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बुधवार, अप्रैल 27, 2016

घाटियों में मुझे उतरना है

ज़िन्दगी में जो मेरे लफड़ा है
रहमतों से तुम्हारे पैदा है

वक़्त कोई बुरा नहीं होता
मान जाओ जो यह तो अच्छा है

बुज़्दिलों लड़ तो यूँ रहे जैसे
बस रक़ाबत तुम्हारा पेशा है

कुछ भी सोचा न जड़ दिया तुह्मत
है वो आशिक़ के इक लफंगा है

चोटियों की है नाप ले ली अब
घाटियों में मुझे उतरना है

कब ख़ुदा हो गया पता न चला
संग, मैंने जिसे तराशा है

दिल पे ग़ाफ़िल के वार करते हो
जानकर भी के यह तुम्हारा है

-‘ग़ाफ़िल’
(फोटो गूगल के सौजन्‍य से)

मंगलवार, अप्रैल 26, 2016

सुनो! बस हुक़्म दो! चाहोगे जो, बेहतर दिखा देंगे

जो यह पूछे हो के हम इश्क़ में क्या कर दिखा देंगे
सुनो! बस हुक़्म दो! चाहोगे जो, बेहतर दिखा देंगे
हैं ग़ाफ़िल तो मगर इतने भी हम ग़ाफ़िल नहीं हैं के
तुम्हारी तिश्नगी हो और हम सागर दिखा देंगे

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, अप्रैल 24, 2016

ग़ाफ़िल अब और नाज़ उठाया न जाएगा

अब तेरे कू-ए-संग में आया न जाएगा
जी पत्थरों के बुत से लगाया न जाएगा
तेरे सितम हज़ार सहा ज़ेह्नो जिस्म पर
ग़ाफ़िल अब और नाज़ उठाया न जाएगा

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, अप्रैल 22, 2016

जो भी है तू पर कोई ग़ाफ़िल नहीं है

हुस्न शायद जो मुझे हासिल नहीं है
ख़ूब है पर इसका मुस्तक़्बिल नहीं है

जानता है ख़ासियत क्या इश्क़ की तू
इस समन्दर का कोई साहिल नहीं है

इश्क़ का आया नहीं तुझको सबक और
क्या मज़े से कह रहा मुश्किल नहीं है

क्या करें उश्शाक़ ऐसा दौर आया
रास्ते हैं लाख पर मंज़िल नहीं है

आश्नाई भी हो तो कैसे हो तुझसे
है पता जब तू कोई क़ातिल नहीं है

देखने को नाज़नीनों में है सब कुछ
और देने को ज़रा भी दिल नहीं है

कह दिया तो कह दिया, माना के जानम
शे’र तेरी बज़्म के क़ाबिल नहीं है

लोग कहते हैं करूँ क्यूँ ख़ैरमक़्दम
जो भी है तू पर कोई ग़ाफ़िल नहीं है

( मुस्तक़्बिल=भविष्य, साहिल=किनारा, बज़्म=महफ़िल, उश्शाक़=आशिक़ लोग, ख़ैरमक़्दम=स्वागत)

बुधवार, अप्रैल 20, 2016

कोई शब मुझको बुलाएगा

हंसाएगा, रुलाएगा, बहाने भी बनाएगा
पता है यह के तू हर गाम मुझको आज़माएगा

मुझे क़ाफ़िर कहा, माना के पीता हूँ निग़ाहों से
अरे क्या शेख़ अपना क़ाइदा यूँ ही चलाएगा?

कोई उम्मीद तो अब हो के मेरा यार शिद्दत से
तसव्वुर में ही लेकिन कोई शब मुझको बुलाएगा

है दिल अब हादिसों का शह्र, था जो अम्न की बस्ती
अदा-ओ-नाज़ से ज़ालिम तू कब तक क़ह्र ढाएगा

निशाना चूकना तेरी निग़ाहों का बदा है गर
तो आऊँ लाख तेरे सामने पर चूक जाएगा

लिया ग़ाफ़िल से है पंगा यक़ीं हो जाएगा ऐ दिल
के तेरी तर्फ़दारी में यहाँ कोई न आएगा

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, अप्रैल 18, 2016

आओ शादी शादी खेलें

आदाब दोस्तो! चार लाइन बस एवैं-

आओ शादी शादी खेलें
तन मन की बर्बादी खेलें
खेल चुके अब ख़्वाब सुहाने
ग़ुम होती आज़ादी खेलें

आओ शादी शादी खेलें...

