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शनिवार, जुलाई 30, 2016

मगर जाता है

क्यूँ बताता है नहीं दोस्त किधर जाता है
और जाता है तो किस यार के घर जाता है

पास आ मेरे सनम जा न कहीं आज की रात
या मुझे लेके चले साथ, जिधर जाता है

तू जो आ जाये है पल को ही तसव्वुर में सही
साँस रुक जाती है और वक़्त ठहर जाता है

हूक उट्ठे है वो शब वस्ल की याद आए है जब
एक ख़ंजर सा कलेजे में उतर जाता है

मैंने रोका तो बहुत तेरी तरफ़ जाने से
जी कहा भी के न जाऊँगा मगर जाता है

राज़ तो फ़ाश हो जाएगा ज़फ़ाई का तेरा
अब जनाज़े से मेरे उठके अगर जाता है

छोड़कर जाम मेरी मस्त नज़र का ग़ाफ़िल
आजकल दर से मेरे यूँ ही गुज़र जाता है

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, जुलाई 28, 2016

भूल जाओ किसका आना रह गया

क्या बताऊँ? क्या बताना रह गया
सोचता बस यह, ज़माना रह गया

क्या यही चारागरी है चारागर!
जख़्म जो था, वो पुराना...! रह गया

लोग आए, शाम की, जाते बने
रह गया तो बादाख़ाना रह गया

इश्क़ में है जी जला फिर जिस्म भी
तू बता अब क्या जलाना रह गया

है कहाँ अब थी जो लज़्ज़त प्यार की
याद करने को फ़साना रह गया

आप ग़ाफ़िल जी लिखे जाओ अश्आर
भूल जाओ किसका आना रह गया

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, जुलाई 26, 2016

रात ही जब हुई मुख़्तसर

गो है आवारगी बेश्तर
हो गए शे’र अपने मगर

एक क़त्आ-

क्या गुमाँ नाज़नीनों को है
क्यूँ हैं घबराए हम इस क़दर
आई टोली है जब पील की
टूटते ही रहे हैं शजर

और तमाम अश्आर-

मेरे अरमाँ सहम से गये
डाली तूने है कैसी नज़र

तेरे आने की हो क्यूँ ख़ुशी
तेरे जाने की है जब ख़बर

रौशनी हो सकी क्या, ये दिल
जबके जलता रहा रात भर

राबिते की वज़ह भी तो है
रूठना तेरा हर बात पर

मक़्ताशुदा एक और क़त्आ-

मंज़िले इश्क़ सर हो तो क्यूँ
रात ही जब हुई मुख़्तसर
वरना तो इश्क़ फ़र्माने को
एक ग़ाफ़िल भी रक्खे जिगर

