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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Thursday, November 26, 2015

ख़ूबसूरत है फ़साना प्यार का

हो लगा तड़का अगर तकरार का
ख़ूबसूरत है फ़साना प्यार का

आँधियों में जब उड़ा पत्ता वो ज़र्द
सब कहे जाने दो है बेकार का

जाने दो जो वे तगाफ़ुल कर रहे
होगा ये उनका तरीक़ा प्यार का

क़त्ल करना माना तेरा है शग़ल
हाल भी पर ले दिले बीमार का

देखते जिसको अघाता मैं नहीं
ऐसा ही चेहरा है मेरे यार का

कौन से रँग में रँगा था तूने रब
रंग अब क्या है तेरे संसार का

लुत्फ़ उल्फ़त का न गुम हो इसलिए
लेते रह थोड़ा मज़ा इन्कार का

ठीक है फूलों भरी हो राह पर
मर्तबा कमतर नहीं है ख़ार का

हौसिला तो दे ख़ुदा ग़ाफ़िल को अब
नाज़नीं से इश्क़ के इज़हार का

-‘ग़ाफ़िल’

1 comment:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (27.11.2015) को "सहिष्णुता का अर्थ"(चर्चा अंक-2173) पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ, सादर...!

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