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गुरुवार, नवंबर 26, 2015

ख़ूबसूरत है फ़साना प्यार का

हो लगा तड़का अगर तकरार का
ख़ूबसूरत है फ़साना प्यार का

आँधियों में जब उड़ा पत्ता वो ज़र्द
सब कहे जाने दो है बेकार का

ठीक है वो हैं तगाफ़ुल कर रहे
होगा ये उनका तरीक़ा प्यार का

क्या ज़रर हो मुस्कुरा करके कोई
हाल ले ले गर दिले बीमार का

सच बता कैसे हुआ हासिल तुझे
गुमशुदा ये दिल हमारे यार का

हौसिला तो दे ख़ुदा ग़ाफ़िल को अब
नाज़नीं से इश्क़ के इज़हार का

-‘ग़ाफ़िल’

1 टिप्पणी:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (27.11.2015) को "सहिष्णुता का अर्थ"(चर्चा अंक-2173) पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ, सादर...!

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