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शनिवार, जनवरी 31, 2015

कुछ अलाहदा शे’र : ख़ाली लिफ़ाफ़ा

1.
डूब तो जाऊँगा हरगिज़ है शर्त इतनी के,
मैं जहां हूँ वहां आँखों का समन्दर आए।
2.
उसमें इज़हारे मुहब्बत का असर तो कर दे,
ऐ ख़ुदा भेज दिया ख़ाली लिफ़ाफ़ा उसको।
3.
कह रही मैम यूँ लहराके दुपट्टा अपना,
देख ग़ाफ़िल ये कायनात हमारी ही है।
4.
दिल का तेरे दरवाज़ा बन्द रहता बारहा,
अब तो तुझे आवाज़ लगाते भी जी डरे।
5.
आँसुओं जो बहे जा रहे इस क़दर,
चश्म मेरी तुम्हें भी गवारा न क्या।
6.
मेरे पास खोने के सिलसिले तेरे पास पाने की चाहतें,
इन्हीं सिलसिलों इन्हीं चाहतों में गुज़र रही है दो ज़िन्दगी।
7.
तेरे आने का हमें इंतज़ार रहता है,
टूट जाता है दिल जाने की बात से तेरे।
8.
हम आए और उसने भी क्या उठके चल दिया,
बस इस अदा से हमसे मिली ज़िन्दगी अक्सर।
9.
फिर खिला है गुल तो फिर से ख़ुश्बुओं का काफ़िला
मेरे उदास वक़्त को ज़रा छुआ गुज़र गया
10.
काश के ग़ाफ़िल तेरे तसव्वुर में कोई खो जाता यूँ के,
अहले ज़माना फिर कह उठता इश्क़ दीवाना होता है।

शुक्रवार, जनवरी 30, 2015

कुछ अलाहदा शे’र : उनकी नाराज़गी तो काम आए

1.
मनाने के श’ऊर को मेरे,
उनकी नाराज़गी तो काम आए।
2.
अँधेरी रात में ही दीप जले तो अच्छा,
कोई भूला जो याद आए तो ग़ज़ल होती है।
3.
आज हूँ क़ब्र में तो आई फ़ातिहा पढ़ने,
पहले घर पे ही आ जाती तो तेरा क्या जाता।
4.
ये ज़ुबान की मेरी तल्ख़ियाँ जो रुला गयीं तुझे बेतरह,
किसी रोज़ ख़ुश हालात में याद आएंगी फिर रुलाएंगी।
5.
हमारा बोलना तुझको कभी भी रास ना आया,
हमारी बेज़ुबानी रास आ जाए तुझे शायद।
6.
असमंजस में है ग़ाफ़िल के कौन शराब मुनासिब है,
साक़ी के हाथों की या फिर साक़ी के आँखों वाली।
7.
मैं क्या जानूं सोते-सोते स्वप्न में उसने क्या देखा,
देख मैं उसको स्वप्न देखते अपना सपना भूल गया।
8.
है दिलख़राश सनम देखकर मुझको अक्सर,
दस्त से यकबयक यूँ चाँद छुपाना तेरा।
9.
क़त्ल किया जो तूने हमारा मत कर उसका रंजो-मलाल,
अपने क़ातिल को हम ग़ाफ़िल लाख दुआएं देते हैं।
10.
हक़ीक़त दरहक़ीक़त देखता जाता है यह ग़ाफ़िल,
मगर चुप है बियाबाँ में कोई तूफ़ान आने तक।

