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गुरुवार, दिसंबर 27, 2012

कोढ़ियों के मिस्ल होगा यह समाज

ज़ुल्मो-सितम को ख़ाक करने के लिए,
लाज़िमी है कुछ हवा की जाय और।
उस लपट की ज़द में तो आएगा ही;
चोर या कोई सिपाही या के और।।

एक जब फुंसी हुई ग़ाफ़िल थे हम,
रोने-धोने से नहीं अब फ़ाइदा।
अब दवा ऐसी हो के पक जाय ज़ल्द;
बस यही है इक कुदरती क़ाइदा।।

वर्ना जब नासूर वो हो जाएगी,
तब नहीं हो पायेगा कोई इलाज।
बदबू फैलेगी हमेशा हर तरफ़;
कोढ़ियों के मिस्ल होगा यह समाज।।


मंगलवार, दिसंबर 25, 2012

कवि तुम बाज़ी मार ले गये!

कवि तुम बाज़ी मार ले गये!
कविता का संसार ले गये!!

कविता से अब छन्द है ग़ायब,
लय है ग़ायब, बन्द है ग़ायब,
प्रगतिवाद के नाम पे प्यारे!
कविता का श्रृंगार ले गये!
कवि तुम...!

भाव, भंगिमा, भाषा ग़ायब,
रस-विलास-अभिलाषा ग़ायब,
शब्द-भंवर में पाठक उलझा
ख़ुद का बेड़ा पार ले गये!
कवि तुम...!

एक गद्य का तार-तार कर,
उसपर एंटर मार-मारकर,
सकारात्मक कविता कहकर
'वाह वाह' सरकार ले गये!
कवि तुम...!

पद की गरिमा को भुनवाकर,
झउआ भर पुस्तक छपवाकर,
पाठ्यक्रमों का हिस्सा बनकर
‘ग़ाफ़िल’ का व्यापार ले गये!

कवि तुम बाज़ी मार ले गये!
कविता का संसार ले गये!!

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गुरुवार, दिसंबर 20, 2012

मैं ग़ाफ़िल यूँ भी ख़ुश हूँ

(पृष्ठभूमि-चित्र गूगल से साभार)

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बुधवार, दिसंबर 12, 2012

सोचना रोटी है आसाँ

सोचना रोटी है आसाँ पर बनाना है जटिल
ख़ूबसूरत राग है पर यह तराना है जटिल

क्या यही लगता है रोटी आज दे दोगे उसे
इस क़दर बेकस व बेबस फिर न देखोगे उसे

उसके हक़ में है कि यह त्रासद अवस्था झेल ले
हौसला दो राह के पत्थर को ख़ुद ही ठेल ले

यार ग़ाफ़िल! एक मौका भर उसे अब चाहिए
रोटियाँ ख़ुद गढ़ सके ऐसा उसे ढब चाहिए

-‘ग़ाफ़िल’

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सोमवार, दिसंबर 03, 2012

हर बात निभा लेते हैं

(पृठभूमि-चित्र गूगल से साभार)

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रविवार, नवंबर 25, 2012

ख़ूबसूरत सी क़ज़ा याद करो!

वह शरारत वो अज़ा याद करो!
अपने बचपन का मज़ा याद करो!
मार खाना पलट हथेली पर
मास्टर जी की सजा याद करो!
ऐसी यादें अगर फ़रेब लगें
यार ग़ाफ़िल! तो बजा याद करो!
कल जो बस तुमको मिलने वाली है
ख़ूबसूरत सी क़ज़ा याद करो!

(अज़ा=तक़्लीफ़, बजा=सत्य, क़ज़ा=मौत)
______________________________________

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शुक्रवार, नवंबर 23, 2012

शहर को जलते देखा

हुस्न को आज सरे राह मचलते देखा
एक शोला सा उठा शह्र को जलते देखा
मैं तो ग़ाफ़िल था तिरे ज़ल्वानुमा होने से
मोम तो मोम थी पत्थर भी पिघलते देखा

-‘ग़ाफ़िल’

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शुक्रवार, नवंबर 02, 2012

वह बंजारे की रात कहाँ?