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, जुलाई 25, 2016

बता फिर तेरी क़ीमत और क्या है

ख़रा तो हूँ अदावत और क्या है
तुझे मुझसे शिक़ायत और क्या है

है मेरे सर पे तेरा दस्त या रब!
भला मेरे लिए छत और क्या है

कहाँ अब तुझको मेरा ग़म सताए
न है यह तो फ़ज़ीहत और क्या है

चुकाया था तो पर ज़िद पे है अब तू
बता फिर तेरी क़ीमत और क्या है

चले हर सू से सर पे संग फिर यह
न उल्फ़त है तो उल्फ़त और क्या है

ग़नीमत है के सर तो है सलामत
इस उल्फ़त में सलामत और क्या है

इनायत है तेरी ऐ मेरे हमदम
ज़ियादा इससे राहत और क्या है

परीशाँ कर रहा मुझको तू ग़ाफ़िल
अलावा इसके आदत और क्या है

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, जुलाई 20, 2016

लुत्फ़ आए जो थोड़ी फ़ज़ीहत भी हो

हो कभी तो वही अपनी ज़िल्लत भी हो
या ख़ुदा इश्क़ ही मेरी ताक़त भी हो

मंज़िले इश्क़ हासिल तो हो जाए गर
उससे इज़्हार की थोड़ी हिम्मत भी हो

है दगाबाज़ पर ग़ौर से देखिए
शायद उसमें ज़रा सी शराफ़त भी हो

यार तारीफ़ केवल उबाऊ लगे
लुत्फ़ आए जो थोड़ी फ़ज़ीहत भी हो

जी को राहत न हो तो भला आपकी
होके होना भी क्या गर इनायत भी हो

एक ‘ग़ाफ़िल’ को फिर और क्या चाहिए
जब दुआ हो, दवा हो, नसीहत भी हो

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, जुलाई 19, 2016

ये पा उधर बढ़ें न जिधर तेरा घर नहीं

अश्कों को रोकता हूँ मैं रुकते मगर नहीं
आतिश हैं वो के आब हैं उनको ख़बर नहीं

इस शह्र के हैं लोग अजब ही ख़याले ख़ाम
दुश्मन भी गर मिले तो मिले मातिबर नहीं

भड़केगी आग और हो जाएगा ख़ाक तू
आतिशजनी से होगा अलग अब भी गर नहीं

पूछें यही सभी के मिलोगे किधर जनाब
मैं कह रहा हूँ जबके मैं रहता किधर नहीं

आती नहीं है नींद के जैसे कहा हूँ मैं
जाना जिधर हो जाए पर आए इधर नहीं

ग़ाफ़िल भी चाहता है के आदत में हो शुमार
ये पा उधर बढ़ें न जिधर तेरा घर नहीं

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, जुलाई 17, 2016

आवारा कर दिया शह्र की गलियों ने

कहता हूँ सावन की स्याह घटाओं ने
उलझाया पर मुझको तेरी ज़ुल्फ़ों ने

शह्र की गलियों में है जो अफ़रातफ़री
आज शैर की ठानी है दिलवालों ने

सकते में है बाग़बान करता भी क्या
साथ चमन के गद्दारी की फूलों ने

फ़ित्रत से मैं रहा घुमक्कड़ मुझे मगर
आवारा कर दिया शह्र की गलियों ने

आज बन गया जी का भर्ता बेमतलब
ऐसी ऐसी ग़ज़ल सुनाई लोगों ने

चल भी लेता बिना सहारे मैं ग़ाफ़िल
मगर बिगाड़ी आदत तेरे कन्धों ने

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, जुलाई 16, 2016

अक्स किसका मगर यार बनाता रहा

हिज़्र की आग में जी सुलगता रहा
और पूछे है तू हाल कैसा रहा!

गो लुटा मैं तेरे प्यार में ही मगर
देख तो हौसला प्यार करता रहा

धरपकड़ में मेरा, हुस्न और इश्क़ के
जिस्म छलनी हुआ, जी छलाता रहा

आईना था वही और मैं भी वही
अक्स किसका मगर यार बनता रहा?

ख़ार के रास्तों, हादिसों का शहर
तेरा, किस बात पे नाज़ करता रहा?

लाश अरमान की ग़ज़्ब ता’ज़िन्दगी
मैं ग़रीब अपने कन्धे पे ढोता रहा

इल्म ग़ाफ़िल तुझे इसका हो भी तो क्यूँ
इश्क़ में हिज़्र का ही तमाशा रहा

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, जुलाई 14, 2016

मगर सच में तू दम भरता नहीं है

कभी मुझसा कोई कहता नहीं है
मगर कोई मेरी सुनता नहीं है

हज़ारों हैं रहे उल्फ़त में लेकिन
कोई तुमसा मुझे जँचता नहीं है

अरे! तू मुस्कुरा लेता है कैसे
ये ग़ुस्ताख़ी कोई करता नहीं है

यूँ पर्दादारी भी क्या पर्दादारी
दुपट्टा अब तेरा उड़ता नहीं है

बड़े अफ़सोस की है बात अब तू
अदा-ए-शोख़ पर मरता नहीं है

है चर्चे में तेरी वादाखि़लाफ़ी
मगर तू शर्म से गड़ता नहीं है

मसन्निफ़ कम नहीं हैं आज यारो!
हक़ीक़त पर कोई लिखता नहीं है

तुझे मंज़िल तो मिल जाती ही ‘ग़ाफ़िल’
मगर सच में तू दम भरता नहीं है

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, जुलाई 13, 2016

था नहीं कोई ख़रीदार ख़ुदा जाने क्यूँ

थे कभी तुम भी ग़मग़ुसार ख़ुदा जाने क्यूँ
आज खाए हो तुम्हीं ख़ार ख़ुदा जाने क्यूँ

जल रहा इश्क़ में हूँ फिर भी लगी ये तुह्मत
मैं तुम्हारा हूँ गुनहगार, ख़ुदा जाने क्यूँ

