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सोमवार, नवंबर 17, 2014

शब्बाख़ैर!

न ग़ाफ़िल हो परीशाँ नाज़नीनों की है यह आदत
के सब ख़्वाबों में मिलती हैं तज़ुर्बेकार कहते हैं

शब्बाख़ैर!

-‘ग़ाफ़िल’

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