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, अप्रैल 16, 2016

आदमी के हुआ सर का भार आदमी

हैं ख़रीदार भी बेशुमार आदमी
बेचता है धड़ल्ले से प्यार आदमी

बेवफ़ाओं की चर्चा सरेआम है
पर किये जा रहा ऐतबार आदमी

इश्क़ में जाँ लुटाने की फ़ुर्सत किसे
बस लगाता है यूँ ही गुहार आदमी

पॉलिसी इश्क़ के मॉर्केट की है यूँ
टूटता जा रहा कि़स्तवार आदमी

अश्क गौहर हैं आई न इतनी समझ
और रोता रहा जार जार आदमी

यार ग़ाफ़िल यही दौरे दुश्वार है
आदमी के हुआ सर का भार आदमी

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, अप्रैल 15, 2016

कौन आएगा

जाम आँखों से पिलाने कौन आएगा
इक सिवा तेरे दीवाने कौन आएगा

ठीक है कर ले तग़ाफ़ुल ऐ ज़माने तू
सोचना पर आज़माने कौन आएगा

सुर्ख़ियों में नाम मेरा आ गया पर अब
सुर्ख़ आँखों से बचाने कौन आएगा

जा रहा जो दिल दयारां से, जा बंजारे!
फ़र्क़ क्या दिल तोड़ जाने कौन आएगा

आज फिर सैलाब सा है दिल के दर्या में
देखता हूँ डूब जाने कौन आएगा

तेरी ताबानी-ए-रुख़ गर कम हुई तो जी
एक ग़ाफ़िल का जलाने कौन आएगा

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, अप्रैल 13, 2016

आए क़रार भी तो मुकरने के बाद ही

आए है लुत्फ़ यार पे मरने के बाद ही
जाना की संगे कू से गुज़रने के बाद ही

देखा है मैंने यह भी के हर बुततराश को
धोखा दिया बुतों ने संवरने के बाद ही

छाया दिलो दिमाग़ पे है इश्क़ का सुरूर
दुनिया दिखेगी लेकिन उतरने के बाद ही

मुझको जो दिलफ़रेब ने लाचार कर दिया
समझो के अश्क आँख में भरने के बाद ही

ग़ाफ़िल! जो चाहो चीज़ वो मिलती है क्या भला?
आए क़रार भी तो मुकरने के बाद ही

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, अप्रैल 11, 2016

होता ग़ाफ़िल तो क्या नहीं होता

घर किसी का बसा नहीं होता
प्यार गर कुछ रहा नहीं होता

जिस क़दर राह रोक रक्खे हो
इश्क़ यूँ भी अता नहीं होता

ज़िन्दगी के हज़ार नख़रे हैं
पर कोई आप सा नहीं होता

बात चल दी तो चलती जाएगी
गोया के उसके पा नहीं होता

मै तो पीता हूँ पर तज़ुर्बा है
इश्क़ जैसा नशा नही होता 

पास तो सब हैं फिर भी लगता है
होता ग़ाफ़िल तो क्या नहीं होता

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, अप्रैल 08, 2016

कितने अस्बाब हैं जी मेरा चुराने वाले

सुब्ह सूरज को अगर दीप दिखाने वाले
काश! हो पायँ दीया शब को जलाने वाले

सोचने से ही फ़क़त कुछ भी न हासिल होगा
सिर्फ़ तक़दीर पे ऐ अश्क बहाने वाले

बात बेढब है मगर फिर भी कहे देता हूँ
आईना ख़ुद भी कभी देखें दिखाने वाले

ये क़यामत का शबाब उसपे तबस्सुम तेरा
कितने अस्बाब हैं जी मेरा चुराने वाले

एक ग़ाफ़िल की ज़रा देखिए तासीरे अश्आर
शे’र सुन सो ही गये ताली बजाने वाले

-‘ग़ाफ़िल’