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शनिवार, दिसंबर 28, 2013

तीन संजीदा एहसास

1- 
"इसके सिवा कि तुम्हारा नर्म गुदाज़ हाथ अपने सीने में जबरन भींच लूँ बिना तुम्हारा हाथ दुखने की परवाह किये, मेरे पास और कोई चारा नहीं बचा क्योंकि मेरे लिए अब अपने दिल की बेकाबू हुई जा रही धड़कन को काबू करना बेहद ज़ुरूरी हो गया है..."  उसने कहा था 

2.
उसने कहा था अरे! तू तो कोई फ़जूल काम नहीं करता फिर आज कैसे? अगर कुछ ज़्यादा न मान तो अब तेरा मुझसे मिलने आना वेसे ही फ़जूल है जैसे ता’उम्र किसी को नज़रंदाज़ करने के बाद उसकी क़ब्र पर दीया जलाने जाना

3.
...उसने जब पहली दफा घूँघट उठाया तो घूँघट उठाते ही बेतहाशा ख़ुशी से चिल्ला पड़ा- "या अल्ला! तेरा लाख लाख शुक़्र है कि तूने मुझे मेरे जैसी ही बदसूरत शरीक़े-हयात अता फ़रमाया वर्ना मैं ता'उम्र सांसत में रहता" और उसका चेहरा अजीब सुकून भरे एहसास से दमक उठा।

मंगलवार, दिसंबर 24, 2013

अरे! मैं कैसे नहीं हूँ ख़ास?

हवा का इक झोंका हूँ मैं
नहीं टोकी-टोका हूँ मैं
न आऊँ तो मेरा इंतजार
आ भी जाऊँ तो सिर्फ़ बयार
तुम्हारी साँसों का उच्छ्वास
अरे! मैं कैसे नहीं हूँ ख़ास?

धरूँ मैं रूप अगर विकराल
बनूं फिर महाकाल का काल
बनूं जो मन्द-सुगन्ध-समीर
हरूँ प्रति हिय की दारुण पीर
संयोगीजन का हृद-उल्लास
अरे! मैं कैसे नहीं हूँ ख़ास?

प्रकृति की भाव-तरणि निर्द्वन्द्व
तैरती प्रमुदित मन स्वच्छन्द
कर रही सृष्टि-सिन्धु को पार
डाल मुझ पर सारा सम्भार
एक ग़ाफ़िल पर यह विश्वास
अरे! मैं कैसे नहीं हूँ ख़ास?



शनिवार, दिसंबर 07, 2013

इसी मोड़ से गुज़रा है फिर कोई नौजवाँ और कुछ नहीं

ये पड़ाव भी क्या पड़ाव है मिला सब यहाँ और कुछ नहीं
कोई राह तन्‌हा जूँ बन रही इक कारवाँ और कुछ नहीं

यूँ सटे सटे से ये फ़ासले नज़्दीकियाँ यूँ ज़ुदा ज़ुदा
यूँ ठहर रही मेरी ज़िन्दगी गो रवाँ रवाँ और कुछ नहीं

ये हिमालयों की ऊँचाइयाँ और वादियों का ये गहरापन
खुली आँख तो यही दिख रहा है धुआँ धुआँ और कुछ नहीं

यूँ उदास सी कोई खिलखिली किसी ज़ख़्म को तो न भर सकी
सिसकारियाँ ही नमू हुईं याँ जवाँ जवाँ और कुछ नहीं

कोई रौशनी किसी रात का जो हसीन ख़्वाब जला गयी
फिर सहर थी, अख़बार थे व बयाँ बयाँ और कुछ नहीं

ये जो गर्द अब तक उड़ रही इसे देख कर हैराँ न हो
इसी मोड़ से गुज़रा है फिर कोई नौजवाँ और कुछ नहीं

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, अक्तूबर 13, 2013

समझो बहार आई

कोई फूल महक जाए समझो बहार आई
कोई गीत गुनगुनाए समझो बहार आई

सुलझी हुई सी पूरी ये प्यार वाली डोरी
गर फिर से उलझ जाए समझो बहार आई

सूरत की भोली-भाली वह क़त्ल करने वाली
ख़ुद क़त्ल होने आए समझो बहार आई

कर दे जो क़रिश्मा रब गरचे विसाल की शब
गुज़रे न ठहर जाए समझो बहार आई

गोया कि है ये मुश्किल कोई हुस्न इश्क़ को फिर
आकर गले लगाए समझो बहार आई

ग़ाफ़िल भी जिसका अक्सर जगना हुआ मुक़द्दर
सपने अगर सजाए समझो बहार आई

शुक्रवार, अक्तूबर 11, 2013

आज मैं जैसा हूं तूने ही बनाया मुझको

मेरे हाथों में पहली बार आज पत्थर है,
आज ही आईना मेरा है चिढ़ाया मुझको।
आज लोगों ने मेरी वाह वाह करते हुए;
क़ितनी ख़ूबी से जमींदोज़ कराया मुझको।।

