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बुधवार, जुलाई 13, 2016

था नहीं कोई ख़रीदार ख़ुदा जाने क्यूँ

थे कभी तुम भी ग़मग़ुसार ख़ुदा जाने क्यूँ
आज खाए हो तुम्हीं ख़ार ख़ुदा जाने क्यूँ

जल रहा इश्क़ में हूँ फिर भी लगी ये तुह्मत
मैं तुम्हारा हूँ गुनहगार, ख़ुदा जाने क्यूँ

जिस्म तो बिक ही गया रूह भी बिक जाती मगर
था नहीं कोई ख़रीदार ख़ुदा जाने क्यूँ

मैंने तो लाख दुहाई दी चढ़ाई क़स्में
तुमसे माना न गया यार ख़ुदा जाने क्यूँ

तुमने भी क्या न सितम ढाया मेरे दिल पे मगर
मैं ही था करता रहा प्यार ख़ुदा जाने क्यूँ

मैं तो फ़ित्रत से हूँ ग़ाफ़िल ऐ तमन्ना-ए-इश्क़
आह! तुम भी तो गई हार ख़ुदा जाने क्यूँ

-‘ग़ाफ़िल’

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