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शनिवार, अक्तूबर 31, 2015

शे’र कहता शेर सा हुंकार कर

आज तू तीरे नज़र का वार कर
नीमकश बिल्कुल न, दिल के पार कर

रस्मे उल्फ़त तो निभा जालिम ज़रा
कुछ सितम दिल पर मेरे दिलदार कर

आज जीने का हुनर है सीखना
ज़िन्दगी से जीत कर या हार कर

अब शराबे लब नहीं अब ज़ह्र दे
मुझपे इतना सा करम तू यार कर

नफ़्रतों से ख़ुश है तो जी भर करे
मैं कहाँ कहता हूँ मुझको प्यार कर

है यही ग़ाफ़िल का अंदाज़े बयाँ
शे’र कहता शेर सा हुंकार कर

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, अक्तूबर 30, 2015

यूँ भी इक नादान को धोखा क़रारा मिल गया

डूबते को एक तिनके का सहारा मिल गया
यूँ भी इक नादान को धोखा क़रारा मिल गया

खुब रहा नश्तर जिगर में उफ़् भी कर पाऊँ नहीं
वाह! तोफ़ा सुह्बते जाना में प्यारा मिल गया

मैं चलूँ इस राह वह चलता रहा उस राह पर
या ख़ुदा इस मिस्ल मुझको यार न्यारा मिल गया

ऐ मेरी किस्मत बता के मैं करूँ तो क्या करूँ
क्यूँ उसी को इस जहाँ का हुस्न सारा मिल गया

बेसबब मुझसे किनारा था किया जिसने कभी
शख़्स वो ही राहे उल्फ़त में दुबारा मिल गया

फिर सजी है सेज़ फूलों की तो इक ग़ाफ़िल को फिर
दार का फ़र्मान शायद आज यारा मिल गया

