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गुरुवार, जून 30, 2016

बज़्मे तरब में तुझको तो आना ज़ुरूर है

रुस्वाई-ए-शहर का बहाना ज़ुरूर है
उसको तो मेरे सिम्त से जाना ज़ुरूर है

मुझको पता है जान! रक़ीबों के वास्ते
बज़्मे तरब में तुझको तो आना ज़ुरूर है

मैं इक निग़ाह डाल भी सकता नहीं हूँ गो
वह मेरे टूटे दिल का फ़साना ज़ुरूर है

आई न मेरी याद तुझे औ मैं आ गया
पहलू में तेरे शाम बिताना ज़ुरूर है

महफ़िल में छा गया है ग़ज़ब फिर भी किस तरह
ग़ाफ़िल का शे’र गोया पुराना ज़ुरूर है

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, जून 17, 2016

वाह री ज़िन्दगी

गोया है मिह्रबाँ आज भी ज़िन्दगी
पर कहाँ अब वो अपनी रही ज़िन्दगी

मैं था हैरान क्या हो रहा है यहाँ
और मुझसे रही खेलती ज़िन्दगी

मैं तवज़्ज़ो दिया उम्र भर बेश्तर
फिर रही क्यूँ कटी की कटी ज़िन्दगी

फ़ाइदा ग़ैर का और अपना ज़रर
तू किए जा रही वाह री ज़िन्दगी

अब तलक ख़ार चुभते चले आ रहे
फिर कहूँ क्यूँ के है रसभरी ज़िन्दगी

राह में थे हज़ारों मक़ाम उसके पर
एक की भी नहीं हो सकी ज़िन्दगी

आज गर है ख़िज़ाँ तो बहार आए कल
यह पता है तो क्या सोचती ज़िन्दगी

कह रहा हूँ के कर दे गिला दूर सब
क्या करेगी न फिर गर मिली ज़िन्दगी

जीतना था अजल को गई जीत पर
आख़िरी साँस तक है लड़ी ज़िन्दगी

सोचता ही रहा वक़्ते रुख़्सत मैं यह
एक ग़ाफ़िल की भी क्या रही ज़िन्दगी

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, जून 15, 2016

क्या सचमुच होता ऐसा है

यारो दीवाना कोई जब ख़ुद पे आया है
होता इक इतिहास मुक़म्मल मैंने देखा है

वो चन्दा मामा भी अब मुझसे है रूठा सा
जो तब रोज़ कटोरा भर भर दूध पिलाया है

वैसे तो महफ़िल में होते हैं कुछ जूँ अपने
लेकिन मिलते ही नज़रें क्यूँ होता धोखा है

इश्क़ मुझे है तुमसे ऐसा भरम नहीं पालो
फ़ित्रत है इसकी जो ये दिल मचला करता है

हार चुके हो बाज़ी उल्फ़त की अब ज़िद कैसी
इन खेलों में यार कहाँ मिलता हर्ज़ाना है

मेरे अह्बाबों को मुझसे कुछ भी गिला नहीं
ग़ाफ़िल दुनिया में क्या सचमुच होता ऐसा है

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, जून 13, 2016

और क्या?

मंज़िले इश्क़ का है पता और क्या?
या बताओगे है रास्ता और क्या?

इस क़दर क्यूँ मियाँ आप हैरान हैं
बस ज़फ़ाई किया वह किया और क्या?

जब कहा वह के दिल से किया बेदख़ल
तो भला अब रखें राबिता और क्या?

हम थे मज़्बूर झक मारते ही रहे
मारने के लिए पास था और क्या?

दिल लुटा छोड़िए लुट गया आदतन
बोलिए है लुटा आपका और क्या?

दिल की चोरी का ही ये न कोहराम है
फिर कहे तो कोई के हुआ और क्या?

आपके तंज़ ग़ाफ़िल जी क्या कम थे जो
आप चुप हो गए, हैं ख़फ़ा और क्या?

