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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Saturday, February 27, 2016

अरे क्या साँप सूँघा है सभी को

किए बदनाम हैं सब आशिक़ी को
मगर हासिल हुआ क्या कुछ किसी को

हसीनों की सिफ़त मालूम है क्या?
नज़र से चीरती हैं आदमी को

किया इज़हार मैंने जो अचानक
अचानक हो गया कुछ उस कली को

चलो यूँ तो हुआ दौरे रवाँ में
नहीं होता ज़रर दिल की लगी को

हक़ीक़त में नहीं तो ख़्वाब में ही
मगर अपना बनाऊँगा उसी को

हुए मासूम से चेहरे सभी के
अरे क्या साँप सूँघा है सभी को

हुआ ग़ाफ़िल न मेरे सा कोई गर
लुटाएगा भला फिर कौन जी को

-‘ग़ाफ़िल’

3 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " अपना सुख उसने अपने भुजबल से ही पाया " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (29-02-2016) को "हम देख-देख ललचाते हैं" (चर्चा अंक-2267) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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