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शुक्रवार, फ़रवरी 20, 2015

कुछ अलाहदा शे’र : आग़ाज़े बहार है

1.
जिगर के पार न कर खेंच कर मत मार ख़ंजर को,
तड़पता देखने के लुत्फ़ को ज़ाया नहीं करते।
2.
आँगन में अपने कैक्टस की झाड़ देखकर
ख़ुश हो रहे हैं ये के आग़ाज़े बहार है
3.
हिचकियां थम नहीं रहीं, शायद
मेरे क़ातिल ने याद फ़रमाया।
4.
ये गौहर काम आएँगे इन्हें ज़ाया नहीं करते,
ज़मीं से अश्क उठ फिर चश्म में आया नहीं करते।
5.
तुम्हारे दिल में हमारी जगह नहीं न सही,
तुम्हारे सामने की झोपड़ी हमारी है।
6.
तेरे आरिद पे तबस्सुम का रक्स करना और,
मेरे सीने में कोई सैफ़ उतरते जाना।
7-
तूने तोड़ा दिल को मेरे नाम तेरा ले सकता हूँ पर,
मैं यह चाहूँ मेरे होते तुझपे कोई इल्ज़ाम न आए।
8.
दिल मिरा टूटा हुआ है उसे ग़ुमान न था,
लूटने वाला लूट करके बहुत पछताया।
9.
मेरा चेहरा बिगाड़ कर मुझे दिखाता है,
एक अर्सा से आईने को संवारा जो नहीं।
10-
जब समझते हैं के कुछ सीखना बाक़ी न रहा,
कोई आ करके नया पाठ पढ़ा देता है।

शुक्रवार, फ़रवरी 06, 2015

उसको तो पता यह भी न चला

उसको तो पता यह भी न चला
उसपे बहार कब छाई है।
कब कोमल कलियाँ चटक गयीं,
कब लाज की लाली धाई है।।

कब उसका वह भोला बचपन,
इस रंगमंच से विदा हुआ;
कब चंचल चितवन चुग़लायी,
कब लट उसकी लहराई है।

इक अन्जानी ख़ुश्बू से कब,
उसका तन उपवन महक उठा;
कब मन की कोयल कूक उठी,
कब गीत प्रणय के गाई है।

कब गति-गयंद गामिनी हुई,
कब मधुपूरितयामिनी हुई;
कब यौवन-भार दबी कुचली
कृश कटि उसकी बलखाई है।

ग़ाफ़िल! इन शोख़ अदाओं का,
कब से दीवाना बन बैठा;
जब भी ये कलियाँ फूल बनीं,
अलियों की शामत आई है।।

मंगलवार, फ़रवरी 03, 2015

कुछ अलाहदा शे’र : वस्ल की रूह थरथराती है

1.
वक़्त के ताबे आफ़्ताबी निभाई हँसके,
वर्ना ग़ाफ़िल तो चाँदनी से भी जला अक्सर।
2.
आज बरसात हो रही जमकर जल रहा दिल का यह नगर फिर भी,
है सरे राह कोहे दुश्वारी गुज़र रही है पर उमर फिर भी।
3.
ऐ ग़ाफ़िल इश्क़ से उकता गये सब,
गोया के हाशिए पर आ गये सब।
4.
तू जो दूर हो तो भी होश गुम, तू जो पास है तो भी होश गुम,
ऐ शराब सी मेरी ज़िन्दगी तेरे साथ कैसे सफ़र करूँ?
5.
हिज़्र ने इस क़दर सताया के
वस्ल की रूह थरथराती है।
6.
जो तलाशोगे तो दिल में ही ख़ुद के पाओगे,
ये हम उश्शाक़ सरे राह नहीं मिलते हैं।
7.
वफ़ादारी निभाने में ही करता उम्र क्यूँ गश्ता,
जफ़ाओं की जो ऐसी यादगारी का पता होता।
8.
अपनों ने जनाज़े को तो रुख़्सत था कर दिया,
पल भर को सही रोक लिया राह का पत्थर।
9.
जिसने मेरे जिगर को किया था लहूलुहान,
आती है याद फिर वो तेरी सैफ़-ए-नज़र।
10.
फ़र्क़ क्या पड़ता है कोई ख़ुश है के नाराज़ है,
है यही क्या कम के अब भी चल रहा है सिलसिला।

