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मंगलवार, सितंबर 29, 2015

कोई अश्कों से धोए जा रहा रुख़सार जाने क्यूँ

दिखे हैं और मेरी मौत के आसार जाने क्यूँ
पशेमाँ है किए पे ख़ुद के वह गद्दार जाने क्यूँ

बड़े बनते मुसन्निफ़ सब, कहो तो मौत लिख डालें
मगर वो लिख नहीं सकते हैं तो बस प्यार, जाने क्यूँ

मेरी जानिब चले आते हैं सूरज चाँद तारे सब
नहीं आते कभी हैं आप ही सरकार जाने क्यूँ

मुक़ाबिल ही सही कोई सफ़र में साथ तो दे दे
हुआ जाए है अब तन्‌हा मिरा क़िरदार जाने क्यूँ

मुझे मालूम है के हुस्न नज़रों की अमानत है
मगर इसके भी हैं हर सिम्त पहरेदार जाने क्यूँ

उड़ाकर गर्द ख़ुद ही, देखिए ग़ाफ़िल जी कमज़र्फ़ी
कोई अश्कों से धोए जा रहा रुख़सार जाने क्यूँ

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, सितंबर 28, 2015

आखिरी सांस तक लड़ा कोई

वह्म है या के राबिता कोई
ख़्वाब में रोज़ आ रहा कोई

इश्क़ आसाँ नहीं है आतिश है
काश! यह बात मानता कोई

इश्क़ की आग जब भी भड़की है
कर न पाया है सामना कोई

इश्क़ में हम जहाँ जहाँ भटके
अब तलक तो न वाँ गया कोई

इश्क़ को किस तरह छुपाओगे
यह न अदना है मस्अला कोई

इश्क़ रुस्वा न हो ज़माने में
आखिरी सांस तक लड़ा कोई

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, सितंबर 27, 2015

मत समझना हम हुए लाचार से

एक ग़ज़ल-

मतला-
लौट जो आए तिरे दरबार से
मत समझना हम हुए लाचार से

हुस्ने मतला-
नाव तो हम खे रहे पतवार से
क्या बचा पाएँगे इसको ज्वार से

अश्‌आर-
कोशिशों ने कर दिया मज़्बूत यूँ
जूँ डिगे पत्थर न जल की धार से

सुह्बते गुल की है ख़्वाहिश पर ये क्या
लोग काफी डर रहे हैं ख़ार से

वक़्त की रफ़्तार पकड़ो साहिबान
क्यूँ यहाँ रोए पड़े बीमार से

क्यूँ कहें किससे कहें जब आप हम
कर लिए रिश्ते सभी व्यापार-से

यह रवायत क्या कि बस गुलफ़ाम के
हम हुए जाते हैं ख़िदमतगार-से

बेतक़ल्लुफ़ बात तो होती रही
गो कि सब थे बेमुरव्वत यार से

आदमी हर आदमी से दूर है
क्या भला उम्मीद हो परिवार से

चाँद है पीपल की टहनी पर टँगा
क्यूँ नहीं छत पर उतारा प्यार से

लुत्फ़ तो आए है तब ही इश्क़ में
जब हुई शुरुआत हो तकरार से

गर इसी रफ़्तार से चलते रहे
हम बहुत नज़्दीक होंगे दार से

मक़्ता-
एक ग़ाफ़िल हो परीशाँ क्यूँ भला
जब सभी बेख़ौफ़ हैं मझधार से

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, सितंबर 26, 2015

बिना आशिक़ हुए आवारगी अच्छी नहीं लगती

न दर्दे हिज़्र हो तो आशिक़ी अच्छी नहीं लगती
बिना आशिक़ हुए आवारगी अच्छी नहीं लगती

गुज़र जाता है हर इक सह्न से टेढ़ा किए मुँह जूँ
रक़ीबों को कभी मेरी ख़ुशी अच्छी नहीं लगती

बिना संज़ीदगी के काम कोई हो नहीं सकता
मगर हर बात में संज़ीदगी अच्छी नहीं लगती

मिरे गर रू-ब-रू हो चाँद भी तो अब्र के पर्दे
मुझे हर हाल में बेपर्दगी अच्छी नहीं लगती

