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सोमवार, अप्रैल 24, 2017

सोचता हूँ के अगर जाऊँगा तो क्या लेकर

होते फिर शे’र मेरे क़ाफ़िया क्या क्या लेकर
बात बन जाती लुगत का जो सहारा लेकर

लिख दिया मैंने अभी एक अजूबा सी हज़ल
कह दो तो पढ़ दूँ यहाँ नाम ख़ुदा का लेकर

एक क़त्आ-

वैसे तो जी में मेरे आप अब आने से रहे
और मालूम है आएँगे भी तो क्या लेकर
फिर भी आ जाइए है रात गुज़रने वाली
वास्ते मेरे भले दर्द का गट्ठा लेकर

और तमाम अश्आर-

जैसे अरमानों का बाज़ार हुआ जी अपना
औ ख़रीदार खड़े ढेर सा पैसा लेकर

सोचता हूँ के मेरी भूख की शिद्दत में कभी
काश आ जाए कोई लिट्टी-ओ-चोखा लेकर

क्या था रंगीन सफ़र जाम भी टकराया था
वैसे निकला था मैं बस थोड़ा सा भूजा लेकर

होने ही चाहिए अश्आर हमेशा हल्के
ताके जाना न पड़े झाड़ में लोटा लेकर

कोई तारीफ़ नहीं कोई मलामत भी नहीं
सोचता हूँ के अगर जाऊँगा तो क्या लेकर

आईना ठीक ही कहता है के आ जाते हो क्यूँ
आप ग़ाफ़िल जी वही चेहरा बना सा लेकर

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, अप्रैल 14, 2017

ज़रा अब देख तो ले है बचा क्या

तुझे चाहा, है हिज़्र इसकी सज़ा क्या
बता मेरी ख़ता है और क्या क्या

दहकती आग सी आँखों में तेरी
कोई अब भी तो डूबा है, जला क्या

ज़माना हो गया आतिश उगलते
ज़रा अब देख तो ले है बचा क्या

शरारा जो छुपाया था तू जी में
सवाल अब है के शोला बन उठा क्या

मेरे ख़त का था गो मज़्मून वाज़िब
नहीं मालूम है तूने पढ़ा क्या

कभी भी तो न अपने सिलसिले थे
बहारों से अब अपना सिलसिला क्या

अरे ग़ाफ़िल तू क्या क्या बक रहा है
तेरा अब होश भी जाता रहा क्या

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, अप्रैल 13, 2017

शिक़्वा नहीं हमें है ज़रा भी गुलाब से

क्या बुझ सकी है प्यास किसी की शराब से
पाएगा कोई फ़ैज़ भी क्या मह्वेख़्वाब से

चुग़ली सी कर रहा है हमारे रक़ीब की
इक झाँकता गुलाब तुम्हारी किताब से

है रंज़ बस यही के हमारा नहीं है यह
शिक़्वा नहीं हमें है ज़रा भी गुलाब से

हर सू से ख़ुद ही आती है वर्ना हमारा क्या
है राबिता किसी की भी बू-ए-शबाब से

ग़ाफ़िल किसी को इसका भी क्या इल्म है ज़रा
मिलता मक़ाम कौन सा है इज़्तिराब से

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, अप्रैल 11, 2017

पाँव को मैं पाँव सर को सर लिखूँगा

और कितना चश्म को ख़ंजर लिखूँगा
अब न यूँ कुछ ऐ मेरे दिलवर लिखूँगा

बोझ गो सारे बदन का ढो रहा है
पाँव को पर सर भला क्यूँकर लिखूँगा

सच बयानी रास आए या न आए
पाँव को मैं पाँव सर को सर लिखूँगा

और कुछ लिक्खूँ न फिर भी कुछ न कुछ तो
मैैं तेरी वादाख़िलाफ़ी पर लिखूँगा

कर न पाया तू ग़मे दिल को रफ़ा तो
जाँसिताँ तुझको भी चारागर लिखूँगा

