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शुक्रवार, जुलाई 31, 2015

आप बन ठनके जो निकलते हैं

आप बन ठनके जो निकलते हैं
यूँ भी सौ आफ़्ताब जलते हैं

अब्र शर्माए सिमट जाए जब
ज़ुल्फ़ लहराके आप चलते हैं

जाम आँखों का आपकी पीकर
याँ तो आशिक़ हज़ार पलते हैं

क्या क़शिश है के जी जला कर हम
आपके इश्क़ में पिघलते हैं

लोग बदनाम ही किए फिर भी
हम तो आशिक़ हैं हम मचलते हैं

जी तड़पता है बहुत तब ग़ाफ़िल
आप पहलू से जब भी टलते हैं

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, जुलाई 30, 2015

अपने हिस्से का सारा संसार लिखो

कौन भला कहता है अब मत प्यार लिखो
अपने हिस्से का सारा संसार लिखो

गोया हमले हर सू से होते हैं पर
इश्क़ नहीं मर सकता, बारम्बार लिखो

गमे इश्क़ भी सबको हासिल होता क्या
इश्क़ नहीं होता है सर का भार लिखो

इश्क़ नहीं तो क्या खोया औ क्या पाया
इश्क़ बिना हर शै होती बेकार लिखो

पूरी क़ायनात के हर बासिन्दे को
सच्ची उल्फ़त की होती दरकार लिखो

इश्क़ मता-ए-कूचा मत समझे कोई
ख़ाक सजाएगा इसको बाज़ार लिखो

रोटी खाओ ख़ुदपसन्द की बेशक तुम
बात मुनासिब जो हो मेरे यार लिखो

पत्थरदिल जब तक बन मोम न बह जाए
लिक्खो ग़ाफ़िल तब तक तुम अश्‌आर लिखो

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, जुलाई 29, 2015

ग़ज़ल : ख़ुद की तक़्दीर यूँ आज़माते रहे

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बहर-
फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन

मापनी-
212 212 212 212
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आप रूठा किए हम मनाते रहे
ख़ुद की तक़्दीर यूँ आज़माते रहे

आप उठकर गए रूठ किस्मत गयी
हम अकेले ही आँसू बहाते रहे

वस्ल के गीत लिखता मगर आप ही
हिज़्र के गीत हमसे लिखाते रहे

आपको क्या के हम हैं परीशाँ बहुत
आप जाते रहे मुस्कुराते रहे

कुछ बढ़ी हैं हमारी यूँ दुश्वारियाँ
ख़्वाब जो आप हमको दिखाते रहे

दो क़दम ही निभाना था गर साथ तो
मंज़िलों का पता क्यूँ बताते रहे

-‘ग़ाफ़िल’
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सोमवार, जुलाई 27, 2015

आग भड़के के तभी आग बुझा दी किसने

ग़ज़ल-

2122 1122 1122 22 (112)

फ़ाइलातुन  फ़ियलातुन  फ़ियलातुन  फ़ैलुन (फ़अलुन)

क़ाफ़िया- आ
रदीफ़-  दी किसने
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इश्क़ है आग का दरिया की मुनादी किसने
आग भड़के के तभी आग बुझा दी किसने

है पता आग की लज़्ज़त का मुझे पहले से
या ख़ुदा इश्क़ में जाने की सज़ा दी किसने

एक यह बात के मुझ पर न यक़ीं था उसको
और भी मेरे तईं आग लगा दी किसने

उड़ रहे अब्र तो है जी भी परीशाँ यह के
ज़ुल्फ़ महबूब की इस मिस्ल उड़ा दी किसने

इश्क़बाज़ी का सफ़र ख़ूब था जारी लेकिन
अब रहे इश्क़ में भी कील बिछा दी किसने

होंठ सूखे थे तलब थी तो फ़क़त पानी की
आबे अह्‌मर ही मुझे लब की पिला दी किसने

आबे अह्‌मर=ख़ास लाल शराब

-‘ग़ाफ़िल’