नदी ख़ुद रोज़ आकर प्यास तो मेरी बुझा दे पर
मुझे इस मिस्ल भी दरियादिली अच्छी नहीं लगती

अगर है तिश्नगी तो ज़ब्त कर ले तू क़रीने से
नहीं मालूम क्या तश्नालबी अच्छी नहीं लगती

है मुझमें हिम्मते आग़ाज़ राहे नौ बना लूँगा
मुझे तो राह भी गुज़री हुई अच्छी नहीं लगती

भले तुह्‌मत लगे ग़ाफ़िल ज़माने से हुआ ग़ाफ़िल
मगर अख़्लाक़ पर तुह्‌मत लगी अच्छी नहीं लगती

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, सितंबर 23, 2015

इक ज़ुरूरी काम शायद कर गये

शम्‌अ की जानिब पतिंगे गर गये
लौटकर वापिस न आए मर गये

कुछ तो है पोशीदगी में बरहना
जो उसी के सिम्त पर्दादर गये

जब कभी भी प्यास जागी तो ख़याल
क्यूँ शराबे लब पे ही अक़्सर गये

मैं बताऊँ क्यूँ हुआ जी का ज़रर
वह गयी, नख़रे गये, तेवर गये

हादिसों की फ़िक़्र ऐसी या ख़ुदा?
जो न हम अब तक बुलंदी पर गये

तीर नज़रों का उसी से था चला
और हर इल्ज़ाम मेरे सर गये

एक क़त्‌आ मक़्ते के साथ-

दफ़्अतन पहुँचा तो मुझको देखकर
नोचने वाले कली को, डर गये
यूँ लगा, दिल ने कहा ग़ाफ़िल जी आप
इक ज़ुरूरी काम शायद कर गये

(पोशीदगी=छिपाव, बरहना=नग्न, पर्दादर=निन्दक, ज़रर=नुक्‍़सान, दफ़्अतन=यकबयक)

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, सितंबर 21, 2015

अगर दूसरों के सहारे न होते

अजी हम कभी ग़म के मारे न होते
अगर दूसरों के सहारे न होते

नदी मस्त बलखाती चलती नहीं गर
उसे थामने को किनारे न होते

फ़लक़ का ज़मीं से जो रिश्ता न होता
सितारे भी रौशन हमारे न होते

भला एक लम्हा गुज़रता तो यूँ जब
मेरे पास शिक़्वे तुम्हारे न होते

कभी भी मुहब्बत न परवान चढ़ती
जो हम जीत कर दाँव हारे न होते

ऐ ग़ाफ़िल ये मुमक़िन तो होता के हरसू
सिसकते हुए से नज़ारे न होते

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, सितंबर 20, 2015

हो न हो उसको इसकी ज़ुरूरत ही हो

एक थाली गिरी है गनीमत ही हो
कोई घोड़ी चढ़ा है मुहब्बत ही हो

इसलिए भी उसे इश्क़ फ़र्मा दिया
हो न हो उसको इसकी ज़ुरूरत ही हो

हारता ही रहा मैं कि शायद सनम
इश्क़ में जीत जाना बुरी लत ही हो

सिलसिला एक कायम रहे उम्र भर
गर मुहब्बत न हो तो अदावत ही हो

लोग कहते हैं उसकी हिमाक़त मगर
या ख़ुदा ये हिमाक़त नज़ाक़त ही हो

ये हक़ीक़त बयानी भी इक चीज़ है
क्या ज़ुरूरी है सब कुछ शिक़ायत ही हो

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, सितंबर 18, 2015

पर कभी तो मुस्कुराया कीजिए

ठीक है, गुस्सा जताया कीजिए
पर कभी तो मुस्कुराया कीजिए

चाँद कब निकलेगा है मालूम जब
वक़्त पर आँखें बिछाया कीजिए

हैं बहुत मगरूर ये पर्दानशीं
अब न इनसे लौ लगाया कीजिए

वस्ल की यह शब गुज़रती जा रही
रफ़्ता रफ़्ता दिल दुखाया कीजिए

अब नहीं है ख़ुद पे मेरा इख़्तियार
अब न मुझको आज़माया कीजिए

खिल उठेगी शर्तिया मेरी ग़ज़ल
आप इसको गुनगुनाया कीजिए

-‘ग़ाफ़िल’