(पृष्ठभमि चित्र गूगल से साभार)


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गुरुवार, नवंबर 01, 2012

'भूख के एहसास' पर ग़ाफ़िल ग़ज़ल क्यूँकर लिखे?

(पृष्ठभमि चित्र गूगल से साभार)
  • Ish Mishra भूख के एहसास पर लिखता हूँ इसलिए गजल 

    देखा ही नहीं भोगा है भूख का हमने शगल 

    जो भूखे हैं वो भी हमारी ही तरह इंसान हैं

    लूट के निजाम में अन्न पाने को परेशान हैं
    इबादत जिनकी होती है वो बनते भगवान हैं 
    हकीकत में लेकिन इंसानियत खाने वाले हैवान हैं
    अनुवाद देखिए
  • Shashank Shekhar Ish सर एक पुरानी गलती के लिए क्षमा करते हुए प्रणाम स्वीकार करें...और धनुष उठाने की अनुमति दें....
    अनुवाद देखिए
  • Rajanikant Dubey · Friends with Naveen Tripathi
    bahut khoob............................
  • Shalini Pandey पालकी में लाश ढोना उसकी आदत ही नहीं



    क्या बात है! वैसे भी हर मैदान को मैदाने-जंग नहीं बनाया जा सकता, नहीं बनाना चाहिए! ग़ज़ल एक नाज़ुक मिजाज विधा है जिसमें नाज़ुक भाव ही अच्छे लगते हैं। भूख प्यास ग़रीबी भ्रष्टाचार आदि सामयिक मुद्दों को अभिव्यक्ति देने के लिए और भी विधाएँ हैं जिसका उपयोग किया जा सकता है कोई एक मैदान कमाने-अब्रू (नज़र की कमान) के लिए भी तो सुरक्षित हो हा हा हा हा
  • Shashank Shekhar Shalini, ...और न ही विवाह मंडप की अग्नि पर दाह संस्कार करना...
    अनुवाद देखिए
  • Shashank Shekhar .....यह मुद्दा सौन्दर्य बोध और अनभूति के गुलशन में कर्महीन तथाकथित साम्यवादी विचारधारा की जबरन घुसपैठ से सम्बंधित है....
    अनुवाद देखिए
  • Shashank Shekhar ....नारों को ग़ज़ल का जामा क्यों ?

    ....और उसके पहले, जिन हाथों में हथियार होने चाहिए, उन हाथों में नारों के पोस्टर क्यों ?
    अनुवाद देखिए
  • Shalini Pandey प्रणाम शशांक सर मैं आपसे पूरी सहमत हूँ प्रत्येक साधन का अपना अलग उपयोग और महत्त्व होता है भोजन पकाना यद्यपि आवश्यक है पर हर जलती आग में नहीं पकाया जाना चाहिए वर्ना हो सकता है कि भोजन जल जाय या हो सकता है उससे आग ही बुझ जाय अथवा एक प्रतिशत सम्भावना है भोजन पक भी जाय पर इसकी आदत डालना उचित नहीं यह उपक्रम आकस्मिकता की स्थिति में ही उपयुक्त है
  • Shashank Shekhar नमस्ते Shalini! लेकिन ये Ghafil भाई कहाँ हैं ? सामने भी कोई नज़र नहीं आ रहा ...
    अनुवाद देखिए
  • Shalini Pandey सर क्या है कि लड़ाई तो लड़ने वालों से ही जीती जाती है हाँ ललकार से हिम्मत बढ़ती है पर अब ललकारना लोगों का जॉब हो गया है लड़ने की ज़ेहमत कौन मोल ले जिसमें जान भी जाने तक का जोख़िम है और ललकारने के जॉब में अकूत प्रतिष्ठा तथा यदि भाग्य साथ दे दे तो पैसा भी हा हा हा हा
  • Chandra Bhushan Mishra Ghafil Virendra सर Ish सर Shashankसर और सभी को शुभ संध्या! आप सब से क्षमा प्रार्थी हूं हमें नहीं पता था कि यह Shalini नामक चुहिया हमें चाय-पानी देकर यहां हमारी फोटो का कबाड़ा कर रही है
  • Shalini Pandey शशांक सर अनुमति दें अब मैं चली यहाँ से नहीं तो...
  • Ish Mishra लोग कहते हैं मेरी गजलें नारा क्यों होती हैं