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रविवार, जुलाई 26, 2015

क्या मज़ा आपका चेहरा देखकर

आपके सिम्त आया था क्या देखकर
हूँ मैं हैरान उल्टा हुआ देखकर

आपके मैकदे की हो जो भी सिफ़त
क्या मज़ा आपका चेहरा देखकर

जी मेरा भी नशीला हुआ जा रहा
आपके लड़खड़ाते ये पा देखकर

क्या कहूँ किस कदर होश मेरा गया
आपको होश से लापता देखकर

आपका हो गया आज मुश्ताक़ मैं
आपके मैकशी की अदा देखकर

मर्हबा मर्हबा मर्हबा मर्हबा
मैं रटूं आपका सर फिरा देखकर

शनिवार, जुलाई 25, 2015

ज़ेब कोई सिली नहीं होती

तू अगरचे कही नहीं होती
बात इतनी लगी नहीं होती

होश आया तो मैंने जाना के
ज़िन्दगी मैकशी नहीं होती

बात बातों में रूठना तेरा
यूँ सनम आशिक़ी नहीं होती

मुझसे जलता न ज़माना गर तू
मुस्कुराकर मिली नहीं होती

चश्म मे तू न ठहरती मेरे
तो मिरी किरकिरी नहीं होती

गर तिरे दर से गुज़रती न कभी
यूँ हवा संदली नहीं होती

पी रहा मैं शराब होंठों की
मैकशी भी बुरी नहीं होती

आज ग़ाफ़िल को यूँ न बहका तू
ज़ेब कोई सिली नहीं होती

शुक्रवार, जुलाई 24, 2015

अरे हुस्न वालों ये क्या माज़रा है

न कोई है शिक़्वा न कोई सिला है
अरे हुस्न वालों ये क्या माज़रा है

मुझे क्या पता था मुझे मार देगा
निगाहों का तेरे जो ख़ंजर चला है

हुआ तो हुआ पर हुआ क्या यहाँ जो
थी बरसात होनी कुहासा हुआ है

मिरे खेत में अब न बरसेंगी ऐसा
फुहारों ने शायद किया फ़ैसला है

मिले यार सच्चा तो यूँ भी समझ ले
ज़माने की इश्रत तुझे ही अता है

हुआ एक अर्सा मुझे पौध रोपे
बड़ा नकचढ़ा फूल है अब खिला है

मिरे दिल के हर जख़्म से जाने जाना
नहीं मैं कहूँगा तेरा राब्ता है

कली की सदा कौन सुनता है ग़ाफ़िल
उसे तोड़कर देख सेह्रा सजा है

-'ग़ाफ़िल'

गुरुवार, जुलाई 23, 2015

लिहाजा अब ज़रा ख़ूने जिगर की बात करते हैं

तुम्हारी बेरुख़ी है जो हजर (पत्थर) की बात करते हैं।
वगरना बारहा हम तो क़मर (चाँद) की बात करते हैं।।

हमारे खेत में है लहलहाती फ़स्ल ग़ज़लों की,
हमारे गाँव वाले अब बहर की बात करते हैं।

सलीका है नहीं जिनको वफ़ादारी निभाने का,
वही हमसे मुहब्बत के हुनर की बात करते हैं।

कभी दिल चाक कर देते हैं वो बेबाक लहजे से,
कभी मासूमियत से चश्मे तर की बात करते हैं।

जिन्हें फ़ुर्सत नहीं अपने हरम से दूर जाने की,
वही ऐयाश राहे पुरख़तर की बात करते हैं।

ज़माने की हसीं बातों से होना कुछ नहीं हासिल,
लिहाजा अब ज़रा ख़ूने जिगर की बात करते हैं।।

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, जुलाई 21, 2015

मुस्कुरा कर हमें आजमाने लगे

जब हमारी गली से वो जाने लगे।
मुस्कुरा कर हमें आजमाने लगे।।

अब उन्हें भी जफ़ा का मिलेगा सिला,
हम उन्हें रफ़्ता रफ़्ता भुलाने लगे।

आँधियों से तो लड़ती शम्‌आ क़ुफ़्र यह,
के पतंगे आ ख़ुद को जलाने लगे।

गीत गाया किए वो मुहब्बत का, पर
जाने क्यूँ हमको झूठे फ़साने लगे।

दिल की बस्ती में सैलाब सा आ गया,
चश्म दो जब भी आँसू बहाने लगे।

साथ देता है ग़ाफ़िल भला कौन? जब
कोई, मज़्बूर दिल को सताने लगे।।

रविवार, जुलाई 19, 2015

ख़ुदा ही कुछ करे के मार्फ़त अंजाम हो जाए

हमारी क़ब्र पर आना जो तेरा आम हो जाए।
हमारी रूहे फ़ानी को ज़रा आराम हो जाए।।

हमारा क़त्ल करके इस क़दर तू मुस्कुराए है,
किसी शातिर का जैसे कोई भारी काम हो जाए।

हमारा जिस्म ज़ेरे ख़ाक है पर रूह ज़िन्दा है,
न ऐसा काम कर के वह भी अब बदनाम हो जाए।

अगर वादा खि़लाफ़ी ही मुहब्बत की रवायत है,
तो चाहूँ के हमारा इश्क़ अब नाकाम हो जाए।