शा'इरी ज़िन्दगी हुई अपनी

है यही बेश्तर कमी अपनी
शा'इरी ज़िन्दगी हुई अपनी

ख़ूँ रगों में रवाँ तो है लेकिन
ज़िन्दगी ज़ूँ ठहर गयी अपनी

आशिक़ी का ग़ज़ब करिश्मा है
अब न ढूँढे मिले हँसी अपनी

बीच सहरा सराब सी है वो
और ग़ज़ाला है तिश्नगी अपनी

बज़्म में जो तमाम रौनक़ है
रक्स करती है बेख़ुदी अपनी

क्या ख़बर थी वो झूठ की ख़ातिर
क़स्म खाएगी वाक़ई अपनी

चीख उठती है रोज़ पानी से
साँस ख़ुद घोटती नदी अपनी

यार ग़ाफ़िल ज़रा न ख़्वाब आया
के वो शौकत नहीं रही अपनी

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, सितंबर 14, 2015

आपकी ही तो मिह्रबानी है

यार इस मिस्ल ज़िंदगानी है
जूँ हक़ीक़त नहीं कहानी है

ख़ूँ रगों में न अब रवाँ होता
आब की ही फ़क़त रवानी है

है इज़ाफ़त जो दिल की धड़कन में
आपकी ही तो मिह्रबानी है

आज मैं तर्के मुहब्बत चाहूँ
गो के यह मह्‌ज़ बदग़ुमानी है

इक समन्दर के तिश्नगी की बात
एक दरिया से मैंने जानी है

आईने टूटते रहें क्या ग़म
आपको तो नज़र लगानी है

ठोकरों पर है ज़िन्दगी अपनी
तीर की नोक पर जवानी है

याँ तो ग़ाफ़िल न अब मिले शायद
ये ग़ज़ल आखि़री निशानी है

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, सितंबर 12, 2015

आप सबकी है इनायत दोस्तो

आपसे कैसी शिक़ायत दोस्तो
आप सबकी है इनायत दोस्तो

बज़्म में बदनाम करना आपकी
है बहुत पहले की आदत दोस्तो

खो गया था मैं अगर जज़्बात में
आपने क्या की मुरव्वत दोस्तो

चाँद के धब्बे को केवल देखिए
आपकी है यह शराफ़त दोस्तो

आज अपना ख़ूँ नहीं अपना रहा
क्या ग़ज़ब ठहरी ज़हानत दोस्तो

एक क़ाफ़िर को लगाया है गले
एक ग़ाफ़िल से अदावत दोस्तो

-‘ग़ाफ़िल’

एक पर ग़ाफ़िल पे लानत दोस्तो

मुस्कुराने की है आदत दोस्तो
इसलिए दिल है सलामत दोस्तो

खेलना आरिज़ से ज़ुल्फ़ों को बदा
यूँ कहाँ मेरी है किस्मत दोस्तो

आदतन ही शुक्रिया बोला उसे
है मगर उससे रक़ाबत दोस्तो

साफ़ बच जाए नज़र के वार से
है किसे हासिल महारत दोस्तो

शाम मेरे साथ शब ग़ैरों के साथ
इश्क़ है या है क़यामत दोस्तो

शोख़ियां उसकी मुझे उकसा रहीं
हो न जाए कुछ शरारत दोस्तो

एक क़त्आ-

आज मुझको लोग दीवाना कहें
दिल पे है उसकी हुक़ूमत दोस्तो
था यकीं के रंग लाएगी ज़ुरूर
एक दिन मेरी मुहब्बत दोस्तो

