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रविवार, सितंबर 30, 2012

आईने पर कुछ तरस तो खाइए!

आइए तो इत्तिलाकर आइए!
जाइए तो बिन बताए जाइए!

दिल मेरा है साफ़ मिस्ले-आईना,
अपने चेहरे को तो धोकर आइए!

पाइए! जी पाइए! बेहद सुकूँ,
चश्म ख़म करके ज़रा मुस्काइए!

रूख़ को झटके से नहीं यूँ मोड़िए!
आईने पर कुछ तरस तो खाइए!

हुस्न है बा-लुत्फ़ जो पर्दे में हो,
आईने से भी कभी शर्माइए!

छोड़िए! 'ग़ाफ़िल' को उसके नाम पर,
आप तो ग़ाफ़िल नहीं हो जाइए!

कमेंट बाई फ़ेसबुक आई.डी.

शनिवार, सितंबर 01, 2012

हसीनो के नख़रे उठाया करो!

कभी ख़ुद की जानिब भी आया करो!
आईना देखकर मुस्कुराया करो!!

ग़फ़लतों का पुलिंदा उठाये न उट्ठे,
उसे रफ़्ता रफ़्ता घटाया करो!

जमाने की रंगत का है लुत्फ़ लेना
तो ख़ुद की भी रंगत मिलाया करो!

वो फिर मुस्कुराई तुझे देख करके
गरेबाँ तो रफ्फ़ू कराया करो!

छुपाकर है रक्खा मेरे दिल को तुमने
मैं तड़फा बहुत हूँ नुमाया करो!

मज़े ख़ूब होते हैं नखरों में ग़ाफ़िल!
हसीनो के नख़रे उठाया करो!!