    मैं कहता हूँ हर गज़ल नारा क्यों नहीं होती

    और हर नारा क्यों नहीं होता नज्म?
    अनुवाद देखिए
  • Raju Jaihind " पालकी में लाश ढोना उसकी आदत ही नहीं "...बहुत खूब गाफिल साहेब ...आमीन ......शुभ रात्रि ,, जयहिन्द !!
    अनुवाद देखिए
  • Chandra Bhushan Mishra Ghafil सभी को मेरा आदाब! सारे ग़ज़लगो और साहित्यिक समाज से मेरा सवाल है कि मातम मनाना एक बेहद ज़ुरूरी स्वाभाविक क्रिया है पर उसके लिए निहायत आकर्षक स्थान होने के नाते सुहाग की सेज़ का ही इस्तेमाल किया जाना कितना उपयुक्त है? समाज के मौज़ू मसाइल को व्यक्त करने के लिए और भी छंदो का इस्तेमाल हो सकता है ग़ज़ल का उपयोग केवल और केवल कोमल भावनाओं को अभिव्यक्ति देने के लिए किया जाना चाहिए और अब तक यही होता आया है इधर दुष्यन्त कुमार और 'अदम' गोण्डवी दो ऐसे हिन्दी ग़ज़लग़ो हुए जो तमाम सामाजिक राजनैतिक मसाइल पर ही ग़ज़लें लिखे चूँकि ग़ज़ल बेहद लोकप्रिय छंद था अत: उसी को उन्होंने अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। चुनाचे वे भी बहुत लोकप्रिय हुए उनकी बातें भी बेहद पसन्द की गयीं उनकी लोकप्रियता का एक और कारण यह था कि यह एक नया प्रयोग था। अभी लोगों का पेट भरा नहीं, ऊबे नहीं हैं, नकारात्मक प्रवृत्तियों का तांडव जारी है उसका भय सवार है सर पर इसलिए लोग वही प्रयोग पसन्द कर रहे हैं लेकिन मैं बहुत साफ़ शब्दों में कहना चाहूँगा कि इस प्रयोग को ग़ज़ल के साथ खुल्लमखुल्ला बलात्कार माना जाना चाहिए ठीक वैसे जैसे सुहाग की सेज़ पर लाश रखकर मातम मनाना सुहाग की सेज़ के साथ बलात्कार है। हर ख़ूबसूरत ज़गह को अखाड़ा बना देना वामपंथियों का शगल है ऐसा ही ग़ज़ल के भी साथ किया जा रहा है। चाँद, जो कि हमारे सौन्दर्य जिग्यासा को तुष्ट करता है, को रोटी की शक़्ल में तब्दील कर देना वामपंथियों की पुरानी आदत है यह सब ग़ाफ़िल नहीं कर सकता
  • Ish Mishra अघाए लोगों को दिखाई देता हैं चाँद एक सुन्दर मुखड़ा

