी मरना क्या।
जब सरे-शाम अदा-ए-खंज़र;
शोख चश्मी दिखाया करती है।।

(शबो-रोज़=रात-दिन, सैफ़=तलवार, ग़ैब=परोक्ष, शोख़ चश्मी=चंचल नयनो वाली)
                                                                         -ग़ाफिल