मक़्ता-

है सरापा इश्क़ में सारा जहाँ
एक पर ग़ाफ़िल पे लानत दोस्तो

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, सितंबर 11, 2015

रह के पत्थर से अक्सर टकराते है

तेरे कूचे में जब भी हम जाते हैं
रह के पत्थर से अक्सर टकराते है

ख़ामख़याली के बाइस पिटता कोई
वर्ना याँ तो पत्थर पूजे जाते हैं

एक कमाए दस खाएं की आदत है
इसी लिए हम रिश्ते ख़ूब निभाते हैं

कम जोतो पर अधिक हेंगाओ के जैसे
हमको ढेरों सबक सिखाए जाते हैं

हुआ क़ाफ़िया तंग बहुत अपना यारो
मज़्बूरी में जश्ने शाम मनाते हैं

एक सुहागा सोने पर जूँ लगता है
हमको जब ग़ाफ़िल कह लोग बुलाते हैं

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, सितंबर 10, 2015

पर लगे, है ज़ुदा नहीं कोई

आज तक तो मिला नहीं कोई
पर लगे, है ज़ुदा नहीं कोई

तुझको पाऊँ या जान से जाऊँ
और अब रास्ता नहीं कोई

साँस चल तो रही है पर मुझको
बिन तेरे फ़ाइदा नहीं कोई

वक़्त रूठा तो हट गयी दुनिया
आज अपना रहा नहीं कोई

इक समन्दर की आह के आगे
अब तलक तो टिका नहीं कोई

जी जले और मुस्कुराऊँ मैं
यूँ भी ग़ाफ़िल हुआ नहीं कोई

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, सितंबर 09, 2015

हैं मेरे लिए आज़माने की रातें

ज़माना कहे दिल दुखाने की रातें
हैं मेरे लिए आज़माने की रातें

बहुत ढूँढता हूँ मगर अब न मिलतीं
कहाँ खो गयीं आशिक़ाने की रातें

हज़ारों ख़ुशामद मगर रूठ जाती
हैं ख़्वाबों को मेरे सजाने की रातें

तसव्वुर में तेरे मैं ख़ुश हो तो लूँ पर
न याद आएँ गर रूठ जाने की रातें

मुझे टोकती हैं बहकने से पहले
तेरे साथ पीने पिलाने की रातें

हैं ग़ाफ़िल के सीने में रह रह के चुभतीं
तेरे हिज़्र में जी जलाने की रातें

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, सितंबर 08, 2015

सुकूँ के दो निवाले से मेरा बेजोड़ नाता है

अदब से आजकल जब भी कोई मुझको बुलाता है
न जाने क्यूँ मुझे अहसास होता है, बनाता है

अँधेरों से कहो के बोरिया बिस्तर समेटें अब
नही मालूम क्या मंज़र? दीया जब जगमगाता है

क़लम मेरी किसी कमज़र्फ़ शौकत पर न चल जाए
जो ख़ुद है ज़िश्तरू मुझको वही शीशा दिखाता है

हँसी तब और आती है कोई दौरे रवाँ में भी
मुझे तफ़्सील से जब इश्क़ की ख़ूबी गिनाता है

ग़रज़ इतनी ही के बेहोश को बस होश आ जाए
ग़ज़ब है लुत्फ़ आरिज़ पर कोई आँसू गिराता है

ज़माने भर की दौलत से भला क्या वास्ता ग़ाफ़िल
सुकूँ के दो निवाले से मेरा बेजोड़ नाता है

