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रविवार, नवंबर 25, 2012

ख़ूबसूरत सी क़ज़ा याद करो!

वह शरारत वो अज़ा याद करो!
अपने बचपन का मज़ा याद करो!
मार खाना पलट हथेली पर
मास्टर जी की सजा याद करो!
ऐसी यादें अगर फ़रेब लगें
यार ग़ाफ़िल! तो बजा याद करो!
कल जो बस तुमको मिलने वाली है
ख़ूबसूरत सी क़ज़ा याद करो!

(अज़ा=तक़्लीफ़, बजा=सत्य, क़ज़ा=मौत)
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8 टिप्‍पणियां:


  1. मार खाना पलट हथेली पर
    मास्टर जी की सजा याद करो!

    वाह !
    याद आ गया … महज एक बार मुर्गा बनाया था , बनना नहीं आया तो पीठ पर लात मारी थी … और मैं भाग कर घर आ गया और मेरे बाबूजी मास्टरजी को फटकारने स्कूल चले थे साथ …
    … और बेचारे मास्टरजी भाग कर घर चले गए … और इम्तिहानों से पहले स्कूल नहीं आए … :)

    ग़ाफ़िल जी अच्छी रचना है …
    …लेकिन इस रचना को क्या कहेंगे ? ग़ज़ल ?

    शुभकामनाओं सहित…

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    1. राजेन्द्र भाई शुक़्रिया! इस रचना को तो आज हम ग़ज़ल नहीं ही कह सकते इसे नज़्म कह सकते हैं क्योंकि ग़ज़ल के सारे शे’र स्वतन्त्र होते हैं हां अगर एक शे’र में बात न बने तो कत्आ बीच में डाल सकते हैं पर जिस रचना के सारे शे’र सम्बद्ध हों एक को समझकर ही दूसरे का अर्थ निकाला जा सके या पूरी रचना एक ही भाव लिए हो वह नज़्म की श्रेणी में आता है...पहले एक ही भाव की ग़ज़ल लिखी जाती थी उसे मुसल्लम ग़ज़ल कहते थे पर नज़्म के चलन के बाद उसकी ज़ुरूरत न रही

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    2. गज़ल के बारे में बहुत अच्छी व जरुरी जानकारी मिली ...

      बहुत बहुत धन्यवाद गुरु जी

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  2. आदरणीय ग़ाफ़िल जी
    आभार शंका-समाधान हेतु …

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  3. आपकी उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार 27/11/12 को राजेश कुमारी द्वारा चर्चा मंच पर की जायेगी आपका चर्चा मंच पर स्वागत है!

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  4. मन के कोने में सजी, बाल्यकाल की याद।
    क्या बचपन मिल जायेगा, इस जीवन के बाद।।

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  5. बहुत सुन्दर नज़्म है sir ji :))

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