मानता हूँ मैं मुसन्निफ़ हूँ नहीं पर
जब लिखूँगा और से बेहतर लिखूँगा

हूँ मगर इतना भी मैं ग़ाफ़िल नहीं हूँ
ख़ुद की जो आवारगी अक़्सर लिखूँगा

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, अप्रैल 10, 2017

सच्ची रह पकड़ा सकता है

जी उस पर ही आ सकता है
दिल जो शख़्स गंवा सकता है

बेपरवा सा हुस्न इश्क़ को
बेमतलब तड़पा सकता है

देख के तेरे लब पे तबस्सुम
मेरा ग़ुस्सा जा सकता है

इंसाँ बस मजनू हो जाए
कंकड़ पत्थर खा सकता है

तेरी पेशानी का पसीना
मेरा हसब बता सकता है

जान भी पाया कौन इश्क़ में
क्या खोकर क्या पा सकता है

अब आलिम रब ही ग़ाफ़िल को
सच्ची रह पकड़ा सकता है

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, अप्रैल 07, 2017

आईना रंग क्यूँ बदलता है

मान लेना न यह के पक्का है
आदमी आदमी का रिश्ता है

यूँ तो लाखों गिले हैं ज़ेरे जिगर
कौन तेरा है कौन मेरा है

इश्क़ की क्या नहीं है ये तौहीन
दिल सुलगता है और तड़पता है

पुख़्ता हूँ ख़ूब ज़िस्मो जान से मैं
हादिसों से जो मेरा नाता है

न डरेगा भी तो डराएगी
कुछ इसी ही सिफ़त की दुनिया है

देख रुख़ पर मेरे है दाग़ तो क्या
चाँद भी वाक़ई कुछ ऐसा है

गोया होता हूँ मैं वही ग़ाफ़िल
आईना रंग क्यूँ बदलता है

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, अप्रैल 06, 2017

बोलिए क्या शे’र मेरा भी हुआ

रूबरू होने पे क्यूँ ऐसा लगा
है मिजाज़े आईना बिगड़ा हुआ

आईना करता नहीं गोया गिला
सामने उसके मगर अच्छे से आ

टूटने का दौर है मौला ये क्या
लग रहा जो हर बशर टूटा हुआ

था नहीं इसका गुमाँ मुझको ज़रा
मेरा ही दिल एक दिन देगा दगा

चल रहा था वस्ल का ज्यूँ सिलसिला
एक दिन होना ही होना था ज़ुदा

था शरारा इश्क़ का ज़ेरे जिगर
वो ही शायद आज बन शोला उठा

फिर नये पत्ते निकल आएँगे ही
फिर बहार आएगी इतना है पता

मेरी आसानी परेशानी न पूछ
चल रहा मौसम अभी तक हिज़्र का

होंगे आशिक़ और तेरे, शह्र में
पर नहीं होगा कोई मुझसा फ़िदा

हुस्न को परवा नहीं जब है मेरी
हुस्न की परवाह मुझको क्यूँ भला

पी के जो मै लोग शाइर हो गए
मैं भी तो इक घूँट उसको हूँ पिया

रख दिया कुछ हर्फ़ ग़ाफ़िल, बह्र में
बोलिए क्या शे’र मेरा भी हुआ

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, अप्रैल 04, 2017

तेरी जो लत है जी चुराने की

बेबज़ा को बज़ा बताने की
कोशिशें हो रहीं ज़माने की

ज़िन्दगी की फ़क़त है दो उलझन
एक खोने की एक पाने की

पहले आ शब गुज़ार लें मिलकर
बात सोचेंगे फिर बहाने की

मेरा भी जी चुराया होगा तू
तेरी जो लत है जी चुराने की

एक क़त्आ-

ख़ुश्बू-ओ-गुल हैं पहरेदार जहाँ
राह कोई न जाके आने की
ख़ासियत क्या बयाँ करे ग़ाफ़िल
तेरी ज़ुल्फ़ों के क़ैदख़ाने की