    नंगे-भूखों को दिखता है वो सूखी रोटी का एक टुकड़ा
    अनुवाद देखिए
  • Chandra Bhushan Mishra Ghafil ईश सर आदाब! कहना चाहूँगा कि चाँद को सूखी रोटी के शक़्ल में दिखाते रहने से ज्यादा ज़ुरूरी है लोगों की भूख मिटाकर चाँद को ख़ूबसूरत मुखड़े में दिखाया जाय वर्ना चाँद के लिए भी उपद्रव ही खड़ा करेंगे लोग क्योंकि पेट की आग ज़्यादा उत्तेजक होती है और हर रोटीनुमा उपादान को रोटी बताकर उत्तेजना भड़काना केवल भूख को और बढ़ाकर उपद्रव ही पैदा करना है। अभाव की स्थिति में रात को भूखे विलखते बच्चे से यह कहना कि 'बेटा देखो चन्दा मामा कितने अच्छे हैं तुम सो जाओ वे तुम्हारे लिए रोटी ले आएँगे सुबह तक' ज़्यादा समीचीन और उपयोगी है बच्चे के लिए बनिस्बत इसके कि चाँद को ही रोटी बताकर उसे देख-देख कर रातभर के लिए बच्चे को रोने और विलखने के लिए छोड़ देना
  • Ish Mishra खून सदियों से नशों में खौलता है

    आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है. (दुष्यंत)
    अनुवाद देखिए
  • Ish Mishra गाफिल भईए आदाब! जिन्होंने भूख के बारे में सिर्फ पढ़ा है वे भूख के संताप का एहसास कैसे करेंगे? और भूख के एहसास के बिना भूख मिटाने का उपक्रम कैसे होगा? वैसे तो आपने यह सवाल गज़लगो और साहित्यिक समाज से पूंछा है, मैं दोनों में से किसी कोटि में नहीं आता. मैं तो फेसबुक पर कुछ कमेन्ट तुकबंदी में कर देता हूँ. इसलिए मेरा कमेन्ट एक साधारण पाठक की राय समझें. मैं आप से शत-प्रतिशत सहमत हूँ की गज़ल की शुरुआत दरबारेए मनोरंजन के साधान के रूप में 'कोमल भावनाओं", वर्जनाओं और कुंठाओं की अभिव्यक्ति के रूप में ह्बुई, और वामपन्थिओं ने उसे राजनैतिक/सामाजिक चेतना का औजार और हथियार बना कर उसके साथ "बलात्कार" किया और करते आ रहे हैं. लेकिन आपकी फेहरिश्त में बहुत से नाम छूट गए हैं. गज़ल के साथ यह "दुष्कर्म" बहुतों ने किया है. "वह तोड़ती पत्थर......" और "चाँद का मुंह टेढा..." लिखने वाले निराला और मुक्तिबोध शायद इस आरोप से बारी माने जाएँ क्योंकि उनकी कवितायें गज़ल नहीं हैं. इस संदेह का लाभ, "बहुत दिनीं तक चूल्हा रोया चक्की रही उदास..." लखने वाले नागार्जुन और "गुलामिया अब हम नाहीं बजैबे/आज़ादिया हमारा के भावेले..." लिखने वाले गोरख पाण्डेय को भी शायद मिल जाए. अदम गोंडवी और दुष्यंत कुमार के अलावा बहुत से शायरों ने यह काम किया है. "....... एक महल की आड से निकला है कोई माहताब/जैसे मुल्ले का अमामा जैसी बनिए का किताब...." लिखने वाले मजाज़, मेहनतकश के लिये "एक गाँव नहीं एक देश नहीं, पूरी दुनिया" माँगने वाले फैज़, दह्कां को रोटी न दे सकने वाले खेत को जलाने की हिमायत करने वाले शाहिर, हक़ के लिये न लड़ने वाले मध्यवर्ग को "हक़ अच्छा पर हक़ के लिये कोई और लड़े तो और अच्छा ..." का कटाक्ष करने वाले इब्न-ए-इंशां, "...........//की हमने इन्ही की गमखारी/लोगों पर हमने जान वारी/होते हैं तो हो लें हाथ कलम शायर न बनेगा दरबारी...." लिखने वाले हबीब जालिब, .......... के नाम छूट गए?
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  • Chandra Bhushan Mishra Ghafil जी ईश सर! नाम छूट सकते हैं और इन महानुभाओं के कथ्य से हमें इत्तिफ़ाक़ भी है ज़रा भी ऐतराज़ नहीं ये हमें बेहद पसन्द भी हैं पर ख़ासकर ग़ज़ल को ऐसे कथ्यों, विषयों की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाने पर हमें पूरा ऐतराज़ है 'अदम' साहब की एक मशहूर ग़ज़ल के दो शे'र पर आपकी तवज़्जो चाहूँगा-