गुरुवार, जनवरी 29, 2015

कुछ अलाहदा शे’र : उसको फिर मुझमें लुत्फ़ है शायद

1.
कोई सूरत न दिखे अपनी रिहाई की अब,
क़ैद करके हमें पलकें वो उठाती ही नहीं।
2.
क्या रंग था रुत्बा था हम भी बादशाह थे,
होश आया तो जाना के मय की अहमियत है क्या।
3.
पीने के मेरे शौक़ का रुत्बा बना रहे,
क़ातिल ज़रा डुबो लियो ख़ंजर शराब में।
4.
मेरा मातम ही सही थोड़ी तो रौनक़ आए,
यूँ भी अर्सा से यहां कुछ तो मनाया न गया।
5.
हमारी क़ब्र को क़ब्रों के झुरमुट से अलहदा कर,
के उसके हाथ का गुल फिर बग़ल की क़ब्र पर देखा।
6.
उसने फिर मुझसे अदावत की है,
उसको फिर मुझमें लुत्फ़ है शायद।
7.
ऐ हवा क्या बिगड़ जाता तेरा इतना जो कर देती,
उड़ाया था दुपट्टा जो हमारे छत पे धर देती।
8.
क़ब्रदोज़ तमन्नाएं भड़कती ज़ुरूर हैं,
मौका भी है दस्तूर भी फ़र्मा ही दीजिए।
9.
नहीं है देखना तुमको मेरी जानिब तो ना देखो,
मगर यह बात क्या के तुम मेरी आँखों में रहते हो।
10.
अजब ही फ़ित्रतों से लैस है इंसान भी ग़ाफ़िल,
पहुँच कर क़ब्र में भी ख़्वाब देखे तन्दुरुस्ती का।

बुधवार, जनवरी 28, 2015

कुछ अलाहदा शे’र : हमारे पास बहुत धोखे हैं

1.
चाँद भी अब्र के पीछे से इस तरह झांके,
जैसे घूँघट से निहारे मुझे चेहरा तेरा।
2.
उनका बनने में मुझे दो पल से ज़्यादा ना लगा,
बस उन्हें अपना बनाने में उमर जाती रही।
3.
न हो जो हिम्मते-दीदारे-हक़ीक़त ‘ग़ाफ़िल’,
ख़्वाब ही कोई इक हसीन सजाकर देखो।
4.
यह शब भी जा रही है अब तो चला दे ख़ंजर,
मुझे मारने से पहले तुझे नींद आ न जाए।
5.
तेरी दहलीज़ से होकर गुज़रता था जो इक रस्ता,
ऐ ग़ाफ़िल क्या हुआ के आजकल वह भी नदारद है।
6.
हमारे पास बहुत धोखे हैं,
कोई चाहे एकाध ले जाए।
7.
अक्स उसका उभर रहा हर सू,
अब मुझे नींद आ रही शायद।
8.
क़लम की नोक पर तेरी मैं आ गया क्या कम,
भले न सद्र इबारत में हाशिए पे सही।
9.
मुझे करना मुआफ़ अल्ला अगर गुस्ताख़ हो जाऊँ,
बड़ी नाज़ो अदा के साथ वो महफ़िल में आए हैं।
10.
हो रहा नज़्रे-आतिश दिल का घर भरे सावन,
कोई आ करके अब नज़रों के क़हर को रोके।

मंगलवार, जनवरी 27, 2015

कुछ अलाहदा शे’र : बस पिघल जाओ ज़रा सा

1.
वही ख़ुदगर्ज़ जो ठुकरा के मुझको चल दिया था कल,
न जाने क्या क़यामत है के शब भर याद आया है।
2.
याद में कब तलक आते हैं वे देखो ग़ाफ़िल,
हम भी अब जिनको भुलाने की चाह रखते हैं।
3.
ख़ुद को अब मोम बताने से भला क्या हासिल,
बस पिघल जाओ ज़रा सा तो कोई बात बने।
4.
तक़ाज़ा मंज़िलों का हो भी तो क्यूँ करके हो यारों,
मेरी आवारगी बाज़ीचा-ए-अत्फ़ाल न समझो।
5.
अश्क से लिक्खी इबारत को मिटाता क्यूँ है,
तुझको आना तो न था चश्म में आता क्यूँ है।
6.
पूछे वह आखि़री ख़्वाहिश मुझसे,
ऐसे जैसे के अब भी ज़िन्दा हूँ।
7.
मेरी रूह जा चुकी है अब जिस्म को तो छोड़ो,
बेकार ही क्यूँ खूँ में सब हाथ डुबोते हो।
8.
लिखता हूँ मिटा देता हूँ अक्सर तुम्हारा नाम,
ताके तुझे पता न चले मेरी बेबसी।
9.
बड़ी आला रईसी में गुज़रती जा रही अपनी,
फ़ुर्क़तो रंजोग़म की सल्तनत पर कब से क़ाबिज़ हूँ।
10.
ख़ुदा से इल्तिजा है बात फिर बिगड़े न बन जाए,
दो टूटे दिल के जुड़ने का चला है सिलसिला ग़ाफ़िल।

