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शनिवार, फ़रवरी 27, 2016

अरे क्या साँप सूँघा है सभी को

किए बदनाम हैं सब आशिक़ी को
मगर हासिल हुआ क्या कुछ किसी को

हसीनों की सिफ़त मालूम है क्या?
नज़र से चीरती हैं आदमी को

किया इज़हार मैंने जो अचानक
अचानक हो गया कुछ उस कली को

चलो यूँ तो हुआ दौरे रवाँ में
नहीं होता ज़रर दिल की लगी को

हक़ीक़त में नहीं तो ख़्वाब में ही
मगर अपना बनाऊँगा उसी को

हुए मासूम से चेहरे सभी के
अरे क्या साँप सूँघा है सभी को

हुआ ग़ाफ़िल न मेरे सा कोई गर
लुटाएगा भला फिर कौन जी को

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, फ़रवरी 17, 2016

कुछ अलाहदा शे’र : तक़्दीर देखिए

1-
ऐसी ‘बहार’ क्या न हो जिसमें विसाले यार
हर बार ये ही सोचूँ मैं तक़्दीर देखिए
2-
ज़ख़्मों के मेरे चर्चे थोड़े बहुत हुए भी
चर्चे नहीं हुए गर तो आपकी बदी के
3-
आपके रुख़ पे न जाने क्यूँ है पहरा-ए-हिजाब
वर्ना तो पानी भरे हैं आफ़्ताबो माहताब
3-
वो था रू-ब-रू पै कहा लापता हूँ
कहे जा रही है फ़क़ीर उसको दुनिया
4-
रास्ते का शऊर जिसको नहीं
ख़ाक औरों को रास्ता देगा

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, फ़रवरी 06, 2016

मुफ़्त का खाया मगर पचता नहीं

सच है यह, तुझसे कोई रिश्ता नहीं
जी तेरे बिन पर कहीं लगता नहीं

है तस्सवुर ही ठिकाना वस्ल का
इश्क़ मुझसा भी कोई करता नहीं

ये भी है तीरे नज़र का ही कमाल
दिल है घाइल उफ़्‌ भी कर सकता नहीं

दर्द है गर तो दवा भी इश्क़ है
इश्क़ सा कुछ और हो सकता नहीं

क्या करोगे आस्तीनों के सिवा
साँप अब दूजी जगह पलता नहीं

घूमता हूँ शह्र की गलियों में पर
मुझको तेरे सा कोई जँचता नहीं

दाद तो ग़ाफ़िल को मिल जाएगी मुफ़्त
मुफ़्त का खाया मगर पचता नहीं

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, फ़रवरी 05, 2016

बढ़ रही रफ़्तार की दीवानगी चारों तरफ़

हर मुहल्ले, हर सड़क पर, हर गली, चारों तरफ़
है तेरा जल्वा, तेरी चर्चा रही चारों तरफ़

आस्माँ पे अब्र भी छाने से कतराने लगे
इस तरह फैली है तेरी रौशनी चारों तरफ़

तुझको मुझसे इश्क़ है ये बात तूने क्यूँ भला
एक बस मुझसे छुपाई औ कही चारों तरफ़

क्यूँ रहे अब धड़कनों पर भी किसी को ऐतबार
बढ़ रही रफ़्तार की दीवानगी चारों तरफ़

ख़ुश बहुत है इश्क़ फिर भी, गो तमाशा बन चुका
हो रही तारीफ़ जो अब हुस्न की चारों तरफ़

रख के शाने पर किसी ग़ाफ़िल के गोली दाग ले
शर्तिया होगी हँसी लेकिन तेरी चारों तरफ़

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, फ़रवरी 04, 2016

मगर हर साँप आखि़र साँप सूँघे से पड़े क्यूँ हैं

नहीं है वस्ल किस्मत में मगर यूँ फ़ासिले क्यूँ हैं
गयीं खो मंज़िलें फिर जगमगाते रास्ते क्यूँ हैं

तुम्हारे पास आने के बहाने सैकड़ों हैं पर
मुझे इक दो बहाने भी नहीं अब सूझते क्यूँ हैं

दिले बह्राँ में उनके है न थोड़ी भी जगह तो फिर
मुझे वो डूबने का लुत्फ़ लेने को कहे क्यूँ हैं

न हो भी ज़ह्र फिर भी फनफनाना तो ज़ुरूरी है
मगर हर साँप आखि़र साँप सूँघे से पड़े क्यूँ हैं

चलो माना मनाने का हुनर मुझको नहीं आता
पता उनको है जब ये राज़ फिर वो रूठते क्यूँ हैं

ये लाज़िम है फिसल जाए सुख़न की राह पर ग़ाफ़िल
उठाने से रहे गर दूर से वो घूरते क्यूँ हैं

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, फ़रवरी 03, 2016

के हद से गुज़रने को जी चाहता है

शरारों पे चलने को जी चाहता है
के हद से गुज़रने को जी चाहता है

मेरा आज चिकनी सी राहों पे चलकर
क़सम से फिसलने को जी चाहता है

मुझे सर्द आहों की है याद आती
मेरा अब पिघलने को जी चाहता है

क़शिश खींचती है मुझे घाटियों की
के फिर से उतरने को जी चाहता है

तेरे शोख़ दामन में मानिंदे ख़ुश्बू
मेरी जाँ विखरने को जी चाहता है

ग़रज़ के जबीं का न बल हो नुमाया
मेरा भी सँवरने को जी चाहता है

ग़ज़ल सुनके ग़ाफ़िल की बोले तो कोई
के फिर यार सुनने को जी चाहता है

-‘ग़ाफ़िल’