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सोमवार, जून 29, 2015

अगरचे शह्र में बदनाम अपनी आशिक़ी होती

जो तेरे हुस्न मेरे इश्क़ की खिचड़ी पकी होती।
न भूखा मैं पड़ा होता न भूखी तू पड़ी होती।।

हुआ बर्बाद मैं तेरी ही सुह्बत में ऐ जानेमन!
तुझे गर यह ख़बर होती तुझे कितनी ख़ुशी होती।

मुझे ग़ाफ़िल ही कहकर बज़्म में अपनी बुला लेती,
न पड़ता फ़र्क़ कोई बस ज़रा सी दिल्लगी होती।

मुझी से गुफ़्तगू में वह बला की शर्म या अल्ला!
ग़ज़ब का लुत्फ़ होता गुफ़्तगू मुझसे हुई होती।

फ़लक से चाँद तारे ला तेरा दामन सजा देता,
ये मुश्किल बात तू शादी से पहले गर कही होती।

सभी उश्शाक़ लेते आज मुझसे मश्‌वरा ‘ग़ाफ़िल’,
अगरचे शह्र में बदनाम अपनी आशिक़ी होती।

रविवार, जून 28, 2015

उतर जाए जो नज़रों से वो न्यारा हो नहीं सकता

कभी टूटा हुआ तारा सितारा हो नहीं सकता।
उतर जाए जो नज़रों से वो न्यारा हो नहीं सकता।।

हमारे सिम्त अब आओगे तो हासिल न कुछ होगा,
हमारा चोट खाया दिल तुम्हारा हो नहीं सकता।

लगे रहते हैं रोज़ो-शब उगाते फ़स्ल ग़ज़लों की,
मगर अफ़सोस के इनसे गुज़ारा हो नहीं सकता।

ग़ज़ल में एक दो ही शे'र होते हैं सलीके के,
जो दिल को चूम ले वह ढेर सारा हो नहीं सकता।

चलें कू-ए-सुखन से दूर अब रोटी भी कुछ कर लें,
है सच के शेश्र जीने का सहारा हो नहीं सकता।

हमें सहरा में भी अब लुत्फ़ लेना आ गया ग़ाफ़िल,
चुनांचे ख़ुल्द भी हमको गवारा हो नहीं सकता।।

गुरुवार, जून 25, 2015

इक गीत तो लिख लूं मैं

कुछ वक़्त ठहर हमदम इक गीत तो लिख लूं मैं
इस वस्ल के लम्हे को मेरे मीत तो लिख लूं मैं
तन्हाई मेरी मुझको हर बार हरायी है
अब साथ तेरा पाकर मेरी जीत तो लिख लूं मैं

बुधवार, जून 24, 2015

मुझको तड़पाना ही था अगर ज़िन्दगी

मुझको तड़पाना ही था अगर ज़िन्दगी
काट देती तू मेरे ये पर ज़िन्दगी
तेरे कूचे में बेसुध भटकता रहा
और तुझको नहीं कुछ ख़बर ज़िन्दगी

सोमवार, जून 22, 2015

कुछ अलाहदा शे’र : फिर मेरे चाहने वालों ने मुझे याद किया

1-
वक़्त ने कुछ किया मज़्बूर कुछ बंदिश ज़माने की,
इस तरह उम्र गश्तः हो रही अपने फ़साने की।
2-
हद से ज़्यादा बंदिशों के हम कभी क़ाइल नहीं,
आप आएं या न आएं ख़्वाब तो देखेंगे हम।
3-
नदी का ये उफान और टूटते जाना यूँ बन्धों का,
था अच्छा चश्म दो आपस में टकराए नहीं होते।
4-
सूख जाना ही तो था गुल का नसीब,
बाग़बाँ बदनाम बेमतलब हुआ।
5-
फिर मेरे क़त्ल की उम्मीद जगी है साहिब,
फिर मेरे चाहने वालों ने मुझे याद किया।
6-
तु जो मिल जाय तो इस पर मेरी भी राय हो क़ायम,
के सपने सुब्ह के अक्सर हक़ीक़त में बदलते हैं।
7-
साफ़ कर ले तो ज़रा ख़ुद का सनम शीशा-ए-दिल
मेरा किरदार चमकता सा नज़र आएगा।
8-
वे ही संभाल पाए न इक बेवफ़ा लक़ब,
माला जपा किए जो सुबो शाम इश्क़ की।
9-
फिर सँपोले को आस्तीं में पनाह?
जबके मालूम है वो क्या देगा!

बुधवार, जून 17, 2015

गुज़र रही है ज़िन्दगी तन्‌हा

गुज़र रही है ज़िन्दगी तन्‌हा
जिस तरह अपनी शा’इरी तन्‌हा
हो गया शाह पर सुकून नहीं
हो गयी जूँ कोई ख़ुशी तन्‌हा