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सोमवार, जनवरी 04, 2016

उसी पल वाक़ई तुम जीत की ख़ुशियाँ मनाओगे

मुहब्बत जंग है ऐसी के जिस पल हार जाओगे
उसी पल वाक़ई तुम जीत की ख़ुशियाँ मनाओगे

तुम्हारा मर्तबा क़ायम रहे ये है दुआ मेरी
मगर सच यह भी है के तुम मुझे ही भूल जाओगे

मेरे दर पे न आना है न आओ पर कहो के क्या
तसव्वुर में मेरे आने से ख़ुद को रोक पाओगे

मेरा दामन है कोरा पर मुझे ऐसा लगे है के
जो छूटे ही नहीं वह दाग़ तुम उस पर लगाओगे

मुझे ग़ाफ़िल कहो, पागल या के अलमस्त दीवाना
मैं कबका बन चुका यह सब मुझे अब क्या बनाओगे

लिखा हूँ शे’र दो इक पर मुसन्निफ़ मत समझ लेना
न माने तो मेरे क़िर्दार से धोखा ही खाओगे

बड़ी गुस्ताख़ नज़रें हैं ये ता’ज़ीरात क्या जानें
इन्हें लड़ने से ग़ाफ़िल जी भला क्या रोक पाओगे

(मुसन्निफ़=पद्यकार, ता’ज़ीरात=दण्ड संहिता)

-‘ग़ाफ़िल’

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