दार=फाँसी

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, अक्तूबर 28, 2015

अभी तूने मुझको सताया कहाँ है

अभी तो मुझे लुत्फ़ आया कहाँ है
अभी तूने मुझको सताया कहाँ है

तेरे हर गिले हैं सर आँखों पे लेकिन
बता के मुझे आज़माया कहाँ है

चला आ रहा मुस्कुराता हुआ जो
अरे यार तू चोट खाया कहाँ है

न रखना था गर तो मुझे सौंप देता
तू दिल का ख़जाना लुटाया कहाँ है

अगर आग है तो यक़ीनन जलेगा
अभी आशियाना बनाया कहाँ है

तसव्वुर में भी मेरे आया नहीं जब
सनम वक़्त अपना बिताया कहाँ है

ज़रा जुंबिशे लब पे ही ये तमाशा
अभी शे’र मैंने सुनाया कहाँ है

अभी तेरे ख़ुश होने के दिन हैं ग़ाफ़िल
अभी दिल किसी से लगाया कहाँ है

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, अक्तूबर 26, 2015

इसलिए दूर हम आप सब से रहे

उम्र भर हादिसों से गुज़रते रहे
इसलिए दूर हम आप सब से रहे

मछलियाँ हो गयीं अब सयानी बहुत
सब फिसलती रहीं हम पकड़ते रहे

दिल को तोड़ा है सबने बड़े शौक से
आप भी क्यूँ हिमाक़त ये करते रहे

वक़्त पर हो लिए सब रक़ीबों के सँग
शह्र में यूँ हमारे दीवाने रहे

याद है हर गुज़िश्त: शबे हिज़्र, हम
जिसमें ज़िन्दा रहे पर मरे से रहे

एक ग़ाफ़िल ने ऐसा भी क्या कह दिया
अब तलक आप मुँह जो फुलाए रहे

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, अक्तूबर 24, 2015

उधर रस्मे दुनिया इधर आशिक़ी है

अजब कशमकश में मेरी ज़िन्दगी है
उधर रस्मे दुनिया इधर आशिक़ी है

बता यह के बोसा मैं लूँ भी तो कैसे
तेरे रुख़ पे नागिन जो लट लोटती है

तेरा मुस्कुराकर नज़र का मिलाना
जिगर पे जूँ मीठी सी छूरी चली है

चल आ दूँ दिला आईने की गवाही
किया क़त्ल मेरा जो बस तू वही है

तेरे चश्मे मासूम में जाने जाना
कोई चीज़ ख़ंजर सी अक़्सर दिखी है

ये क्या है के कहते हो ग़ाफ़िल तुम्हारी
ग़ज़ल ही हुई है के इक फुलझड़ी है

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, अक्तूबर 22, 2015

दिल हुआ चोरी सरे बाज़ार है

इश्क़ में तो जीत जाना हार है
है यही सच पर मुझे इनकार है

बारहा खाया हूँ मैं जिससे शिकस्त
वह नज़र के तीर का ही वार है

आँख शीशे की हुई पत्थर का दिल
ऐसी ही ख़ूबी का मेरा यार है

जानते हो क्यूँ तमाशा हो रहा
मर्तबे से ही सभी को प्यार है

मैं बताऊँ आईना टूटा है क्यूँ
सामने आया जो पर्दादार है

आ रहा रोना मिज़ाजे इश्क़ पर
याँ रक़ीबों की अजब भरमार है

शे’र तो शब भर कहे पर इक न वाह
कौन सी यह रस्मे महफ़िल यार है

एक क़त्‌आ-

एक तो हैं आबलों के पा मिरे
और राहे इश्क़ भी पुरख़ार है
बढ़ चुके तो हैं क़दम पर यूँ लगे
यार से मिलना बहुत दुश्वार है

मक़्ता-

शह्र यह चोरों का है ग़ाफ़िल जी क्या
दिल हुआ चोरी सरे बाज़ार है

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, अक्तूबर 20, 2015

दर्द बेइख़्तियार होता है

प्यार क्या इक़्तिसार होता है
आप ही आप यार होता है

बात फ़ुर्क़त की सोच करके ही
दर्द बेइख़्तियार होता है

जी में खुबते हैं जूँ कई नश्तर
जब यक़ीं तार तार होता है

जी जला करके रौशनी की पर
कब किसे ऐतबार होता है

टूटना है नसीब आशिक़ का
कौन याँ ग़मगुसार होता है

दिल के उजड़े चमन का ग़ाफ़िल कौन
यूँ भी आबादकार होता है

(इक़्तिसार=जबरदस्ती, फ़ुर्क़त=ज़ुदाई, ग़मगुसार=हमदर्द, आबादकार=आबाद करने वाला)

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, अक्तूबर 19, 2015

मुखिया बोले झुनिया भै हलकान कहाँ

झूठै शोर मचायौ है शैतान कहाँ
मुखिया बोले झुनिया भै हलकान कहाँ

अब हमरी रक्षा करिहौ ऊपर वाले
कहाँ सबन कै ताना हमरी जान कहाँ

जेल काटि कै झबरा तौ आवा लेकिन
केहू बतावै फूँके रहा मकान कहाँ

भागा रहा निरहुआ तबसे नै लउटा
तुँही कहौ फिर फूँकिस ऊ खरिहान कहाँ

गाँव के सगरौ मनइन कै यक्कै रोना
निबरू बनिया के जइसन ईमान कहाँ

बूढ़ा बरगद अक़्सर पूछै ओ ग़ाफ़िल
झुरई काका वाला हिन्दुस्तान कहाँ

-‘ग़ाफ़िल’

रू-ब-रू होता हमेशा इक नया क़िर्दार है

सोच यह कैसी है के बंदा तो इज़्ज़तदार है
इसलिए उसको न यारों इश्क़ की दरकार है

देखकर मुझको वो ऐसा मुस्कुराए जा रहा
सोचता हूँ यार मेरा किस तरह बीमार है

लग रहा वह इश्क़ की दरिया में डूबेगा ज़ुरूर
कब तलक ख़ुद को डराएगा के यह अंगार है

दिल की दौलत से न जाने क्यूँ हुआ महरूम वह
मंसबे हुस्ने मुज्जसम का जो मंसबदार है

जब के आसानी से मैं रौंदा किया था ख़ार, अब
फूल राहों में बिछे हैं रास्ता दुश्वार है