सोमवार, फ़रवरी 02, 2015

कुछ अलाहदा शे’र : अपना रस्ता भूल गया

1.
ख़िज़ाँ की कैफ़ियत बेहतर बहारें फिर भी आती हैं,
मगर उजड़े हुए गुलशन में फिर क्यूँकर बहार आए।
2.
अलसाई सी आँखों और अंगड़ाई लेती बाहों को क्या,
के एक मुसाफ़िर देख नज़ारा अपना रस्ता भूल गया।
3.
क्या तबस्सुम था उनके लब पे जब मैं रोया था,
आज सरका के कफ़न मेरा वे बहुत रोए।
4.
इक़रार और इन्कार का पहरा भी तो बालुत्फ़ है,
हुस्न के ज़िन्दाँ से ग़ाफ़िल हो रिहा भी किस तरह।
5.
कोई मेरी निगाहों से ज़रा दुनिया को तो देखे,
ये दुनिया जल रही होगी वो ग़ाफ़िल हो रहा होगा।
6-
बेशक ही ज़िन्दगी में लुत्फ़ बे-हिसाब हैं,
तूफ़ान में साहिल के मिस्ल घिर तो जाइए।
7.
कितना भी जानो मगर ख़ाक ही जानोगे मियाँ,
लाख सर मार लो ग़फ़लत ही नज़र आएगी।
8.
दिल में ही तो रक्खा था बड़े एहतियात से,
ग़फ़लत में दर-ब-दर मैं तुझे खोजता रहा।
9.
फ़र्क़ मग़रूर और मजबूर में बस यह ग़ाफ़िल,
इक सरेआम तो इक छुपके नुमा होते हैं।
10.
गुल को तो ख़ुश्बू-ए-ख़ुद तक का भी एहसास कहाँ,
जो के भौंरे की तड़प का मुलाहज़ा कर ले।

रविवार, फ़रवरी 01, 2015

मेरी जान मैंने देखा है

तेरी आँखों में इक तूफ़ान मैंने देखा है
फिर मेरी मौत का सामान मैंने देखा है
रक्स करता हुआ शोला कोई तबस्सुम सा
तेरे होंठों पे मेरी जान मैंने देखा है

-‘ग़ाफ़िल’

कुछ अलाहदा शे’र : ज़ुरूरी तो नहीं

1.
खो गयी मेरी ग़ज़ल गेसुओं के जंगल में,
जा रहा ढूढने लौटूं भी ज़ुरूरी तो नहीं।
2.
जाने ग़ज़ल करिश्मा है या भरम हमारा के तेरी,
सुह्बत में गेसू का जंगल निखरा सुथरा लगता है।
3.
है अभी शाम ढली जाम भी ढल जाने दे,
होश आएगा तो मैं भी उदास हो लूंगा।
4.
आज तो पूरा ख़ुम कर मेरे हवाले साक़ी,
कौन कमबख़्त आज होश में आना चाहे।
5.
उफ़ मेरी मज्बूरियाँ के लोग दीवाना कहें,
तेरी उल्फ़त के सिवा अब और तो चारा नहीं।
6.
ऐ ग़ाफ़िल दिल की सल्तनत अपनी,
हारकर देख फिर सिकन्दर तू।
7.
हो चुकी इब्तिदा-ए-शब चलो सपने सजाएँ कुछ,
सहर आएगी ग़ाफ़िल फिर नयी पेचीदगी लेकर।
8.
भले ग़ाफ़िल हूँ पर तेरी ही बग़िया का परिन्दा हूँ,
निगाहे शोख़ पर तेरी मेरा भी हक़ बराबर है।
9.
अगर सुर्ख़ लब ना नमूदार होते हमें याद शोलों की आई न होती,
न गुस्ताख़ होतीं निगाहें हमारी हवा गरचे घँघट उढाई न होती।
10.
नाम ले करके भला क्यों करें रुस्वा उसको,
जिसने भेजा सलाम उसको शुक्रिया अपना।