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गुरुवार, अप्रैल 30, 2015

कुछ अलाहदा शे’र : ये आग़ाज़े मुहब्बत है या अंज़ामे मुहब्बत है

1.
मुझे भाने लगीं तन्हाइयाँ पर यह न जानूं के,
ये आग़ाज़े मुहब्बत है या अंज़ामे मुहब्बत है।
2.
थोड़ी दूरियाँ जो होतीं एहसास यूँ न होता,
के याद करने वाले मुझे भूल जा रहे हैं।
3.
अपनी नाज़ो-अदा पर उसका इतराना ज़ुरूरी है,
शम्‌अ को फ़िक़्र क्यूँ परवाना जल जाए तो जल जाए।
4.
मैं भी जी लूँ अगरचे तेरी भी,
मेरे जीने में हिस्सेदारी हो।
5.
आज फिर जी उदास है, शायद
कोई नाराज़ हो गया फिर से।
6.
जो हंगामा हैं बरपाते हमें बदनाम करने को,
वही नादान बाइस हैं हमारी नेकनामी के।
7.
दरमियाने ग़ुफ़्तगू अक्सर ही सो जाती है, शायद
इश्क़ की तहज़ीब से वह अब तलक वाक़िफ़ नहीं।
8.
हमारा क़त्ल करने को निगाहे शोख़ ही काफ़ी,
तज़ुर्बा यह नहीं जिनको वो हम पर गन उठाते हैं।
9.
हिज़्र में ही उम्र हुई जा रही तमाम,
अब तो तक़ाज़ा-ए-विसाले यार न रहा।
10.
आँखों से खेंच-खेंच पिलाती रही शराब,
कह-कहके यह के इसकी ख़ुमारी न जाएगी।