बावते जाना यूँ ग़ाफ़िल आईना चुप है के जो
रू-ब-रू होता हमेशा इक नया क़िर्दार है

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, अक्तूबर 18, 2015

शरारा-ए-उल्फ़त को कैसे हवा दूँ

अरे आ तुझे प्यार करना सिखा दूँ
तुझे आज मैं जिन्दगी का मज़ा दूँ

कली फूल ख़ुश्बू क्या पूरा चमन ही
तिरे रास्ते मैं मेरी जाँ बिछा दूँ

हम उश्शाक़ की है सितारों से यारी
करे जी, तिरा आज दामन सजा दूँ

अभी जो लिखा इश्क़ का एक नग्मा
इजाज़त तो हो के तुझे मैं सुना दूँ

न बाकी रहे अब कोई रस्मे उल्फ़त
इशारा तो कर दे मैं ख़ुद को लुटा दूँ

ज़ुरूरी हुआ आज ग़ाफ़िल जी बोलो
शरारा-ए-उल्फ़त को कैसे हवा दूँ

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, अक्तूबर 15, 2015

एक ग़ाफ़िल से मिल के आए हैं

आप जब भी हमें बुलाए हैं
कुछ न कुछ बेतुकी सुनाए हैं

यूँ समझिए के आपका है लिहाज़
वर्ना हम भी पढ़े पढ़ाए हैं

सर पटकता है कोई पटके हाँ
हमतो वैसे निभे-निभाए हैं

आपने ख़ुद समझ लिया क्या के
आप अपने हैं हम पराए हैं

हमसे सुनिए तो फूल की ख़ूबी
आप जो हमसे ख़ार खाए हैं

याद क्या आप भी रखेंगे के
एक ग़ाफ़िल से मिल के आए हैं

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, अक्तूबर 12, 2015

रहा वादा मुहब्बत का सबक दमदार पढ़ लोगे

अगर पढ़ने पे ही आए तो बस अख़बार पढ़ लोगे
तुम्हें फ़ुर्सत कहाँ जो हर्फ़े उल्फ़त चार पढ़ लोगे

न कुछ बाकी बचेगा और पढ़ने को ज़माने में
उमड़ता आँख में गर प्यार का इज़हार पढ़ लोगे

मुहब्बत ही वो शै है जो के पत्थर को ख़ुदा कर दे
सबक मुश्किल ज़रा है पर इसे तुम यार पढ़ लोगे

ये गुलशन है, कली है, फूल हैं, सब ख़ूबसूरत हैं
रहे पढ़ते इसे ही जब भला क्या ख़ार पढ़ लोगे

निगाहे लुत्फ़ तो जानिब मिरी इक बार हो जाए
मिरे माथे पे उल्फ़त के लिखे अश्‌आर पढ़ लोगे

मदरसे में कभी ग़ाफ़िल के बस तुम दाख़िला ले लो
रहा वादा मुहब्बत का सबक दमदार पढ़ लोगे

