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शनिवार, जुलाई 04, 2015

मिरे वास्ते आखि़री रात होगी

न जिस रात तुझसे मुलाक़ात होगी।
मिरे वास्ते आखि़री रात होगी।।

बहुत हो चुकी गुफ़्तगू होश में अब,
चलो मैक़दे में वहीं बात होगी।

बहारों ने फिर से सजायी है महफ़िल,
शरारों की फिर से ख़ुराफ़ात होगी।

तिरे चश्म का तीर मुझको लगा तो,
ये मेरे लिए तेरी सौगात होगी।

ग़ज़ब है उमस और बिजली भी गुम है,
न कुछ है अंदेशा के बरसात होगी।

तुझे रंज था के मैं बोलूँ हूँ ज़्यादा,
तो अब गोर में हूँ न कुछ बात होगी।।

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (06-07-2015) को "दुश्मनी को भूल कर रिश्ते बनाना सीखिए" (चर्चा अंक- 2028) (चर्चा अंक- 2028) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहारों ने फिर से सजायी है महफ़िल,
    शरारों की फिर से ख़ुराफ़ात होगी।

    तिरे चश्म का तीर मुझको लगा तो,
    ये मेरे लिए तेरी सौगात होगी।

    वाह ।

    उत्तर देंहटाएं