    1- भूख के एहसास को शे'रो-सुखन तक ले चलो,

    या अदब को मुफ़लिसों की अंजुमन तक ले चलो।

    2- जो ग़ज़ल माशूक़ के जल्वों से वाक़िफ़ हो चुकी,
    अब उसे बेबा के माथे की शिक़न तक ले चलो।

    इनमें प्रथम पर तो कोई आपत्ति हो ही नहीं सकती क्योंकि अदब में पूरा साहित्य और शे'रो-सुखन में ग़ज़ल के अलावा भी बहर आते हैं पर दूसरे पर पूरी आपत्ति है ग़ज़ल में बेबा के माथे की शिक़न को अभिव्यक्ति देना पूरा पूरा ग़ज़ल के साथ बलात्कार है हाँ ग़ज़ल में अगर माथे की शिक़न को अभिव्यक्ति देनी ही है तो किसी विरहणी के माथे की शिक़न को बाक़ायदा अभिव्यक्त करिए! अब बेबा और विरहणी का फ़र्क़ तो सभी को मालूम है
  • Anurag V Hitkari · Friends with Vijay Shukla
    Chandra Bhushan Mishra Ji and Ish Mishra Ji............... behad sateek alochana ya samalochna ke liye mubarakbad ! Balatkar na sirf gazal ke sath hua he balki Kavita aur Kahani ke saath bhi hua he. Is silsile me adhunik kavita (?) ke sabhi Kaviyon (Manglesh Ji पैसों की लम्बी रेस में

    सारे चेहरे बदल गए हैं) ya phir kahanikaro me Kashinath ji (Kashi ka Assi)/ Manager Pandey/ Rajendra Yadav wagerah ka naam samman ke saath lunga.
    अनुवाद देखिए
  • Ish Mishra 1- भूख के एहसास को शे'रो-सुखन तक ले चलो,

    या अदब को मुफ़लिसों की अंजुमन तक ले चलो।



    2- जो ग़ज़ल माशूक़ के जल्वों से वाक़िफ़ हो चुकी,
    अब उसे बेबा के माथे की शिक़न तक ले चलो।

