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मंगलवार, नवंबर 08, 2011

चिकनी राह बुलाए गाफिल!

मन का घोड़ा बाँध रखा था, छोड़ा नहीं मचलने को।
पानी सर से ऊपर है, अब मौका नहीं सँभलने को॥

चाँद रहा है मिसाल हरदम रुखे-माहपारावों का,
हम हैं के आमादा उसको पावों तले कुचलने को।

आता भी है जाता भी है दुनिया का हर एक बसर,
भरम है तेरा लगा हुआ जो यह दस्तूर बदलने को।

यह तो तेरी रह का एक पड़ाव है यार! नहीं मंजिल,
हुआ बहुत आराम, हो अब तैयार भी आगे चलने को।

फ़ित्रत है तो चलते रहना मज़्बूरी सी है गोया
चिकनी राह बुलाए ग़ाफ़िल अपनी सिम्त फिसलने को।