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गुरुवार, सितंबर 15, 2011

जज्बात भी रूमानी है


मदभरी रात है जज्बात भी रूमानी है।
सामने छत पे मचलती हुई जवानी है॥


जिस्म बलखाए तो नागन को शरम आ जाये,
लट जो लहराये तो काली घटा सी छा जाये,
आँख में नाचती जैसे शराब की मस्ती,
किसी की याद में खोई वो रातरानी है॥


मन के आँगन में खुली फिर से नई मधुशाला,
ख़ुम* का इतराव नया, फिर से नई मधुबाला,
दौर चलता रहे और साकी तेरा साथ रहे,
आज पूरी भी हो जो चाह इक पुरानी है॥


ऐ बहारों मेरे जज्बात पे तरस खावो,
ऐ नज़ारों मेरे हालात पे तरस खावो,
इस भरे जाम में साकी की नज़र खँजर सी,
मेरे ही साथ ये अक्सर हुई कहानी है॥


बहक रहे हैं क़दम हर अदा बहक सी रही,
बहक रही है जुबाँ हर सदा बहक सी रही,
तू भी ग़ाफ़िल बहक के होश न आए फिर से,
मौक़ा-ए-जश्न है और जश्न-ए-जवानी है॥


* खुम=वह बड़ा घड़ा जिसमें शराब स्टोर होती है। उसी में से सुराही में निकाल कर फिर पैमानो में ढाल कर पेश की जाती है।
                                                                                -ग़ाफ़िल

रविवार, सितंबर 11, 2011

कहैं सब गालोबीबी

गालोबीबी जो दिखी, तरुन नयन की भ्रान्ति।
रहकर परदूसित जगह, बिगड़ गई मुँह कान्ति॥
बिगड़ि गई मुँह कान्ति, रहा ना कहीं ठिकाना;
घरमा हो या घर के बाहर, हुआ बेगाना।
ग़ाफ़िल कैसे समझाए की क्या है ख़ूबी?
मुँह मा दोहरा भरा कहैं सब गालोबीबी॥

(इस रचना का उत्स, मेरे एक अभिन्न मित्र, जो कभी अपने को 'तरुन' कहलाने की मशक्कत में थे, का मेरे लिए इस सवाल कि- 'तुम बोलते क्यों नहीं! गालोबीबी हुई है क्या?' में निहित है। गालोबीबी= मेरे शुभचिन्तक सुधीजनो गालोबीबी एक प्रकार का गले का रोग होता है जो इन्फैक्शन से हो जाता है। इसमें गले पर सूजन आ जाती है आदमी न तो खा सकता है और न ही बोल सकता है। फीवर भी हो जाता है और आदमी कमजोरतर होता जाता है। यह वायरल बीमारी है जिसके लिए हार्ड एंटीबॉयोटिक लेनी पड़ती है। तब जाकर बहुत झेलाने के बाद कहीं ठीक होता है। मेरे अंचल में इस बीमारी को गालोबीबी कहा जाता है हो सकता है अन्यत्र इसे और कुछ कहा जाता हो। इसकी व्याख्या इस लिए करनी पड़ रही है कि हमारे बहुत से शुभचिन्तक इसके बारे में जानते ही नहीं या जानते भी हों तो किसी और नाम से।)
                                                                                   -ग़ाफ़िल

शनिवार, सितंबर 10, 2011

सौदा हरजाने का है

साथियों! फिर प्रस्तुत कर रहा हूँ एक पुरानी रचना, तब की जब 'बेनज़ीर' की हत्या हुई थी; शायद आप सुधीजन को रास आये-

उनके पा जाने का है ना इनका खो जाने का है।
पाकर खोना, खोकर पाना, सौदा हरजाने का है॥

तिहीदिली वो ठाट निराला दौलतख़ाने वालों का,
तहेदिली वो उजड़ा आलम इस ग़रीबख़ाने का है।

एक दफ़ा जो उनके घर पे गाज गिरी तो जग हल्ला,
किसको ग़म यूँ बेनज़ीर के हरदम मर जाने का है।

वो चाहे जो कुछ भी कह दें ब्रह्मवाक्य हो जाता है,
पूरा लफड़ा तस्लीमा के सच-सच कह जाने का है।

शाम-सहर के सूरज से भी सीख जरा ले ले ग़ाफ़िल!
उत्स है प्राची, अस्त प्रतीची बाकी भरमाने का है॥

(तिहीदिली=हृदय की रिक्तता, तहेदिली=सहृदयता)
                                                                             -ग़ाफ़िल

रविवार, सितंबर 04, 2011

बलमुआ लउटि चलौ वहि ठाँव


बलमुआ लउटि चलौ वहि ठाँव,
सबसे सुन्नर, बहुत पियारा बाटै आपन गाँव।
                                                  बलमुआ लउटि चलौ...
बीते राति सबेरा होई, चिरइन कै कलराँव,
यहि ठौं दिनवा रतियै लागै, घाम कहाँ? कहँ छाँव?
                                                  बलमुआ लउटि चलौ...
बिछुड़ि गये सब टोल-पड़ोसी, बिछुड़ि गयीं गऊ माँ,
वह नदिया, वह नदी-नहावन, वह निबरू की नाँव।
                                                  बलमुआ लउटि चलौ...
मोरि मुनरकी सखिया छूटलि, केहि सँग साँझ बिताँव?
ग़ाफ़िल छोट देवरवउ छूटल, अब काको हरचाँव।
                                                  बलमुआ लउटि चलौ...
                                                                                      -ग़ाफ़िल

गुरुवार, सितंबर 01, 2011

उसका भी फ़ैसला है

ऐ हुस्न तुझे इश्क़ का पता ही नहीं है।
पेश आया भी जैसे के कुछ हुआ ही नहीं है।।

उसका भी फ़ैसला है याँ दरबारे-हुस्न में,
जिस इश्क़ की कभी कोई ख़ता ही नहीं है।

तड़पे है तेरे ज़ेरे-क़दम इश्क़ बेतरह,
और तू कहे के ये तो कुछ सज़ा ही नहीं है।

ग़ाफ़िल को ना ग़ुमान था याँ के रिवाज़ का,
सब कुछ है यहाँ एक बस वफ़ा ही नहीं है।।

                                            -ग़ाफ़िल