    दोनों ही शेर अदम की एक ही गज़ल के हैं. चलिए पहले पर. यानि अदब को मुफलिस की मंजिल तक ले जाने पर आपको आपत्ति नहीं है. वैसे यह भी माशूक की जुल्फों में उलझी कोमल भावनाओं की अभिव्यक्ति न होकर अदब को जनपक्षीय बनाने की बेबाक अपील है. दरबारी रवायत की निरंतरता बरकरार रखते हुए,सामाजिक सरोकारों से विरक्त, माशूक के विरह और मिलन के जल्वों से वाकफियत के वर्णन से तो ग़ज़लों की दुनिया भरी पडी है. शब्द और शिल्प के धनी, एक हमारे गुरू जी हैं, देश के वरिष्ठ नागरिक हैं. उनकी गज़लोएँ अभी तक माशूक की जुल्फों में उलझी हैं., किसी गज़ल को बेवा के माथे की शिकन तक ले जाने से अपशकुन हो जाएगा क्या? वैसे मर्दवादी रीतियों की सबसे अधिक शिकार विधवाएं ही हैं. घर-बार से बेदखल विधुर नहीं होते, विधवाएं होती हैं. इतने विधवा आश्रम हैं, विधुर आश्रम एक भी नहीं? और इन आश्रमों में विधवाओं को प्रताणना मिलती है और किस घृणित ढंग से उनका याकुन शोषण होता है, उसकी एक जह्लक दीपा मेहता की "वाटर' में मिलती है. तो मित्र, किसी शायर का सरोकार विधवा के माथे की शिकन तक पहुंचता है तो उसे स्वागत योग्य मानना चाहिए, गज़ल के साथ बलात्कार नहीं. किसी की रचना में उसके सरोकार ही झलकते हैं. अदम, एक सामंती, राजपूत पृष्ठभूमि में पलने-बढ़ने के बावजूद जिस तरह "चमारों की गली" मे "ज़िंदगी के ताप" को महसूस कर पाते हैं उसी तरह, अपशकुन माने जाने वाली विधवा की पीड़ा भी महसूस कर पाते हैं और दिल की बात कलम की जुबां बन जाती है. सादर.
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  • Chandra Bhushan Mishra Ghafil हितकारी जी आप सही फ़रमा रहे हैं विमर्श में साझेदारी करने का शुक़्रिया! अगर आप ऐसे विमर्शों को तरज़ीह देते हों तो मैं आपको मित्र बनाना चाहूँगा
  • Chandra Bhushan Mishra Ghafil सर! सब ठीक है अदब के साथ-साथ पूरे अदबी समाज को जहाँ ज़ुरूरी हो वहाँ ले जाया जाय इसकी हिमायत मैं भी करता हूँ पर एक अदद ग़ज़ल को बख़्श दिया जाय मेरा इतना ही कहना है। सुहाग की सेज़ और मर्सियाग़ाह दोनों ज़ुरूरी और मुक़द्दस ज़गह हैं पर दोनों को इकट्ठा कर देने पर दोनों के निजी स्वरूप और पाक़ीज़गी का क्या हश्र होगा आप सहज अन्दाज़ा लगा सकते हैं
  • Shashank Shekhar Ghafil भाई , Ish सर अभी तक ठीक कहते दिख रहे हैं.....रणनीति इनकी अच्छी है....पहले सम्हल कर चले अब खुल कर खेल रहे हैं...इनसे पार पाने के ( या बच निकलने के ) 4 रास्ते हैं...

    1. इन्हें किसी तरह गुस्सा दिलाया जाए...( कहिये तो मैं कोई व्यक्तिगत आक्षेप लगाऊँ...)

    2 . यथार्थवादी सन्देश युक्त ग़ज़लों को एक अलग नाम जैसे - फज़ल या ऐसा ही कोई नाम बहुमत से पारित कर दिया जाए........यहाँ ये हम लोगों के मुकाबले नहीं टिकेंगे...हा..हा..हा.. 

    3. मेरा अपना मानना है कि ग़ज़ल का सौन्दर्य content को छुपाव के साथ पेश करने में है...जैसे बदली में चाँद....
    अगर इस शर्त को यथार्थपरक content निभाता है, तो स्वीकार्य होना चाहिए...
    4. अंतिम बात यह कि पोस्ट का मूल मुद्दा तो यह है कि गाफिल भाई पालकी में लाश नहीं ढोएंगे.......कोई इस बात से रोके तो उस पर धावा बोला जाए....
    फैसला कर के आदेश दें....
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  • Chandra Bhushan Mishra Ghafil शशांक सर अब कमान आपके हाथ
  • Ish Mishra गाफिल भाई, मैं तो गज़लगो हूँ नहीं तो गज़ल को बख्शने का सवाल ही नहीं उठाता. फैज़, शाहिर, जालिब. साहिर, दुष्यंत, इब्ने इंसान इन लोगों ने तो बख्सा नहीं. ये तो गज़ल को० माशूक के जलवो से मुक्त कर खाक्नाशीनों के जज्बात तक पहुंचा दिए और बेवा के माथे की शिकन तक ले जा चुके; सुहाग के सेज की लीज-लिजी भावुकता से उठाकर मेहनतकश की जंग-ए-आज़ादी तक पहुंचा दिए और ये ग़ज़लें देश-विदेश तक लोकप्रिय हो गयीं.इतिहास की गति को पलता नहीं जा सकता. आनेवाली पीढ़ियों आग्रह कीजिये कि वे इसे माशूक की ज़ुल्फ़ से बाहर न आने दें.
    अनुवाद देखिए
  • Ish Mishra चलिए हबीब जालिब की एक गज़ल सुनाता हूँ:

