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बुधवार, मार्च 30, 2016

उसे हूर मिलती है बैठे बिठाए

गली में तेरी शख़्स जो मार खाए
सनद मिल गयी जूँ वो आशिक़ कहाए

चलो कुछ हुआ तो मुहब्बत से हासिल
सनम बेवफ़ा है यही जान पाए

नहीं इल्म रस्में मुहब्बत की जिसको
उसे हूर मिलती है बैठे बिठाए

परीशाँ है जी यार मेंरा तभी से
ख़ुदा शेख़ जी जब से ख़ुद का बताए

पिटेगा तू ग़ाफ़िल है कू-ए-सनम वो
चला जा रहा यूँ क़दम जो बढ़ाए

-‘ग़ाफ़िल’

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 31 - 03 - 2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2298 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" गुरुवार 31 मार्च 2016 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  3. चलो कुछ हुआ तो मुहब्बत से हासिल
    सनम बेवफ़ा है यही जान पाए

    कुछ तो हुआ। बढिया गज़ल गाफिल जी।

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