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, सितंबर 07, 2015

हमारा हुस्न से नाता बहुत है

नहीं है पास पर देखा बहुत है
हमारा हुस्न से नाता बहुत है

निशाँ यूँ ही नहीं हैं रुख पे उसके
वो जज़्बातों से टकराता बहुत है

कोई तो गुल की पंखुड़ियाँ बिछा दे
वफ़ा की राह में काँटा बहुत है

ये सच है के अँधेरों की बनिस्बत
हमें लोगों ने भरमाया बहुत है

किसी ने घाव दिल पर दे दिया था
पसे मुद्दत भी वो रिसता बहुत है

मैं कैसे चाह कर उसको भुला दूँ
कभी वह भी हमें चाहा बहुत है

जो उलझी थीं लटें तूफ़ाँ में पहले
कोई रह रह के सुलझाता बहुत है

ये ग़ाफ़िल बे सबब शा'इर हुआ क्या?
यहाँ पर हुस्न की चर्चा बहुत है

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, सितंबर 06, 2015

फ़र्ज़ निस्बत का भला कुछ तो अदा कर जाते

दोस्ती निभ न सकी बैर निभा कर जाते
फ़र्ज़ निस्बत का भला कुछ तो अदा कर जाते

इक तक़ाज़ा था नहीं तुमने ज़रा ग़ौर किया
बात बनती ही अगर बात बना कर जाते

दूर जाना ही रहा दिल से तो आए थे क्यूँ
और गर आ ही गए थे तो बता कर जाते

एक अर्से से किसी ने तो न छेड़ा दिल को
तुमसे उम्मीद जगी थी तो सता कर जाते

रू-ब-रू था तो मगर कुछ भी नहीं बोल सका
तुमपे यह फ़र्ज़ रहा मुझको बुला कर जाते

एक ग़ाफ़िल से भला इस भी क़दर शर्माना
मुस्कुरा करके कभी आँख मिला कर जाते

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, सितंबर 05, 2015

उसे है कारवाँ मिलता भले तन्‌हा निकलता है

यूँ राहे ज़ीस्त में इंसान गर सच्चा निकलता है
उसे है कारवाँ मिलता भले तन्‌हा निकलता है

मेरी पुरख़ार राहें एक दिन फूलों भरी होंगी
पता है ख़ार में भी किस तरह गुंचा निकलता है

किया क्या ग़ौर इस पर भी किसी ने क्यूँ है ऐसा के
निकलता चाँद मश्‌रिक़ से है जब पूरा निकलता है

जहाँ में इश्क़ का दीया है जब भी बुझ रहा होता
किसी मीरा दीवानी का वो गोपाला निकलता है

बहुत था दर्द दिल में साथ जब तू थी नहीं मेरे
तेरे आने से देखूं दर्द अब कितना निकलता है

तुझे क्यूँ फ़िक़्र है तीरे नज़र का वार जिस पर की
वही ग़ाफ़िल, जो तेरे दर से मुस्काता निकलता है

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, सितंबर 04, 2015

ज़ख़्म सीने का फिर हरा होगा

आपने कुछ जो कह दिया होगा
ज़ख़्म सीने का फिर हरा होगा

बात फिर इश्क़ की चली होगी
फिर रक़ाबत का सिलसिला होगा

मैंने सोचा तो नहीं था हरगिज़
दिल के लुटने का हादिसा होगा

गो मैं छू भी नहीं सकूँ फिर भी
चाँद तो छत पे आ गया होगा

जल रहे आज जो रक़ीब मेरे
नाम उसने मेरा लिया होगा

लाख मुझसे हिज़ाब कर ले वो
आईने से न कुछ छुपा होगा

दिल लुटाने का ढब नहीं अब तक
इश्क़बाज़ी में वह नया होगा

ताब उसके शबाब का ग़ाफ़िल
आईना ख़ाक सह सका होगा

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, सितंबर 01, 2015

इस तरह ख़ुद को सताने से भला क्या हासिल

बात सीने में दबाने से भला क्या हासिल
इस तरह ख़ुद को सताने से भला क्या हासिल

एक सैलाब भी है प्यास भी तो ज़ाहिर है
आँख अब और चुराने से भला क्या हासिल

होश को जोश गर आ जाय तो मुमक़िन है सब
जोश में होश गवाने से भला क्या हासिल

आईना ख़ूब ही जाने है हक़ीक़त तेरी
उसको बन ठनके रिझाने से भला क्या हासिल

जाम होंटों का कोई चख के यही सोचेगा
मै को अब हाथ लगाने से भला क्या हासिल

इश्क़ नेमत है अगर यह न हुआ हासिल तो
सोच ग़ाफ़िल है ज़माने से भला क्या हासिल

-‘ग़ाफ़िल’