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बुधवार, अक्तूबर 26, 2016

क्यूँ नहीं दिल पर मेरे डाका पड़ा

इश्क़ तो यारो मुझे मँहगा पड़ा
वक़्ते वस्लत मैं जो पीकर था पड़ा

देख उसको, क्या हुआ इक चश्म ख़म
क्या कहें किस दर्ज़े का चाटा पड़ा

भूत का मैंने लिया जैसे ही नाम
वह मुआ सूरत में उसकी आ पड़ा

कोई बावर्ची नहीं थे जबके वे
नाम फिर भी मुल्ला दो प्याज़ा पड़ा

था परीशाँ रूसियों से इसलिए
सर जो मुड़वाया तभी ओला पड़ा

चाहता ग़ाफ़िल हूँ शिद्दत से तो, पर
क्यूँ नहीं दिल पर मेरे डाका पड़ा

-‘ग़ाफ़िल’

4 टिप्‍पणियां:

  1. जय मां हाटेशवरी...
    अनेक रचनाएं पढ़ी...
    पर आप की रचना पसंद आयी...
    हम चाहते हैं इसे अधिक से अधिक लोग पढ़ें...
    इस लिये आप की रचना...
    दिनांक 27/10/2016 को
    पांच लिंकों का आनंद
    पर लिंक की गयी है...
    इस प्रस्तुति में आप भी सादर आमंत्रित है।

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 27-10-2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2508 में दिया जाएगा ।
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  3. वाह . बहुत उम्दा,सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति

    मंगलमय हो आपको दीपों का त्यौहार
    जीवन में आती रहे पल पल नयी बहार
    ईश्वर से हम कर रहे हर पल यही पुकार
    लक्ष्मी की कृपा रहे भरा रहे घर द्वार

    उत्तर देंहटाएं