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रविवार, दिसंबर 25, 2011

कस्म गोया तेरी खायी न गयी

दिल से तस्वीर मिटायी न गयी।
याद तेरी थी भुलायी न गयी।।

ज़ीनते-गुफ़्तगू हो जाती बस
बात बाक़द्र चलायी न गयी।

खोजता रह गया ता’उम्र जिसे,
वह खुशी हमसे तो पायी न गयी।

खा लिया मैंने बादे-ज़िन्दाँ भी,
कस्म गोया तेरी खायी न गयी।

नज़्रे-आतिशे-तग़ाफ़ुले-जाना
दिल की दुनिया थी, बचायी न गयी।

बढ़के पल्लू को थाम लेने की,
रस्म ग़ाफ़िल से निभायी न गयी।।
(ज़ीनते-गुफ़्तगू=गफ़्तगू की रौनक़, बादे-ज़िन्दाँ=ज़ेल की हवा, नज़्रे-आतिशे-तग़ाफ़ुले-जाना=प्रेमिका की उपेक्षा की आग के हवाले)
                                                               -ग़ाफ़िल 

सोमवार, दिसंबर 05, 2011

शब है तारीक अभी

शब है तारीक अभी, माहताब भी होगा।
मेरी इस बज़्म का आख़िर शबाब भी होगा।।

चाँद कब तक छिपेगा अब्र की पहरेदारी,
एक झोंके मे ही वह बेनक़ाब भी होगा।

तू यार! ख़ुश रहे, भले मेरे रक़ीब के साथ,
मगर ख़्याल रहे के अज़ाब भी होगा।

हुए तबाह तेरे नेक इरादों के सबब,
नहीं हैं दूर वो दिन इन्क़िलाब भी होगा।

जो गिनता रहता है ग़ाफ़िल की हमेशा ग़फ़लत,
ग़फ़लतों का तेरी मौला! हिसाब भी होगा।।

-‘ग़ाफ़िल’