    गर फिरंगी का दरवान होता

    जीना किस कदर आसान होता

    झुका कर सर जो बन जाता सर मैं
    लीडर अजीमुस्शान होता 
    इंग्लिश बला की चुस्त होती
    बला से न उर्दू-दान होता
    बच्चे मेरे अमरीका में पढते
    मैं हर गर्मियों इंग्लिस्तान होता
    जमीने मेरी हर सूबे में होतीँ
    वल्लाह मैं सदर-ए-पाकिस्तान होता.
    अनुवाद देखिए
  • Shalini Pandey मेरे बाद कितनी मजे की बातें हुईं यहाँ वाह वाह
  • Shashank Shekhar कहानी अभी ख़त्म नहीं हुई है दोस्तों !
  • Shashank Shekhar .....यह सारी बहस नूरा कुश्ती है... Ish सर छद्म वामपंथी हैं....

    भेदिये ने अभी -अभी खबर दी है...कि ईश सर लगभग हर दिन प्रेम पत्र लिखते हैं...

    ईश सर या तो इस बात का खंडन करें या कम-से कम ३ शेर बताएं जो उन्होंने अपने खतों में लिखे...
    अनुवाद देखिए
  • Shalini Pandey नमस्ते शशाँक सर! तो कृपा पूर्वक आगे की कहानी सुनाई जाए! मैं बैठी हूँ इत्मिनान से पाल्थी मारकर श्रोता दीर्घा में
  • Shashank Shekhar Shalini, छोड़ना मत ...आगे की कहानी पीछे है...
    अनुवाद देखिए
  • Shalini Pandey सर! पीछे यानी पीछे की तरफ मुँह करूँ क्या?
  • Shashank Shekhar Ish सर ये भी बताएं कि उनके कितने प्रेम पत्रों से उन्हें कितने प्रेम की प्राप्ति हुई और कितने क्रांतिकारी पत्रों से कितनी क्रांतियाँ हुईं ?
    अनुवाद देखिए
  • Shalini Pandey शशाँक सर! और बात तो मैं नहीं जानती पर यहाँ तो भीषण ख़ून-ख़राबे की अति प्रबल सम्भावना दिख रही है
  • Shalini Pandey अरे निमिषा तुम भी कूद पड़ी इस युद्ध में कैसी हो?
  • Shashank Shekhar Shalini, ऐसा नहीं है ... Ish सर पर्याप्त दयालु हैं.....प्रेम पत्रों वाली बात उन्होंने ही कहीं कही थी......अब कोई टिप्पणी नहीं ! प्रेम पत्रों को ढूँढने में समय लग सकता है...
    अनुवाद देखिए
  • Virendra Pratap Singh prem patra,kranti patra dono vidha me ish mahir hai,alld me saflta to nahi mil pai thi,delhi me kya hua,ish hi prakash dal payege,vaise jujharupan me koi kami nahi hai chahe jo bhi field ho. kyo,ish,ha...ha....
    अनुवाद देखिए
  • Shalini Pandey निमिषा यार तू कहाँ छूमंतर हो गयी
  • Ish Mishra जब मैं हास्टल का वार्डन था तो बिना सजा दिए बच्चों को "पढ़ा" रहा था. एक यू.पी.एस.सी. टाइप का चिरकुट विद्यार्थी किसी अन्य विद्यार्थी को निकालने की सलाह दे रहा था. मैंने कहा मैं यह सम्मान किसी को नहीं दे सकता. वह बोला "सर, आप अच्छे प्रशासक नहीं हैं". मैंने कहा मैं प्रशासक ही नहीं हूँ, अच्छे-बुरे की बात ही नहीं उठती. मैं एक ही काम करता था, "हीरो" लोगों को शो काज नोटिस देता था और बच्चों का शब्द ज्ञान बढाने के लिये नोटिस बोर्ड पर लगवा देता था. उसे बच्चे प्रेम पत्र कहते थे. बाकी प्रेम पत्रों और प्रेम की बात के लिये उकसाकर तुम सार्वजनिक मंच से मेरे "संस्कार" और चरित्र की निंदा करवाना चाहते हो. मेरी तो शादी १७ साल का होने से २८ दिन पहले हो गयी थी. जो भी प्रेम होंगे वे विवाह-पूर्व या विवाहेतर होंगे जिनके बारे में कभी अलग से बता दूंगा.(इसके बाद की कहानी के पात्र और स्थान काल्पनिक हैं किसी संयोग की जिम्मेदारी लेखक की नहीं है) चलो एम.ए. में लिखे एक 'प्रेम-पत्र" की अंतिम पंक्तियाँ सुनाता हूँ. पहले के २-३ पैरा कभी याद आ गया तब देखूंगा.



