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मंगलवार, दिसंबर 09, 2014

दुबारा हँसके

जैसे मामूल निभाया है दुबारा हँसके।
फिर कोई फूल नुमाया है दुबारा हँसके॥

जुल्फ-ज़िन्दाँ में ही इक उम्र गुज़ारी हमने,
फिर कोई जाल बिछाया है दुबारा हँसके।

बस अभी दिल के झरोखों की मरम्मत की थी,
फिर कोई संग चलाया है दुबारा हँसके।

नीद ही टूटती आयी थी ख़ाब बाकी थे,
फिर कोई ख़ाब दिखाया है दुबारा हँसके।

थी कहाँ फ़िक्र ही 'ग़ाफ़िल' को गुमशुदा दिल की,
फिर कोई याद दिलाया है दुबारा हँसके॥
(मामूल=सामान्यचर्या, नुमाया=द्रष्टव्य, ज़ुल्फ़ जिन्दाँ=ज़ुल्फ़ रूपी कारागार, संग=पत्थर)
                                                               -ग़ाफ़िल

सोमवार, दिसंबर 08, 2014

बेजा क़रार आया

बहुत तुरपाइयाँ रिश्तों की कीं फिर-फिर दरार आया।
तुम्हारी एक मीठी बोल पर बेजा क़रार आया।।

ग़मे-फ़ुर्क़त का जो अहसास था वह फिर भी थोड़ा था,
जो ग़म इस वस्ल के मौसिम में आया बेशुमार आया।

तुम्हारी बेरूख़ी का यह हुआ है फ़ाइदा मुझको,
पसे-मुद्दत मेरा ख़ुद पर यक़ीनन इख़्तियार आया।

सहेजो इशरतों को ख़ुद की जो इक मुश्त हासिल हैं,
मुझे गर लुत्फ़ आया भी कभी तो क़िस्तवार आया।

ऐ ग़ाफ़िल! होश में आ नीमशब में फिर हुई हलचल,
तुझे तुझसे चुराने फिर से कोई ग़मगुसार आया।।

(पसे-मुद्दत=मुद्दत बाद, नीम शब=अर्द्धरात्रि, ग़मगुसार=सहानुभूति रखने वाला)
                                                        -गाफ़िल
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रविवार, दिसंबर 07, 2014

जा रहे हैं वो मुस्कुराते हैं

जब हमारी गली से जाते हैं।
पाँव उनके भी डगमगाते हैं।।

जो दीये बुझ चुके थे यादों के,
राहे उल्फ़त में जगमगाते है।

अश्क हैं के ठहर नहीं सकते,
चश्म बेवक़्त डबडबाते हैं।

हमतो आ करके ख़ार से चुभते,
वे तो जाकर भी गुल खिलाते हैं।

उन्से क्या आशिक़ी की बातें हों,
बात बातों में जो बनाते हैं।

है यह भी तर्ज़े क़ातिली ग़ाफ़िल!
जा रहे हैं वो मुस्कुराते हैं।।

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, दिसंबर 03, 2014

बस वही दूर हुआ जा रहा मंजिल की तरह

मैंने भी चाहा बहुत जिसको जानो दिल की तरह।
दूर हो जाता वही वक़्त पे मंजिल की तरह।।

ज़ुल्फ़े ज़िन्दाँ में हूँ मैं क़ैद एक मुद्दत से,
कोई आ जाये मेरे वास्ते काफ़िल की तरह।

उसकी तीरे नज़र है, रू-ब-रू दिल है मेरा,
पेश आये तो कभी हाय वो क़ातिल की तरह।

उम्र का लम्बा सफ़र तय किया तन्हा मैंने,
अब चले साथ कोई चाहे मुक़ाबिल की तरह।

मेरे अरमानों का ख़ूँ उसकी उंगुलियों के पोर,
क्या जमे ख़ूब ही हिना-ए-अनामिल की तरह।

आज आवारगी-ए-दिल का मेरे सोहरा है,
तेरे कूचे में जो भटके है वो ग़ाफ़िल की तरह।।

(ज़ुल्‍फ़ ज़िन्‍दाँ=ज़ुल्फ़ों का क़ैदखाना, काफ़िल=ज़ामिन, हिना-ए-अनामिल=उँगलियों के सिरों पर की मेंहदी)
                                                                    -ग़ाफ़िल

राम भरोसे ज़िन्दगी

ख़ुद में हैं मश्‌ग़ूल सब किसको किसकी फ़िक्र
राम भरोसे ज़िन्दगी किसका किससे ज़िक्र

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, दिसंबर 01, 2014

साग़र हैं तलाशा करते

दर-ब-दर रोज़ वे पत्थर हैं तलाशा करते
वह जो मिल जाय तो इक सर हैं तलाशा करते

हद हुई ताज की भी मरमरी दीवारों पर
बदनुमा दाग़ वे अक्सर हैं तलाशा करते

दिल में हैं खोट मगर देखिए हिम्मत तो ज़रा
लोग कुछ ऐसे भी, दिलवर हैं तलाशा करते

जानते हैं के तू हम-सों को नहीं मिलता है
हम भी पागल से तुझे पर हैं तलाशा करते

ताल सुर बह्र से जिनका है न लेना देना
मंच ऊँचा, वे सुख़नवर हैं तलाशा करते

यार ग़ाफ़िल! क्या सभी रिंद हुए शाइर अब
चश्मे-साक़ी में जो साग़र हैं तलाशा करते

-‘ग़ाफ़िल’

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