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, अप्रैल 03, 2017

हुस्न भी लेकिन शराफ़त से रहे

जिस तरह चाहे कोई जैसे रहे
दरमियाने दिल मगर मेरे रहे

हो चुका है गर ज़माना ग़ैर का
आप भी तो अब कहाँ अपने रहे

ठीक है डंडे जमाओ इश्क़ पर
हुस्न भी लेकिन शराफ़त से रहे

मस्त है अपनी ही धुन में हर कोई
किसको समझाए कोई कैसे रहे

झंड है ग़ाफ़िल जी अपनी ज़िन्दगी
हम न घर के ही न बाहर के रहे

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, अप्रैल 01, 2017

ग़ाफ़िल दिल के बीमारों से क्या लेना

सब्ज़ शजर को अंगारों से क्या लेना
एक बाग़बाँ को आरों से क्या लेना

भौंरे तो गुल का रस लेते हैं उनको
ऐ गुलाब तेरे ख़ारों से क्या लेना

चश्म देख सकते हैं फ़क़त बदन सबके
उनको सबके किरदारों से क्या लेना

लाख बनाता रहे राइफ़ल पिस्टल तू
उल्फ़त में इन हथियारों से क्या लेना

है रसूल देने वाला जब, फिर मुझको
दिल के मुफ़्लिस दरबारों से क्या लेना

हूँ मुरीद तेरा मौला, तू हुक़्म करे
मुझको तेरे हरकारों से क्या लेना

सुह्बत सेहतमंदों की होती अच्छी
ग़ाफ़िल दिल के बीमारों से क्या लेना

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, मार्च 27, 2017

मगर लोगों के हाथों के कहाँ पत्थर बदलते हैं

कभी रस्ता बदलता है कभी रहबर बदलते हैं
पता क्या था यहाँ हर एक पल मंज़र बदलते हैं

बदल जाएँ भी गर हालाते ख़स्तः कुछ ज़माने के
नहीं बुज़दिल ये मानेंगे के हिम्मतवर बदलते हैं

छुपाते फिर रहे मुँह सोचकर गिरगिट यही शायद
के आदमजात उनसे रंग अब बेहतर बदलते हैं

बहुत मुश्किल बदल देना है गो आदत ख़राब अपनी
लगाकर जोर सारा आइए हम पर बदलते हैं

बदल जाते हैं मंजनू के यहाँ सर रोज़ ही कितने
मगर लोगों के हाथों के कहाँ पत्थर बदलते हैं

भला क्या हो सकेगा हुस्नवालों की इस आदत का
के वादे कर तो लेते हैं मगर अक़्सर बदलते हैं

रहे ख़ुशहाल उनकी ज़िन्दगी यह हो नहीं सकता
सरायों की तरह ग़ाफ़िल जो अपना घर बदलते हैं

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, मार्च 25, 2017

लेकिन कोई तो है

तफ़रीह को था आया मगर जाँ पे आ गया
कैसा हसीन ख़्वाब निगाहों को भा गया

बदनाम कर सकूँगा न मैं लेकर उसका नाम
लेकिन कोई तो है जो मेरे जी पे छा गया

कहते बना तो कहके रहूँगा मैं एक दिन
जो भी सितमज़रीफ़ सितम मुझपे ढा गया

मेरा गया है चैनो सुक़ूँ याँ तलक़ के जी
उल्फ़त की रह में उसका बताए के क्या गया

उस चारागर का ज़िक़्र भी करना न जो मुझे
बस इक निग़ाह डालके पागल बना गया

रोका था कौन जाने को दिल के दयार से
ग़ाफ़िल जो जान से ही गया ख़ामख़ा गया

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, मार्च 23, 2017

ज़माने में ऐसा तो होता नहीं है

उसे कैसे समझूँ के बहका नहीं है
जो ख़ुद को है कहता के क्या क्या नहीं है

अरे यार पालिश पे पालिश पे पालिश
लगे है के आशिक़ तू सच्चा नहीं है

है देता क्यूँ ताना न आने का दिल में
तेरा वैसे भी आना जाना नहीं है

किया इश्क़ कैसा जो दावा है करता
के दिल अब तलक तेरा टूटा नहीं है

है गरजा तू बरसेगा भी मान लूुँ पर
ज़माने में ऐसा तो होता नहीं है

तू हो चाँद जिसका भी मेरी बला से
मेरे तो ज़बीं का सितारा नहीं है

ज़ुदा और से इसलिए तू है ग़ाफ़िल
के कू-ए-मुहब्बत में रुस्वा नहीं है

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, मार्च 22, 2017

यह न पूछो के और पीना है?

