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शनिवार, मई 28, 2016

हम संभल गये

कल क्या थे और आज वो कितना बदल गये
गिरगिट से भी जनाब कुछ आगे निकल गये

जी में हमारे आग लगाने को मोहतरम
आए हज़ार बार मगर खुद ही जल गये

देखा जो जामे चश्म तो फिर आ गया क़रीब
और ये हुआ के तीरे नज़र दिल पे चल गये

रोना भी यार अपना ग़ज़ब दे गया नफ़ा
जी में थे जो मलाल सब अश्कों में ढल गये

कुछ और ही तरह से अनासिर का अस्र है
जोे आप भी तो चाँद के आते पिघल गये

कल की न बात कीजिए मालूम भी है क्या
आया तो एक भी न मगर कितने कल गये

ग़ाफ़िल जी राजे इश्क़ यहाँ फ़ाश यूँ हुआ
वे तो नज़र गिराए मगर हम सँभल गये

अनासिर=पंचभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश)
-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, मई 27, 2016

कहा लोग साहिल पे ही डूबते हैं

न जाने वो क्यूँ बारहा पूछते हैं
हम उनके सिवा और क्या चाहते हैं

उन्हें देखकर हैं न आँखें अघातीं
हमें प्यार से जब भी वो देखते हैं

हुज़ूर इस तरह देखना कनखियों से
हमें है पता आप क्या चाहते हैं

लज़ाकर हुए आप जो पानी पानी
हम अब आप में डूबते तैरते हैं

हुआ जाए अम्नो सुकूँ सब नदारद
फिर उल्फ़त का हम भूत क्यूँ पालते हैं

किनारे ही ग़ाफ़िल लगा डूबने तो
कहा लोग साहिल पे ही डूबते हैं

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, मई 24, 2016

बुत कोई यूँ न तराशा जाए

वो बताए तो भला क्या जाए
पास मेरे वो अगर आ जाए

मुझको बोले हो अगर आने को
उसको भी यार बुलाया जाए

दिक्कतें मैंने सहीं छोड़ो भी
क्यूँ ज़माने को लपेटा जाए

आशिक़ी तो है इबादत यारो
क्यूँ न इस तर्ह भी सोचा जाए

ख़ूब हो पर न हो महबूब का अक्स
बुत कोई यूँ न तराशा जाए

मुझको तारीफ़ की चाहत न ज़रा
पर न यूँ हो के न देखा जाए

काम ग़ाफ़िल न करो यूँ के तुम्हें
हर तरफ़ से ही लताड़ा जाए

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, मई 23, 2016

यूँ ही

न आता है कोई यादों में यूँ ही
न घुलता है नशा साँसों में यूँ ही

जवाँ कज़रारी शब नाज़ो अदा से
खिंची जाए मेरी आँखों में यूँ ही

तज़र्बा है बहुत हुस्नो हसब का
न उलझाओ मुझे ख़्वाबों में यूँ ही

तेरे दीदार से महरूम हूँ मैं
गुज़रता वक़्त है सदियों में यूँ ही

अरे वो शब! गयी थी हिज़्र में जो!
ले आया क्यूँ उसे बातों में यूँ ही

यक़ीनन मुस्कुराया होगा ग़ाफ़िल
नहीं चर्चा चली गलियों में यूँ ही

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, मई 22, 2016

ख़्वाब आते हैं

ताब तो ख़ुद देखने की है नहीं उनमें
आईना हमको वो जाने क्यूँ दिखाते हैं
चूम गुंचे जाने कितने और किन किन को
बरगलाने शब को सारे ख़्वाब आते हैं

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, मई 18, 2016

आप

क्यूँ बेवफ़ा का नाम लिए जा रहे हो आप
महफ़िल क्यूँ उसके नाम किए जा रहे हो आप
ग़ाफ़िल जी भूल जाओ गो पुरलुत्फ़ दर्द है
जुल्मत को ख़ुद का नाम दिए जा रहे हो आप

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, मई 14, 2016

क्या क्या कर गुज़रते हैं

बड़ा शुह्रा ज़माने में रहा परहेज़गारी का
हुआ कुछ तो के अब जो शेख़ मैख़ाने में मिलते हैं
बड़ी है बात ग़ाफ़िल! नाज़नीं इक मुस्कुरा दे बस
तो हज़रत ख़ुद के जी के साथ क्या क्या कर गुज़रते हैं

