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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Monday, May 25, 2015

तुझको मुबारक हो

मुझे अच्छा लगे है मेरा ग़ैरतमंद बीराना
तेरा पत्थर का बेग़ैरत शहर तुझको मुबारक हो
मेरी तारीक रातें भी मुझे लोरी सुनाती हैं
कड़कती चिलचिलाती दोपहर तुझको मुबारक हो

-‘ग़ाफ़िल’

13 comments:

  1. सुन्दर व सार्थक प्रस्तुति..
    शुभकामनाएँ।
    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

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  2. बहुत ही सुंदर रचना।

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