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रविवार, अक्तूबर 30, 2016

शुभ दीवाली

आओ अपने अंतस का तम दूर भगाएं
मृत्युस्पर्द्धी सोई मनुता पुनः जगाएं
अधिक नहीं इस तरह से दीपक एक जलाकर
यारों क्यों न अबकी दीपावली मनाएं

सपरिवार आप सभी को दीवाली की अनन्त हार्दिक शुभकामनाएँ

-‘ग़ाफ़िल’



बुधवार, अक्तूबर 26, 2016

क्यूँ नहीं दिल पर मेरे डाका पड़ा

इश्क़ तो यारो मुझे मँहगा पड़ा
वक़्ते वस्लत मैं जो पीकर था पड़ा

देख उसको, क्या हुआ इक चश्म ख़म
क्या कहें किस दर्ज़े का चाटा पड़ा

भूत का मैंने लिया जैसे ही नाम
वह मुआ सूरत में उसकी आ पड़ा

कोई बावर्ची नहीं थे जबके वे
नाम फिर भी मुल्ला दो प्याज़ा पड़ा

था परीशाँ रूसियों से इसलिए
सर जो मुड़वाया तभी ओला पड़ा

चाहता ग़ाफ़िल हूँ शिद्दत से तो, पर
क्यूँ नहीं दिल पर मेरे डाका पड़ा

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, अक्तूबर 22, 2016

हुस्न के शह्र में आ गए हो मियाँ

आ रहीं यूँ जो बेताब सी आँधियाँ
शर्तिया है निशाना मेरा आशियाँ

मैंने देखा है झुरमुट में इक साँप है
और हैं बेख़बर सारी मुर्गाबियाँ

मान लूँ क्या के अब दस्तो पा थक चुके
ग़ुम हुईं जो तेरी यार नादानियाँ

भूल जाओगे अब दीनो ईमान सब
हुस्न के शह्र में आ गए हो मियाँ

ज़ीनते ज़िन्दगानी है इतनी ही तो
तेरा करना मुआफ़ और मेरी ग़ल्तियाँ

बाकमाल ऐसी फ़ित्रत को क्या नाम दूँ
प्यार कुत्ते को इंसान को गालियाँ

यार ग़ाफ़िल ज़ुरूरी मुहब्बत है जूँ
क्या ज़ुरूरी हैं वैसे ही रुस्वाइयाँ?

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, अक्तूबर 21, 2016

गया जो देखकर इक बार चारागर, नहीं लौटा

किसी दिल के दरीचे से कोई जाकर नहीं लौटा
जूँ निकला अश्क राहे चश्म से बाहर, नहीं लौटा

वो क़ासिद, जो भी मेरा ख़त गया लेकर तेरी जानिब
न कोई बात है तो यार! क्यूँ अक्सर नहीं लौटा

मेरा दिल चंद पल तफ़रीह को तुझ तक गया था पर
न जाने क्यूँ वो आवारा अभी तक घर नहीं लौटा

बड़ी है तीरगी ठहरो मशाले जज़्बा ले आऊँ
यही कहकर गया लेकिन मेरा रहबर नहीं लौटा

बड़ी नाज़ुक है शायद मुझ मरीज़े इश्क़ की हालत
गया जो देखकर इक बार चारागर, नहीं लौटा

नहीं वाज़िब है अपने दिल पे भी करना यक़ीं ग़ाफ़िल
करोगे क्या बताकर ही गया पर गर नहीं लौटा

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, अक्तूबर 20, 2016

एक अदना दिल तो था लेकिन मुझे टूटा लगा

अब वही बेहतर बताएगा के उसको क्या लगा
इश्क़ में नुक़्सान मेरा पर मुझे अच्छा लगा

यूँ शिकन आई जबीं पर उसके, मुझको देखकर
वह मुझे फ़िलवक़्त मेरे दर्द का हिस्सा लगा

मैं उसे देता भी क्या था सामने मेरे सवाल
एक अदना दिल तो था लेकिन मुझे टूटा लगा

ख़ुश्बू-ए-बादे सबा क्यूँ जानी पहचानी है आज
सोचता मैं यह, के वह मेरे गले से आ लगा

आस्माँ के चाँद की मेरी तलब जाती रही
क्या कहूँ मैं रू किसी का चाँद के जैसा लगा

इल्म भी है क्या किसी को यह, के इस ग़ाफ़िल का भी
ज़ीनते महफ़िल की ख़ातिर, जोर जो भी था, लगा

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, अक्तूबर 18, 2016

भला क्यूँ लोग ऐसे बोलते हैं

हैं उनके होंठ चुप, वे बोलते हैं
न यह पूछो के कैसे बोलते हैं

नहीं सुन पाओगे तुम देख तो लो
इशारे किस तरह से बोलते हैं

मुहब्बत शै बुरी है बाज़ आओ
यूँ हर उल्फ़त के मारे बोलते हैं

विसाले शब, सुना है तुमने भी क्या
हो ख़ामोशी तो शिक़्वे बोलते हैं

जगाने के सबब लोगों को यारो!
कहाँ अब सुब्ह मुर्गे बोलते हैं

मिले उनको भी हाँ कहने का मौक़ा
नहीं ही जो बेचारे बोलते हैं

तू ग़ाफ़िल था, है, आगे भी रहेगा
भला क्यूँ लोग ऐसे बोलते हैं

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, अक्तूबर 16, 2016

इश्क़ में भी था नशा क्या, दोस्तो!

