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शुक्रवार, नवंबर 23, 2012

शहर को जलते देखा

हुस्न को आज सरे राह मचलते देखा
एक शोला सा उठा शह्र को जलते देखा
मैं तो ग़ाफ़िल था तिरे ज़ल्वानुमा होने से
मोम तो मोम थी पत्थर भी पिघलते देखा

-‘ग़ाफ़िल’

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5 टिप्‍पणियां:

  1. वाह सर वाह क्या बात है उम्दा, लाजवाब
    सादर अरुन शर्मा
    www.arunsblog.in

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  2. बहुत सुन्दर चित्र और जो कहा |
    आशा

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (25-11-2012) के चर्चा मंच-1060 (क्या ब्लॉगिंग को सीरियसली लेना चाहिए) पर भी होगी!
    सूचनार्थ...!

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