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रविवार, नवंबर 30, 2014

ग़ाफ़िल की सुह्बतों का असर भी तो कम नहीं

रुख़ यूँ सँवारने का हुनर भी तो कम नहीं।
आरिज़ पे आँसुओं का गुहर भी तो कम नहीं।।

सैलाब और प्यास नमू एक ही जगह,
ऐसी ख़ुसूसियत-ए-नज़र भी तो कम नहीं।

एक क़त्आ-

रुस्वा न क्यूँ हो इश्क़ ज़माने में तू बता!
उल्फ़त में तेरी, जी का ज़रर भी तो कम नहीं।
मरहूम मेरे इश्क़ की, मानिन्दे रूह यार!
आवारा घूमती सी ख़बर भी तो कम नहीं।।

मक़्ता सहित दो शे’र और-

शीशा-ए-दिल का शग़्ल अगर टूटना है तो
इक संगज़ार से ये शहर भी तो कम नहीं।

नश्तर चला है दिल को मगर क्या हुई ख़बर
ग़ाफ़िल की सुह्बतों का असर भी तो कम नहीं।।

(आरिज़=गाल, गुहर=गौहर यानी मोती का बहुवचन, ख़ुसूसियत-ए-नज़र=नज़र की ख़ासियत, ज़रर=नुक़सान, संगज़ार=पत्थरों का बाग़ अर्थात पत्थरों से अटी जगह)

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, नवंबर 22, 2014

ऐ सुब्ह सबा तेरी अगर मेरे दर आए

ऐ सुब्ह सबा तेरी अगर मेरे दर आए
जाना के दरीचों से गुज़र कर इधर आए

दोस्तो! आज की ख़ुशगवार सुब आप सबको बहुत-बहुत मुबारक हो

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, नवंबर 19, 2014

पी जाइए पर अश्क़ बहाया न कीजिए

इन मोतियों को बे-सबब जाया न कीजिए
पी जाइए पर अश्क़ बहाया न कीजिए
भर जाएंगे ये ज़ल्द इन्हें ढांक के रखिए
ज़ख़्मों को सरे-राह नुमाया न कीजिए

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, नवंबर 17, 2014

शब्बाख़ैर!

न ग़ाफ़िल हो परीशाँ नाज़नीनों की है यह आदत
के सब ख़्वाबों में मिलती हैं तज़ुर्बेकार कहते हैं

शब्बाख़ैर!

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, नवंबर 07, 2014

हमने देखा है

तेरी जुल्फ़ों में बियाबान हमने देखा है
उसमें उलझा हुआ इंसान हमने देखा है
हमने देखा है सबा कैसे आग भड़काई
और जला किस तरह अरमान हमने देखा है

-‘ग़ाफ़िल’

(चित्र गूगल से साभार)

मंगलवार, नवंबर 04, 2014

वो ज़माना और था

वो ज़माना और था अब ये ज़माना और है।
वो तराना और था अब ये तराना और है।।

यार के जख़्मों को धोया आँसुओं की धार से,
वो दीवाना और था अब ये दीवाना और है।

टूटता था दिल तो बन जाती हसीं इक दास्ताँ,
वो फ़साना और था अब ये फ़साना और है॥

देखते वे ग़ैर-जानिब क़त्ल हो जाते थे हम,
वो निशाना और था अब ये निशाना और है।

मुद्दई तब भी थीं ग़ाफ़िल! ग़ालिबन् नज़रें यही,
वो बहाना और था अब ये बहाना और है।।

-‘ग़ाफ़िल’