है मेरा जो हाल ख़स्ता दोस्तो!
इश्क़ मैंने भी किया था दोस्तो!!

आज मेरे इश्क़ का हर एक राज़
सामने सबके खुलेगा दोस्तो!

लड़खड़ाते थे मेरे पा बिन पिए
इश्क़ में भी था नशा क्या, दोस्तो!

क्या जला, क्या रह गया, कैसे कहे
आतिशे उल्फ़त में डूबा, दोस्तो!

अब दिखा तूफ़ान बह्रे इश्क़ का
आ चुका तो था कभी का दोस्तो!

ज़ीस्त उसकी है जो कुछ सोचे बग़ैर
इश्क़ में डूबा सरापा दोस्तो!

देखिएगा लोग बोलेंगे ज़ुरूर
यह के ग़ाफ़िल याद आया दोस्तो!

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, अक्तूबर 13, 2016

जी मैंने अपना पुख़्ता कराया नहीं कभी

गो सर पे मेरे कोई था साया नहीं कभी
यह शम्स फिर भी मुझको सताया नहीं कभी

मेरा भी हक़ है तेरी इनायत पे ऐ ख़ुदा
पीता हूँ क्या इसीलिए पाया नहीं कभी

मालूम है के है ये गुनाहे अज़ीम, जो
बज़्मे क़दह में तुझको बुलाया नहीं कभी

ताउम्र हूँ मनाया मुहर्रम ही यार पर
भूले से भी वो गीत मैं गाया नहीं कभी

दुनिया फ़रेबियों से भरी है, तू कह रहा
पर तूने ख़ुद का नाम गिनाया नहीं कभी

उस ज़ख़्म का हो गर तो भला कैसे हो इलाज़
टीसे तो, पर जो होता नुमाया नहीं कभी

आतिशजनों को हो न परेशानी इस सबब
जी मैंने अपना पुख़्ता कराया नहीं कभी

दिल तोड़ना बस एक ही झटके में, जाने क्यूँ
ग़ाफ़िल को तूने यार सिखाया नहीं कभी

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, अक्तूबर 10, 2016

कभी था जो अपना पराया हुआ है

बताए न किसका सताया हुआ है
मेरा दिल मगर चोट खाया हुआ है

यक़ीनन मुहब्बत का मारा है ये दिल
तभी चुप है बेहद लजाया हुआ है

उछलता फिरे है मेरा दिल ख़ुशी से
के उल्फ़त में ख़ुद को लुटाया हुआ है

ये दिल है के आवारा मौसम है कोई
कभी था जो अपना पराया हुआ है

दिलों को जो है जोड़ सकता वो नग़मा
भुलाया हुआ था भुलाया हुआ है

तेरे पास ग़ाफ़िल गो दिल है मेरा पर
कहूँ कैसे तेरा चुराया हुआ है

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, अक्तूबर 08, 2016

मैं ख़ुश्बू हूँ बिखरना चाहता हूँ

तू जाने है के मरना चाहता हूँ?
मैं ख़ुश्बू हूँ बिखरना चाहता हूँ।।

अगर है इश्क़ आतिश से गुज़रना,
तो आतिश से गुज़रना चाहता हूँ।

सही जाए न ताबानी-ए-रुख़, पर
तेरा दीदार करना चाहता हूँ।

सरो सामान और अपना आईना दे!
मैं भी बनना सँवरना चाहता हूँ।

शराबे लब से मुँह मोड़ूं तो कैसे?
कहाँ पीना वगरना चाहता हूँ?

ऐ ग़ाफ़िल तेरा जादू बोले सर चढ़,
तेरे दिल में उतरना चाहता हूँ।।

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, अक्तूबर 05, 2016

मुझे क्यूँ तीरगी में रौशनी मालूम होती है

चले तू जब तो बलखाती नदी मालूम होती है
मुझे फिर जाने जाँ क्यूँ तिश्नगी मालूम होती है

तू मेरे सिम्त जब भी आ रही मालूम होती है
मेरे ज़ेह्नो जिगर में गुदगुदी मालूम होती है

है अंदाज़े बयाँ तेरा के है दीवानगी अपनी
तेरी झूठी कहानी भी सही मालूम होती है

चलो अच्छा हुआ मैंने नहीं जो इश्क़ फ़र्माया
कई फ़र्माए और इज़्ज़त गयी, मालूम होती है

जवाँ होने लगी शायद मेरी उल्फ़त मेरे जैसी
तेरी हर इक अदा अब क़ीमती मालूम होती है

हूँ शायद मैं नशे में या तेरे आने की है आहट
मुझे क्यूँ तीरगी में रौशनी मालूम होती है

न जाने हो गया है क्या सदी की नाज़नीनों को
के चुन्नी भी गले की, दार सी मालूम होती है

है सच भी या के है धोखा फ़क़त, मेरी नज़र का जो
तू मुझसे आजकल रूठी हुई मालूम होती है

मैं ग़ाफ़िल था, हूँ, आगे भी रहूँगा और क्या क्या क्या
मेरे बाबत ये सब, तेरी कही मालूम होती है

(दार=फाँसी)

-‘ग़ाफ़िल’