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, मई 11, 2016

दम मेरा छूट जाए

जब मौत मेरी आए तो आए इस तरह के
बाहों में तेरी ग़ाफ़िल दम मेरा छूट जाए

-‘ग़ाफ़िल’

आर करो या पार करो

इश्क़ में जीने वालों का जीना ही मत दुश्वार करो
हे ईश्वर! हम उश्शाक़ों का भी तो बेड़ा पार करो

लुत्फ़ भला क्या जब मेरे शिक़्वे कर रहे रक़ीबों से
जितना भी करना है मुझसे ही मेरे सरकार करो

ऐसा भी है नहीं के मुझको ही तुमसे है इश्क़ हुआ
तुमको भी है प्यार, न उसका भले यार इज़हार करो

तलब लगे तो मुझे पिलाओ आँखों से आबे अह्मर
नहीं तुम्हारा कुछ जाएगा इतना तो दिलदार करो

रोज़ रोज़ दौराने इश्क़ां लुकाछुपी मंज़ूर नहीं
करना है जो करो आज ही, आर करो या पार करो

क़त्ल शौक से हो जाएगा ये ग़ाफ़िल बस इक पल में
आँखों को थोड़ी जुंबिश दे अपनी नज़र कटार करो

(उश्शाकों=आशिक़ लोगों, आबे अह्मर=लाल रंग की एक ख़ास शराब)

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, मई 10, 2016

फूल ग़ाफ़िल जी खिले भी ख़ूब थे

चश्म तर थे पर लड़े भी ख़ूब थे
याद है क्या हम मिले भी ख़ूब थे

मंज़िले उल्फ़त रही हमसे जुदा
गो के उस जानिब चले भी ख़ूब थे

नाज़नीं का रुख़ समझ कर चाँद हम
वक़्त था जब देखते भी ख़ूब थे

था चढ़ा भी इश्क़ का सर पे जुनून
और फ़र्माते डरे भी ख़ूब थे

जिस्म दो इक हो न पाए उम्र भर
गो दिलोंं में राबिते भी ख़ूब थे

ख़ुश्बुओं से था चमन महरूम और
फूल ग़ाफ़िल जी खिले भी ख़ूब थे

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, मई 09, 2016

हज़ारों हुए जा रहे जलने वाले

समझ में न आए ज़रा भी ये ग़ाफ़िल
ख़ुदा जाने क्या क्या रवायत बनाई
हज़ारों हुए जा रहे जलने वाले
मिली जो मुझे सीधी सादी लुगाई

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, मई 07, 2016

मुझको भले निशाना कर लो

मुझ तक आना-जाना कर लो
इतना तो मनमाना कर लो

इश्क़ मुझी से होना तै है
चाहे लाख बहाना कर लो

तुम भी मजनूं हो जाओगे
बस मुझसे याराना कर लो

मेरी आँखें मैख़ाना हैं
जी अपना मस्ताना कर लो

कभी तो छूटे तीर नज़र का
मुझको भले निशाना कर लो

शौके सुख़न है गर ग़ाफ़िल जी
इक उस्ताद पुराना कर लो

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, मई 06, 2016

इश्क़बाज़ों को भला काम की फ़ुर्सत है क्या

दर्द देने की मुझे तेरी भी फ़ित्रत है क्या
मेरे जज़्बात से तुझको भी अदावत है क्या

मुझको रुस्वा जो किया इश्क़ में करता हूँ मुआफ़
देख पर पास तेरे थोड़ी भी इज़्ज़त है क्या

इश्क़ मैंने है किया जिससे वही बुत ठहरा
कोई बोले तो सही यह भी इबादत है क्या

इश्क़बाज़ी की मेरे चर्चा सरेआम हुई
है ये तारीफ़ नहीं तो फिर ये तुह्मत है क्या

जो लपट सी है उठी जाये मेरे सीने में
है न तेरी तो फिर दुनिया की इनायत है क्या

लोग उम्मीद लगाए हैं ग़ज़ब ग़ाफ़िल से
इश्क़बाज़ों को भला काम की फ़ुर्सत है क्या

-‘ग़ाफ़िल’