    ...............

    तो इसे विदागीत समझो
    फिर भी उस राह दिखूं 
    तो समझना पुरानी यादें यूँ ही नहीं छूटतीं
    फिर अतीत भी कोई गर्द नहीं 
    जिसे झाड दिया जाए
    एक उडती कविता में
    पर एक खास बात 
    जो तुमसे मतलब रखती है
    एक बुनियादे फर्क होगा 
    ऐसा अब भंगेड़ी सा नशे में ही करूँगा
    नशा फिर भी कुछ क्षणों का होता है
    ज़िंदगी काफी अछूती रह जाती है
    उन अछूते क्षणों को ही सच मानना 
    भूल जाना मेरे उन उन्मादों उन विकृतियों को 
    जो मेरी आदमियत के चश्मदीद गवाह हैं
    माँ के दूध से चलकर साथ हैं जो अब तक
    जिन्हें मैंने सहेज कर रखा है
    और जिन पर मुझे नाज़ है .
    अनुवाद देखिए
  • Chandra Bhushan Mishra Ghafil Shashank सर आपको अच्छी श्रोता मिल गयी है...लगता है मेरी पोस्ट को प्रमोट करने का जिम्मा शालिनी ने ही उठा रखा है
  • Shashank Shekhar Ish सर . भूल जाना मेरे उन उन्मादों उन विकृतियों को

    जो मेरी आदमियत के चश्मदीद गवाह हैं......

    सर बहुत अच्छी कविता ! बाकी का भी इंतज़ार रहेगा...

    अर्ज़ है......
    वरना क्या था सिर्फ तरतीबे अनासिर के सिवा 
    ख़ास कुछ बेताबियों का नाम इन्सां हो गया...
    तरतीबे अनासिर = पंचतत्त्वों का मेल
    अनुवाद देखिए
  • Chandra Bhushan Mishra Ghafil Ish सर आपका इंतजार हो रहा है
  • Ish Mishra मैं किसी खुशफहमी नहीं था

    पर एक तिरता हुआ एहसास 

    आता कुछ इतना करीब

    छू जाता था अन्तस्तल की गहराइयों को
    मालुम था मौजों की नीयत
    फिर भी उतारा था किश्ती तेरे नाम पर
    अनुवाद देखिए


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