इस नशेमन का यह सलीका है
कोई आता है कोई जाता है

आदमी छोड़ दे बस अपना ग़ुरूर
देख लेना के फिर वो क्या क्या है

क्या समझ कर हो लादे फिरते जनाब!
यह तो अरमानों का जनाज़ा है

ऐंठे रहते हो आपका भी मिज़ाज
मान लूँ क्या के हुस्न जैसा है

टूटने से बचोगे झुककर ही
आँधियों में शजर से सीखा है

बस पिलाते ही जाओ आँखों से जाम
यह न पूछो के और पीना है?

है जो ग़ाफ़िल दिलों का साथ हुज़ूम
इनको लूटा है या के पाया है

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, मार्च 18, 2017

रब का नहीं तो तेरा ही चेहरा दिखाई दे

बन ठन के तू न यार तमाशा दिखाई दे
मैं चाहता हूँ जैसा है वैसा दिखाई दे

चाहेगा जिस तरह भी दिखाई पड़ूँगा मैं
पर तू कभी कभार ही अच्छा दिखाई दे

मिल पाएगा न ऐसे तो इंसाफ़ मेरे दिल
या जो सितम हुआ है ज़रा सा दिखाई दे

मझधार में ही नाव मेरी कब से है ख़ुदा
अब चाहिए मुझे भी किनारा दिखाई दे

लगता नहीं है फ़र्क़ ज़रा भी मुझे सनम
रब का नहीं तो तेरा ही चेहरा दिखाई दे

अच्छा लगेगा मुझको भी तुझको भी शर्तिया
मेरे वज़ूद का तू जो हिस्सा दिखाई दे

पत्थर उछालना के चला देना तेग़ ही
ग़ाफ़िल जो तेरे कू से गुज़रता दिखाई दे

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, मार्च 16, 2017

यहाँ दिल का भी सौदा हो रहा है

नहीं पूछूँगा ये क्या हो रहा है
यहाँ जो भी तमाशा हो रहा है

मुझे उस होने से है इत्तेफ़ाक़
तेरे जी में जो जैसा हो रहा है

पता कैसे चलेगा यह के मेरा
नहीं तू हो रहा या हो रहा है

रहा जो ग़म का बाइस आज वो ही
सुक़ूने जी का ज़रिया हो रहा है

तेरे इस शह्र में गुर्दा जिगर क्या
यहाँ दिल का भी सौदा हो रहा है

गो है ग़ाफ़िल शराबे चश्म मुझसे
मगर फिर भी नशा सा हो रहा है

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, मार्च 08, 2017

चलो ग़ाफ़िल हम अब अपनी दुआओं का असर ढूँढें

है जी की ज़िद के जिस भी तर्ह उसको ढूँढें पर ढूँढें
मगर क्या आस्माँ अपना हुआ जो हम क़मर ढूँढें

कहीं हम खो चुकें हैं यार दुनियाबी क़वायद में
समझ आए नहीं कुछ ख़ुद को आख़िर कौन दर ढूँढें

मिले जी को सुक़ूँ जिससे फ़रेबों से तिही हो जो
नए अख़बार में आओ कोई ऐसी ख़बर ढूँढें

हुआ ग़ायब है जिनका जी उन्हें मिल जाएगा पक्का
वो अपना जी नहीं ऐ बेवफ़ा तुझको अगर ढूँढें

किसी वीरान सी शब में कभी दिल के दरीचे से
हमें देखी थी जो वह क्यूँ न उल्फ़त की नज़र ढूँढें

किसी भी चीज़ की गोया नहीं चाहत रही अपनी
न जाने क्यूँ है कहता जी के हम तुझको मगर ढूँढें

चला होगा यक़ीनन रह में ही गुम हो गया होगा
चलो ग़ाफ़िल हम अब अपनी दुआओं का असर ढूँढें