मुझको मालूम था अंजाम क़लमकारी का,
बीता फ़ैशन है जो शूली पे चढ़ाया मुझको।
ऐ ज़माना तू मुझे आज गालियाँ दे ले;
मैं न मुँह खोलूंगा के तूने सताया मूझको।।

इतना ग़ाफ़िल भी नहीं होता गर जगा देती,
तूने ही लोरियाँ गा गा के सुलाया मुझको।
माँ शिक़ायत न समझ गो कि हक़ीक़त है यह;
आज मैं जैसा हूं तूने ही बनाया मुझको।।

हाँ नहीं तो!

गुरुवार, अक्तूबर 10, 2013

पर ग़ज़ल गुनगुनाने को दिल चाहिए

मेरे सपनों में आने को दिल चाहिए
और मुझे आजमाने को दिल चाहिए

बात बिगड़ी हुई भी है बनती मगर
बात बिगड़ी बनाने को दिल चाहिए

याद में मेरी मुद्दत से आए न वे
याद में मेरी आने को दिल चाहिए

बात सुनने सुनाने से हासिल भी क्या
बात सुनने सुनाने को दिल चाहिए

आईना देखते तो हैं सब बारहा
आईना पर दिखाने को दिल चाहिए

होश में जोश आता है किसको भला
होश में जोश लाने को दिल चाहिए

दिल को लूटा है सब ने बड़े शौक से
शौक से दिल लुटाने को दिल चाहिए

बोतलों से ढलाना है आसाँ बहुत
चश्म से मय ढलाने को दिल चाहिए

गोया रिश्ते बनाना तो मामूल है
फिर भी रिश्ते निभाने को दिल चाहिए

एक ग़ाफ़िल ने भी लिख तो डाली ग़ज़ल
पर ग़ज़ल गुनगुनाने को दिल चाहिए

हाँ नहीं तो!

मंगलवार, अक्तूबर 01, 2013

विचरना अब चाहता है मेरा मन

क्या हुई तासीर तेरी छुअन की
अब नहीं झंकृत है होता तन-बदन
वह खुमारी सहसा अब छाती नहीं
नृत्य अब करता नहीं है मेरा मन

तू वही तो है? या कि ग़ाफ़िल हूँ मै?
प्रश्न यह पर्वत सा बनता जा रहा
ऐसे दोराहे पे आकर हूँ खड़ा
रास्ता कोई नहीं है भा रहा

है अनिश्चित अब मेरी भवितव्यता
अब तू अपने वास्ते कुछ कर जतन
सारे लोकाचार से उन्मुक्त हो
विचरना अब चाहता है मेरा मन

सोमवार, सितंबर 30, 2013

लूटि लियो मेरो दिल को गल्ला

लूटि लियो मेरो दिल को गल्ला

ग़ाफ़िल! मैं तो सेठानी थी
कियो भिखारिन छिन में लल्ला

सौंपि दीन्हि तोहे सिगरौ पूँजी
मान बढ़ायो केकर भल्ला

जौ जानित हौ निपट स्वारथी
काहे फाँनित आपन जल्ला

अब तौ चिरई खेत चूँगि गै
व्यर्थ है मोर मचाइब हल्ला

लूटि लियो मेरो दिल को गल्ला

हाँ नहीं तो!

शनिवार, सितंबर 14, 2013

मुझे मेरा यार लूटा

(साँप का चित्र गूगल से साभार)

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गुरुवार, सितंबर 05, 2013

फिर भी नफ़रत सीख ले!

मान जा ऐ दिल
है बड़ी मुश्क़िल
फिर भी नफ़रत सीख ले!

तुझको जीना है
जख़्म सीना है
रात काली है
और दिवाली है

लुट चुकी अस्मत
मिट चुकी क़िस्मत
हुस्न है फन्दा
फंस गया बन्दा

कहता ये ग़ाफ़िल
ना भी बन क़ातिल
फिर भी नफ़रत सीख ले!

मान जा ऐ दिल
है बड़ी मुश्क़िल
फिर भी नफ़रत सीख ले!