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, जून 12, 2016

पर बड़ाई है के तुह्मत कौन जाने

लिख रहा हूँ मैं ग़ज़ल शामो सहर पर
मेरी है थोड़ी भी इज़्ज़त कौन जाने
वाह तो भरपूर मिल जाती है ग़ाफ़िल
पर बड़ाई है के तुह्मत कौन जाने

(कुछ लकीरें टेढ़ी मेढ़ी खेंच दी सफ्हा-ए-दिल पर
लोग देखे और बोले शा’इरी उम्दा हुई है)

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, जून 10, 2016

दिल तो वैसे भी कब रहा अपना

जान लो क़त्ल हो गया अपना
नैन उससे अगर मिला अपना

तू ही था अपना पर है ग़ैर का अब
दिल तो वैसे भी कब रहा अपना

मैक़दा है ये पास आजा अदू
साथ याँ कौन है दिया अपना

अब तलक आलमे बेहोशी है
मुस्कुराकर कोई कहा अपना

हार अपनी कहूँ के जीत कहूँ
जो है जीता वो ख़ास था अपना

शाने महफ़िल है क़स्म से ग़ाफ़िल
शे’र मारा हुआ तेरा अपना

(अदू=दुश्मन)

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, जून 06, 2016

किसी भी तर्ह जीने दे नहीं सकती है तुह्मत ये

बदल जाना तेरा यूँ और उस पर भी फज़ीहत ये
के अब हर पल रक़ीबों से हमारी ही शिक़ायत ये

न करना भूलकर भी भूल हमको कम समझने की
वगरना तुझको लेकर डूब ही जाएगी आदत ये

हमारे पास पहले से बहुत धोखे हैं वैसे भी
इनायत कर तू इतनी अब न कर हम पर इनायत ये

हम अपने चाहने वालों को लेंगे खोज ही इक दिन
पसीना बह रहा है रंग भी लाएगी मेहनत ये

चलो अच्छा हुआ जो हुस्न से है उठ गया पर्दा
नहीं तो झेलता रहता ही जी ता’उम्र ज़िल्लत ये

कहा था कौन ग़ाफ़िल इश्क़ फ़र्माने को बतलाओ
किसी भी तर्ह जीने दे नहीं सकती है तुह्मत ये

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, जून 04, 2016

जेवर क़ीमती तक आ गये

नेकियाँ थीं ऑप्शन फिर भी बदी तक आ गये
सामने दर्या था और तुम तिश्नगी तक आ गये

पाँवों की जुम्बिश से तुमको कब रहा है इत्तेफ़ाक़
बात कुछ है चलके जो मेरी गली तक आ गये

क्या किसी की लाश को मिल भी सकी इसकी पनाह
सोचता हूँ फ़ालतू ही तुम नदी तक आ गये

है मेरे अल्लाह का ही सबसे ऊँचा मर्तबा
क्या करोगे इस भुलावे में नबी तक आ गये

कुछ क़दम ही दूर है अब मंज़िले उल्फ़त जनाब
हम सभी उश्शाक़ शे’रो शाइरी तक आ गये

नक़्ल की रौनक़ के आगे पानी भरने को ग़ज़ब
देखिए ग़ाफ़िल जी जेवर क़ीमती तक आ गये

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, जून 02, 2016

हर ओर तिश्नगी है हर ओर ग़म के साये

तुह्मत तो आप हम पर थे शौक से लगाए
है दाद बाँटनी तो हम क्यूँ न याद आए

गर इश्क़ हम किये तो फ़र्मा दिए भी सच सच
हम जब भी मात खाए तो इस सबब ही खाए

हुस्नो हसब ही बाइस उसके गुरूर के हैं
पर क्या पड़ी है किसको उसको जो यह बताए

छेड़ा तो इश्क़ का सुर दिल ने हमारे लेकिन
नखरों के उसके चलते वह टूट ही न जाए

शमशान तक ही चाहे जाना तो लाज़िमी है
ज़न्नत किसे मिली है घर बैठे और बिठाए

दुनिया-ए-इश्क़ का भी हो क्या बयान ग़ाफ़िल
हर ओर तिश्नगी है हर ओर ग़म के साये

-‘ग़ाफ़िल’