जिस्म तो बिक ही गया रूह भी बिक जाती मगर
था नहीं कोई ख़रीदार ख़ुदा जाने क्यूँ

मैंने तो लाख दुहाई दी चढ़ाई क़स्में
तुमसे माना न गया यार ख़ुदा जाने क्यूँ

तुमने भी क्या न सितम ढाया मेरे दिल पे मगर
मैं ही था करता रहा प्यार ख़ुदा जाने क्यूँ

मैं तो फ़ित्रत से हूँ ग़ाफ़िल ऐ तमन्ना-ए-इश्क़
आह! तुम भी तो गई हार ख़ुदा जाने क्यूँ

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, जुलाई 12, 2016

हुआ एक अर्सा गए भी हँसी को

दिए क्या भला आज तक ज़िन्दगी को
लगाए नहीं तुम गले गर किसी को

नहीं रोक पाओगे ख़ुद को जो मेरी
तसव्वुर में लाओगे तश्नालबी को

दहल जाएगा दिल तुम्हारा भी बेशक
निहारोगे जब भी मेरी बेबसी को

न डूबा तो क्या लाश मुझको कहोगे
मैं हूँ तैरकर पार करता नदी को

किसी ने किया आज इज़्हारे उल्फ़त
कहूँ तो कहूँ क्या मैं इस दिल्लगी को

अरे यार ग़ाफ़िल न लौटेगी फिर क्या
हुआ एक अर्सा गए भी हँसी को

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, जुलाई 09, 2016

रब मुझे बस दूर रक्खे आज के नग़्मात से

ठेस लग जाती है जिनको बस ज़रा सी बात से
कह रहे हैं वे के हम तो लड़ रहे हालात से

हम परीशाँ हैं के ढकने को बदन, कपड़े नहीं
ख़ुश हैं काफी लोग इज़्ज़त के भी इख़्राजात से

आप तो ऐसे न थे मैं भी हूँ इतना जानता
वज़्ह क्या है डर रहे जो आप मा’मूलात से

चाँद को रोटी बताऐं कम नहीं ऐसे भी लोग
यूँ भी बेहतर खेलते रहते हैं वो जज़्बात से

ताल-सुर और भाव-भाषा, बह्र तक ग़ायब हुई
रब मुझे बस दूर रक्खे आज के नग़्मात से

आप तो शाइर हो ग़ाफ़िल जी वग़ैरह कहिए मत
कोफ़्त होती है बहुत, कुछ ऐसे तंज़ीयात से

{इख़्राजात=व्यय, मा’मूलात= मा’मूल (रोज़मर्रा की सामान्य चर्या) का बहुवचन, तंज़ीयात= तंज़ (व्यंग्य) का बहुवचन}

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, जुलाई 07, 2016

जलाना है अगर कुछ तो ग़मे फ़ुर्क़त जला देना

समझ में कुछ नहीं आए मुझे वापस है क्या देना
मिला जो प्यार मुझको उसके बदले में, ...बता देना!

हैं मेरे पास तो धोख़े हज़ारों किस्म के फिर भी
बना है सिलसिला अब तक मेरा लेना तेरा देना

बुझाने के लिए मुद्दत की मेरी तिश्नगी है तो
जलाना है अगर कुछ तो ग़मे फ़ुर्क़त जला देना

निकल आएगी ही सूरत कोई उस तक पहुँचने की
अरे ओ दिलनशीं! ख़ुद के ज़रा दिल का पता देना

किसी ग़ाफ़िल को गरचे इश्क़ फ़र्माए कोई तो क्यूँ
बहुत आसान है आसान यह जुम्ला सुना देना

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, जुलाई 03, 2016

ज़रा सोचता मुस्कुराने से पहले

वो आए किसी भी बहाने से पहले
उसे देखना है ठिकाने से पहले

बताओ भला इश्क़ की भी इजाज़त
अरे यार क्या लूँ ज़माने से पहले

चलाया वो तीरे नज़र और लगा भी
मगर हिचकिचाया चलाने से पहले

मेरी धडकनों के भी बावत सितमगर
ज़रा सोचता मुस्कुराने से पहले

कहाँ हौसला था उठाने का परबत
हसीनों के नख़रे उठाने से पहले

ज़रा झाँकना आईने में भी ग़ाफ़िल
मुझे इश्क़ में आज़माने से पहले

-‘ग़ाफ़िल’