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रविवार, अगस्त 25, 2013

फिर क़यामत के प्यार लिख डाला

फिर क़यामत के प्यार लिख डाला।
और फिर ऐतबार लिख डाला।।

लिखना चाहा उसे जभी दुश्मन,
न पता कैसे यार लिख डाला।

उसने क़ातिल निगाह फिर डाली,
उसको फिर ग़मगुसार लिख डाला।

याद आती न अब उसे मेरी,
मैंने तो यादगार लिख डाला।

लिखते लिखते न लिख सका कुछ तो,
तंग आ करके दार लिख डाला।

मैं हूँ ग़ाफ़िल यूँ ग़फ़लतन ये ग़ज़ल,
देखिए क़िस्तवार लिख डाला।।

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मंगलवार, जुलाई 30, 2013

आख़िर मैंने चान (चाँद) लिख दिया

आख़िर मैंने चान (चाँद) लिख दिया।
सागर में तूफ़ान लिख दिया॥

आसमान में इक तारे सँग,
मस्ती करता उजियारे सँग,
छत पर मुझको लखा व्यँग्य से,
झट मैंने व्यवधान लिख दिया।
आख़िर मैंने चान लिख दिया॥

चान गया फिर बूढ़े वट पर,
अश्रु-चाँदनी टप-टपकाकर
मुझको द्रवित कर दिया चन्ना,
मैंने निर्भयदान लिख दिया।
आख़िर मैंने चान लिख दिया॥

दरिया अपनी रौ में चलती
सिमट-सकुच सागर से मिलती,
ग़ाफ़िल तुझको क्या सूझी के
बिन बूझे गुणगान लिख दिया।
आख़िर मैंने चान लिख दिया॥

हाँ नहीं तो!

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शुक्रवार, जुलाई 12, 2013

आओ!

आओ!
मज़हबों को दरकिनारकर
इंसानियत की पाठशाला खोलें
पहले इंसान तो हो लें!

हां नहीं तो!

मंगलवार, जून 18, 2013

मैं तुझे आजमा के देख लिया

ख़ूब अपना बना के देख लिया
मैं तुझे आजमा के देख लिया
तुझको ख़ुश देखने की ख़्वाहिश में
मैंने ख़ुद को गंवा के देख लिया

बात करके मुझे बेज़ार न कर!
हो चुका ख़ूब अब लाचार न कर!
तेरी ख़ुदगर्ज़ियाँ छुपी न रहीं
बख़्श दे मुझको और प्यार न कर!

अब तो अपना जमाना चाहता हूँ
ख़ुद को अब आजमाना चाहता हूँ
तेरी ख़ुशियों से मैं क्यूँ ख़ुश होऊँ
ख़ुद की ख़ुशियों में जाना चाहता हूँ।।

मंगलवार, जून 11, 2013

कोई मुझे रुला गया

किसी की जान जा रही, किसी को लुत्फ़ आ गया।
कोई सिसक सिसक रहा, कोई है गीत गा गया॥

कोई मज़ार दीपकों की रोशनी में खिल रही,
किसी की ज़िन्दगी को अन्धकार थपथपा गया।

किसी की मांग धुल रही, किसी की सेज सज गयी,
कोई यहाँ से जा रहा, कोई यहाँ पे आ गया।

यहीं पे जीत हार है, यहीं पे द्वेष प्यार है,
कोई किसी को भा गया, कोई किसी को भा गया।

और यह जहाँ भी क्या अज़ीब रंगतों का है जहाँ,
कोई मुझे हंसा रहा, कोई मुझे रुला गया॥

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शुक्रवार, मई 17, 2013

अब तो उनको आजमाना चाहिए

अब हमें भी हक़ जताना चाहिए।
अब तो उनको आजमाना चाहिए॥

कब तलक होकर जमाने के रहें,
अब हमें ख़ुद का जमाना चाहिए।

है दीवाना चश्म का ख़ुशफ़ह्म के
चश्म को भी अब दीवाना चाहिए।

दिल है नाज़ुक टूटता है बेखटक,
भीड़ में उसको बचाना चाहिए।

उनके आने का बहाना कुछ न था,
उनको जाने का बहाना चाहिए।

अब तो शायद हो चुकी पूरी ग़ज़ल,
यार ग़ाफ़िल! अब तो जाना चाहिए॥

हाँ नहीं तो!

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शुक्रवार, मई 10, 2013

भ्रमित, स्तब्ध

आज
चला गया सहसा
अपने पार्श्व अवस्थित कमरे में
जो
मेरी जी से भी प्यारी राजदुलारी का है
जिसे
मैंने कल ही तो बिदा किया है
भ्रमित, स्तब्ध
देखता रहा मैं
सब रो रहे हैं धार-धार
कमरे के दरो-दीवार,
पलंग, बिस्तर, आदमकद आईना
या कि मेरी आँखें

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बुधवार, अप्रैल 17, 2013

एगो टैक्सी छाप गीत-

तोहरे नाक की नथुनिया हमरा जान मारे ली।
तोहरे माथ की चंदनिया हमरा जान मारेली।।

हमरा प्यार से बुलावन, तोहरा दूरि चलिजावन,
झूठै बतिया बनावन, ज़्यादा नख़रा देखावन,
तोहरी मीठी मुसकनिया हमरा जान मारेली,
तोहरी चंचल चितवनिया हमरा जान मारेली।

तनवा सरसेला ख़ूब, मनवा हरसेला ख़ूब,
रस बरसेला ख़ूब, लोगवा तरसेला ख़ूब,
तोहरी मधुरी बोलनिया हमरा जान मारेली,
तोहरी लटलटकनिया हमरा जान मारेली

संझवां छत पर घुमायी, फोन लइकै बतियायी,
ताहरा बाल झटकायी ग़ाफ़िल वइसै बौराई,
मैक्सी की फररर फरकनिया हमरा जान मारेली,
तोहरी चाल मस्तनिया हमरा जान मारेली।।

हाँ नहीं तो!