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, अक्तूबर 11, 2015

तुम कहो ग़ाफ़िल इसे ज़िंदादिली कैसे कहूँ

हिस नहीं उसमें ज़रा भी है अभी कैसे कहूँ
दी उसे मुस्कान की क्यूँ पेशगी कैसे कहूँ

बह्र से जब बुझ नहीं सकती किसी की प्यास तो
हौसिला-ए-बह्र को दरियादिली कैसे कहूँ

आशिक़ी जब मर्तबे को देखकर होवै जवाँ
फिर निगोड़ी को भला मैं आशिक़ी कैसे कहूँ

शख़्स जो बदनीयती की हर हदों को तोड़कर
मुस्कुराए भी उसी को आदमी कैसे कहूँ

इश्क़ करता हूँ बताओ आप ही इस हाल में
आदते आतिशजनी को आपकी कैसे कहूँ

इश्क़ करते हो मगर इज़हार कर सकते नहीं
तुम कहो ग़ाफ़िल इसे ज़िंदादिली कैसे कहूँ

हिस=संवेदना शक्ति
बह्र=समन्दर
मर्तबा=ओहदा

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, अक्तूबर 09, 2015

ख़्वाब कितने बड़े हो गये

हर्फ़ जो ज़ह्र से हो गये
सब मिरे वास्ते हो गये

देखते देखते या ख़ुदा!
ख़्वाब कितने बड़े हो गये

घर मिरा जल गया भी तो क्या
आसमाँ के तले हो गये

फिर यक़ीनन बहार आएगी
ज़ख़्म मेरे हरे हो गये

बाग में एक गुल क्या खिला
सैकड़ों मनचले हो गये

दिल जुड़ा तो किसी से मगर
हिज़्र के सिलसिले हो गये

राहते जाँ मयस्सर कहाँ
दरमियाँ फ़ासिले हो गये

मंज़िलें नागमणि सी हुईं
साँप से रास्ते हो गये

कीजिए मेरे दिल पे रहम
आप फिर सामने हो गये

चाँद को देख ग़ाफ़िल तो क्या
अब्र भी बावरे हो गये

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, अक्तूबर 08, 2015

आप हैं के जवाब भूले हैं

जब तुम्हारी गली में आए हैं
यार पत्थर हज़ार बरसे हैं

हुस्न वालों से मात खा खाकर
इश्क़ में हम कमाल करते हैं

शेखियाँ क्यूँ बघारते हो जब
हम तुम्हारे क़रीब होते हैं

और दीदार को रहा भी क्या
मौत का रक्स ख़ूब देखे हैं

आज वो भी लगा रहे तुह्मत
नाज़ जिनके बहुत उठाए हैं

इश्क़ का है सवाल ग़ाफ़िल जी
आप हैं के जवाब भूले हैं

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, अक्तूबर 07, 2015

के ली जाँ आदमी ने आदमी की

इनायत गर नहीं होती किसी की
तो बदकारी न मर जाती कभी की

तेरी ख़ुदग़र्ज़ियां मुझको पता हैं
सबब यह है, नहीं जो बतकही की

तू होता संग, संगे-दिल न होता
नहीं होती फ़ज़ीहत बंदगी की

नज़रअंदाज़ उसको भी किया लो
जो हैं ग़ुस्ताखि़याँ तेरी अभी की

अजी मैंने ग़मों की स्याह शब में
जलाया दिल भले, पर रौशनी की

अँधेरी रात के पिछले पहर में
सुनी क्या चीख तूने भी नदी की

खड़ी है आदमी के बरमुक़ाबिल
कली वह एक मुरझाई तभी की

करे अफ़सोस ग़ाफ़िल इसलिए क्या
के ली जाँ आदमी ने आदमी की

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, अक्तूबर 06, 2015

तुम्हें लो आ गया जी इश्क़ से इंकार करना भी

मुझे तो अब तलक आया नहीं इज़हार करना भी
तुम्हें लो आ गया जी इश्क़ से इंकार करना भी

हुए कुछ यूँ ज़माने में समझते हैं ज़ुरूरी जो
गुज़रती पुरसुक़ूँ हर ज़िन्दगी दुश्वार करना भी

मज़ा हो के वो मुझको सोच ले मगरूर आशिक़ है
अदाओं से ज़ुरूरी है इसे लाचार करना भी

क़फ़स में इश्क़ तड़पे हुस्न भी है सात पहरे में
रहा मुमक़िन नहीं अब यार का दीदार करना भी

बड़ा दुश्वार है, दौरे रवाँ में हर मुसन्निफ़ को
महज़ शीरीं ज़ुबाँ में इक ग़ज़ल तय्यार करना भी

सभी ग़ाफ़िल पे तो उँगली उठाते हैं मगर सच है
के है आसाँ नहीं उस सा नया क़िरदार करना भी

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, अक्तूबर 04, 2015

सभी हारे हुए हैं आदतों से

किसे फ़ुर्सत मिली अपने ग़मों से
सभी हारे हुए हैं आदतों से

हक़ीक़त है कि उल्फ़त ने सिखाया
हमें दो चार होना हादिसों से

एक क़त्‌आ-

तिरे घर की दिलाएं याद हमको
नहीं शिक़्वा हमें है आबलों से
उन्हीं यादों में उलझे हैं, सुक़ूँ है
हम उकताए हैं अक़्सर राहतों से

और अश्‌आर-

हमारे बीच क्यूँ ये फ़ासिले हैं
बहुत डर लग रहा इन फ़ासिलों से

यूँ छलके जाम है आँखों का तेरे
छलकती है तबस्सुम जूँ लबों से

लगे है चाँद तब प्यारा बहुत ही
हमें जब झाँकता है बादलों से

हमेशा मात खाई दोस्ती में
जो ग़ाफ़िल था न हारा दुश्मनों से

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, अक्तूबर 02, 2015

चाहता ही रहा यूँ हुआ तो नहीं

सोचता हूँ कहीं तू ख़फ़ा तो नहीं
यूँ नज़र फेर लेना बज़ा तो नहीं

दिल धड़कने लगा क्यूँ मेरा यकबयक
हाथ से फिर तेरे वह गिरा तो नही?

थी नज़र क्या लड़ी होश गुम है मेरा
हादिसे में तेरा कुछ गया तो नहीं?

दिल तड़पता रहा और कहता रहा
शाद मैं हूँ मुझे कुछ हुआ तो नहीं

घर जले की शिक़ायत हो क्यूँ आग से
आग तेरी तरह बेवफ़ा तो नहीं

एक ग़ाफ़िल हो और तेरी तीरे नज़र
चाहता ही रहा यूँ हुआ तो नहीं

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, अक्तूबर 01, 2015

ये लंतरानी किसलिए

कोयलों के बीच कौवे की बयानी किसलिए
शर्मकर ख़ामोश रह ये लंतरानी किसलिए

ख़्वाहिशों के सिलसिले थे, चाँद शब थी और मैं
अब न हैं वे मस्अले फिर शब सुहानी किसलिए

जब हवाएं मिह्रबाँ थीं तो हुई क़श्ती रवाँ
सोचता हूँ नाख़ुदा की फिर प्रधानी किसलिए

आख़िरत में कह रहा है उम्र गुज़री है फ़ज़ूल
गो हक़ीक़त है मगर अब ये बयानी किसलिए

अब मेरी तन्हाहियाँ मुझको बहुत भाने लगीं
फिर मेरे मिलने बिछड़ने की कहानी किसलिए

फिक़्र ग़ाफ़िल को नहीं है सुनके भी चीखो पुकार
ख़ूँ रगों में तो है लेकिन मिस्ले पानी किसलिए

-‘ग़ाफ़िल’