रविवार, जनवरी 25, 2015

कुछ अलाहदा शे’र : जफ़ाएँ भी इरादों को बहुत मज़्बूत करती हैं

1.
चुग़ली सी कर रहा है हमारे रक़ीब की,
इक झांकता गुलाब तुम्हारी किताब से।
2.
बारहा हो रहा ख़ूँगर मगर फिर भी क़शिश यह के,
तुम्हारे दर पे आ-आकर मैं अपना सर पटकता हूँ।
3.
जिस रोज़ मेरा होश भी मुझसे ख़फ़ा रहे,
उस रोज़ भी यादों का तेरे सिलसिला रहे।
4.
रात का ख़्वाब सहर को ही सुना दूँ जो कहो,
बेवफ़ा शाम तक यादों में रहे के न रहे।
5.
बारहा साबिक़ा रहता है अपना इस बहर से पर,
है जाना आज मैंने के ग़ज़ल यूँ मुस्कुराती है।
6.
फिर मेरी सरकार ने मुझ पर लगाई तोहमतें,
फिर है मेरे हाथ आया ज़हर का प्याला अभी।
7.
ख़ुदा करे के कभी शामे-वस्ल ना आए,
उसकी उम्मीद में ही ज़िन्दगी गुज़र जाए।
8.
इक दफ़ा रू-ब-रू हो जा तू ऐसी भी तमन्ना है,
तसव्वुर में तेरी तशरीफ़ गोया कम नहीं ग़ाफ़िल।
9.
वफ़ा की जुस्तजू में दर-ब-दर का भटकना भी क्या,
जफ़ाएँ भी इरादों को बहुत मज़्बूत करती हैं।
10.
क्या क़यामत है के आरिज़ उनके नीले पड़ गए
मैंने तो बोसा लिया था ख़्वाब में तश्वीर का

रविवार, जनवरी 04, 2015

जो आस-पास हैं उनका तो बस ख़ुदा मालिक

हैं जो बेहोश उन्हें होश भी आ जाएगा
जो बदहवास हैं उनका तो बस ख़ुदा मालिक
दूर हूँ तुझसे तो हूँ तीरे-नज़र से महफ़ूज़
जो आस-पास हैं उनका तो बस ख़ुदा मालिक

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, जनवरी 02, 2015

लोग इतना क़रीब रहकर भी दूरियां कैसे बना लेते हैं

लोग इतना क़रीब रहकर भी,
दूरियां कैसे बना लेते हैं।
बात करना तो बड़ी बात हुई,
देखकर आँख चुरा लेते हैं।

फ़ासिला तीन और पाँच का मिटे कैसे,
चार दीवार खड़ी बीच से हटे कैसे,
मेरी नाकामयाब कोशिश पे,
लोग हँसते हैं, मज़ा लेते हैं।

मैं वफ़ा करता रहा उनकी बेवफ़ाई से,
वो जफ़ा करते रहे हैं मेरी वफ़ाई से,
नग़्में ये सब वफ़ा-जफ़ाई के,
किसको कब कैसा सिला देते हैं।

उम्र ‘ग़ाफ़िल’ तेरी उनको ही मनाने में गई,
उनकी भी एक उमर तुझको सताने में गई,
छोड़ ये फ़ालतू क़वायद है,
और अफसाना सजा लेते हैं।।

-‘ग़ाफ़िल’