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रविवार, अप्रैल 14, 2013

केतना हमके सतइबू हमार सजनी!

चलिए टेस्ट बदलते हैं! प्रस्तुत है एक गीत-

केतना हमके सतइबू हमार सजनी!
कहवाँ हमसे लुकइबू हमार सजनी!!

जउन मन भावै ऊ कहि डारा बतिया,
नाहीं पछितइबू तू सारी-सारी रतिया,
चला जाबै हम होत भिनसार सजनी!
केतना हमका सतइबू हमार सजनी!!

कइकै बहाना तू बचि नाहीं पइबू,
पीछा नाहीं छोड़ब हम केतनौ छोड़इबू,
ताना मारौ चाहे हमका हजार सजनी!
केतना हमका सतइबू हमार सजनी!!

ग़ाफ़िल चलि जाई त फेरि नाहीं आई,
मानी नाहीं फिर ऊ कउनौ मनाई,
चाहे छूटि जाय पूरा घर-बार सजनी!
केतना हमका सतइबू हमार सजनी!!

हां नहीं तो!

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बुधवार, अप्रैल 10, 2013

अब तो आबे-हयात फीके से

हो चुके फ़ाकेहात फीके से।
आज के इख़्तिलात फीके से॥

हसीन मिस्ले-शहर मयख़ाने,
लगते अब घर, देहात फीके से।

साथ साक़ी का हाथ में प्याला,
यूँ तो हर एहतियात फीके से।

बस उसके ख़ाब में मेरा खोना
और हर मा’लूमात फीके से।

चख चुका अब शराबे-लब ग़ाफ़िल,
अब तो आबे-हयात फीके से॥

(फ़ाकेहात=ताज़े हरे मेवे जैसे सेब आदि, इख़्तिलात= चुम्बन आलिंगन आदि, आबे-हयात= अमृत)

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शुक्रवार, मार्च 22, 2013

अपलक

रात
सड़क के किनारे
चिल्लाता रहा
वह लहूलुहान
गुज़र रही थी
एक बारात
बैण्डबाजे के शोर में
डूब गयी
उसकी आवाज़
सुबह
सड़क के किनारे
पाई गयी
जमे ख़ून में लिपटी
एक लाश
भीड़ को घूरती
अपलक।

-‘ग़ाफ़िल’

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मंगलवार, मार्च 19, 2013

आग में इस क़दर धुंआ क्या है?

कोई बतला दे के हुआ क्या है?
आग में इस क़दर धुंआ क्या है?

हुस्न वालों की वफ़ा के पीछे
एहतियातन छुपी जफ़ा क्या है?

ज़मीन-ओ-आसमाँ भी मिलते हैं,
आपमें मुझमें फ़ासला क्या है?

उसकी नज़रों की ही इनायत है
फिर दुआ और बद्दुआ क्या है?

न बोले आप अब वक़्ते-रुख़्सत
न पूछूँगा मेरी ख़ता क्या है?

मैं तो ग़ाफ़िल हूँ मगर आप नहीं,
यूँ अदावत का मुद्दआ क्या है?

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बुधवार, जनवरी 30, 2013

जो लिख दिया सो लिख दिया!

यह बात भी क्या बात है ‘जो लिख दिया सो लिख दिया’?
याँ क्या तेरी औक़ात है जो लिख दिया सो लिख दिया??

गेसू को लिख डाला घटा, चेहरे को चन्दा लिख दिया,
पर क्या ये सच्ची बात है जो लिख दिया सो लिख दिया?

याँ क़ुदरतन हालात में तब्दीलियाँ लाज़िम रहीं,
फिर क्यूँ अड़ाये लात है जो लिख दिया सो लिख दिया?

घर फूँककर ख़ुद का ही ख़ुद जो रोशनी पर है फ़िदा
देखा? के काली रात है जो लिख दिया सो लिख दिया?

यूँ तो कोई ग़ाफ़िल याँ सद्रे-कारवां दिखता नहीं,
शिव की यही बारात है? जो लिख दिया सो लिख दिया??

हाँ नहीं तो!

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मंगलवार, जनवरी 01, 2013

नववर्ष (2013) की मंगल कामना



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