हुई क्या बात के अहले ज़माना हो गया दुश्मन,
किया है इश्क़ ही तो और न इल्ज़ाम हो जाए।

बड़ा ही पुरख़तर है काम ग़ाफ़िल इश्क़बाजी, अब
ख़ुदा ही कुछ करे के मार्फ़त अंजाम हो जाए।।

शुक्रवार, जुलाई 10, 2015

आँख तुझपे जमी की जमी रह गई

सांस मेरी थमी की थमी रह गई
आँख तुझपे जमी की जमी रह गई

यूँ के दीदार तेरा हुआ क्या सनम
जान की जो पड़ी तो पड़ी रह गई

जाम आँखों से तूने पिलाया मगर
लब तड़पते रहे तिश्नगी रह गई

नीमकश तीर दिल में उतरता रहा
यूँ ख़लिश भी हुई ज़िन्दगी रह गई

वास्ता इश्क़ का देने वाला गया
हुस्नवाली ठगी की ठगी रह गई

वह के तूफ़ाँ सा आया चला भी गया
जी में इक धुंध सी बेकली रह गई

रविवार, जुलाई 05, 2015

रखता है याद कोई याँ किसकी बेबसी को

यह ज़ीस्त जलाती है सौ बार आदमी को।
पर आदमी न समझे इक बार ज़िन्दगी को।।

बहती है कू-ब-कू जो पानी के मिस्ल मै अब,
फिर क्यूँ न सांप सूंघे परिवार की ख़ुशी को।

लैला-ओ-कैस फिर से आ जाएँ गर ज़मीं पर,
मिल जाय खाद पानी मुरझाई आशिक़ी को।

मेरे हरेक ख़त पर लब की मुहर लगाकर,
मेरी मुहब्बतें वह भेजेगी फिर मुझी को।

वह नज़रे क़यामत से देखे मुझे के देखूँ,
लगती नहीं नज़र है कब तक तिरी हंसी को।

ये शे’रो सुखन ग़ाफ़िल हैं दिल्लगी की बातें,
रखता है याद कोई याँ किसकी बेबसी को।।

शनिवार, जुलाई 04, 2015

मिरे वास्ते आखि़री रात होगी

न जिस रात तुझसे मुलाक़ात होगी।
मिरे वास्ते आखि़री रात होगी।।

बहुत हो चुकी गुफ़्तगू होश में अब,
चलो मैक़दे में वहीं बात होगी।

बहारों ने फिर से सजायी है महफ़िल,
शरारों की फिर से ख़ुराफ़ात होगी।

तिरे चश्म का तीर मुझको लगा तो,
ये मेरे लिए तेरी सौगात होगी।

ग़ज़ब है उमस और बिजली भी गुम है,
न कुछ है अंदेशा के बरसात होगी।

तुझे रंज था के मैं बोलूँ हूँ ज़्यादा,
तो अब गोर में हूँ न कुछ बात होगी।।

शुक्रवार, जुलाई 03, 2015

कितना एहसान यार करता है

मुझपे वह जाँ निसार करता है।
यूँ मुझे शर्मसार करता है।।

खेँच लेता है ख़ून रग रग से,
वक़्त जब भी शिकार करता है।

रख लिया मुझको हाशिए पे सही,
कितना एहसान यार करता है।

आईना देखकर मेरी सूरत,
रोज़ चीखो पुकार करता है।

याद आकर वो क्यूँ शबे हिज़्राँ,
जी मेरा बेक़रार करता है।

सो जा ग़ाफ़िल न अब वो आएगा,
तू जिसका इंतज़ार करता है।।

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, जुलाई 02, 2015

भड़कता है कभी शोला किसी के मुस्कुराने से

नहीं चैनो क़रार आए है तेरे रूठ जाने से।
सनम तू लौट के आ जा भले झूठे बहाने से।।

ख़ुतूतों का वो लम्बा सिलसिला जाता रहा तो क्या?
महक़ते हैं किताबों में अभी तक ख़त पुराने से।

लिखा करता था जिसको ख़त पढ़ा करता था जिसका ख़त,
बड़ी तक़लीफ़ होती है उसी के भूल जाने से।

भड़कना ही रही फ़ित्रत तो सीने में भड़क जाता,
शरारा क्या हुआ हासिल मिरे घर को जलाने से।

कोई मुस्कान सीने की अगन पल में बुझा देवै,
भड़कता है कभी शोला किसी के मुस्कुराने से।

निराला फ़न ग़ज़लगोई जो चाहे बात कह ग़ाफ़िल,
ग़ज़ब का लुत्फ़ आता है ग़ज़ल इक गुनगुनाने से।।