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, मार्च 05, 2017

पानी

यह पता था के करेगा ही तमाशा पानी
चश्म से यूँ जो लगातार है बहता पानी

यह भी सच है के रहे बहता अगर तो अच्छा
ज़ह्र हो जाए है इक ठौर ही ठहरा पानी

मेरे जलते हुए जी को क्या तसल्ली देगा
कोई आवारा सी ज़ुल्फ़ों से टपकता पानी

देगा तरज़ीह भी अब कौन भला फिर उसको
शख़्स वह जिसकी भी आँखों का है उतरा पानी

हिज़्र के दिन हों के हो रात मिलन की ग़ाफ़िल
कोई भी हाल हो है चश्म भिगोता पानी

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, मार्च 03, 2017

हम बोलेन तौ मुँह लटकाए बइठे हो

पता है का का पीये खाये बइठे हो
यही बदे का यार लजाए बइठे हो

कहै पियक्कड़ दुनिया तौ फिर ठीक अहै
हम बोलेन तौ मुँह लटकाए बइठे हो

इश्क़ जौ करबो तौ कुछ होइहैं रक़ीब भी
आपन दुसमन आप बनाए बइठे हो

दिल दरिया से किहे किनारा हौ तुम और
आँख से मै कै आस लगाए बइठे हो

अच्छा ख़ासा रहेव बियाहे के पहिले
अब जइसै थप्पड़ जड़वाए बइठे हो

होस मा होतेव प्यार केर बातें होतीं
हमैं देखि कै होस गँवाए बइठे हो

ग़ाफ़िल जी मुस्कानौ तुम्हरी है जइसै
चेहरे पै चेहरा चिपकाए बइठे हो

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, फ़रवरी 28, 2017

दर्द इस तर्ह कुछ तो कम होंगे

आशिक़ों के जो निकले दम होंगे
हुस्न के यूँ भी क्या सितम होंगे

यूँ बढ़ाओगे बात जीतनी ही
बात में उतने पेचो ख़म होंगे

हो चुके बिछते बिछते संगे राह
चश्म ये अब न यार नम होंगे

ख़्वाहिशों कर दिया है तुमको तर्क़
दर्द इस तर्ह कुछ तो कम होंगे

ख़त्म होंगे न अश्क ग़ाफ़िल गर
हाले ख़स्तः भी ख़ाक ग़म होंगे

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, फ़रवरी 27, 2017

तू नहीं होता है तो कौन वहाँ होता है

ढूँढा करता हूँ जहाँ तेरा निशाँ होता है
अब बता तू ही के तू यार कहाँ होता है

तेरे पीछे मैं चला जाता हूँ सहरा सहरा
शब को भी गर तू ख़यालों में अयाँ होता है

गो है तूने ही दिया पर हो तुझे क्यूँ एहसास
हाँ वही दर्द मुझे जितना जहाँ होता है

आह भरते हैं कई नाम तेरा ले लेकर
यह तमाशा भी सरे शाम यहाँ होता है

ख़ुश्बू तेरी सी ही आती है जहाँ से ग़ाफ़िल
तू नहीं होता है तो कौन वहाँ होता है

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, फ़रवरी 22, 2017

दिल है यह मेरा कोई पत्थर नहीं है

पायलों की छमछनननन गर नहीं है
फिर मक़ाँ ऐ दोस्त हरगिज़ घर नहीं है

दर वो जिस पर हो न तेरी बू-ओ-छाप
मैं कहूँगा वह मुक़म्मल दर नहीं है

क्यूँ किए जाता है इस पर दस्तकारी
दिल है यह मेरा कोई पत्थर नहीं है

फाख़्ते तू ले न जाएगा ख़बर तो
और क्या कोई भी नामाबर नहीं है

देख ग़ाफ़िल चश्म की दरियादिली यह
छलछलाता है छलकता पर नहीं है

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, फ़रवरी 18, 2017

साँप आस्तीं के

चलाया तो तीरे नज़र आप ही ने
मगर आपको हम न रुस्वा करेंगे
हैं साँप आस्तीं के भला क्या यहाँ कम
जो अब आप भी रोज़ आया करेंगे

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, फ़रवरी 16, 2017

मैं रहूँ जैसे भी लेकिन शाद यह कुनबा रहे

है ज़ुरूरी वाक़ई तो फ़ासिलः ऐसा रहे
तू कहीं भी हो तसव्वुर में मगर आता रहे

कोई बेहतर कर भी क्या सकता है बस इसके सिवा
दिल भले रोता रहे फिर भी वो मुस्काता रहे

तू भले माने न लेकिन जीते जी मर जाएगा
बोझ तेरी बेरुख़ी का कोई गर ढोता रहे

या ख़ुदा मेरी दुआ में इतना तो कर दे असर
मैं रहूँ जैसे भी लेकिन शाद यह कुनबा रहे

इल्म इतना भी नहीं ग़ाफ़िल शराबे चश्म को
जो नहीं लाइक़ हैं उसके स्वाद वे ही पा रहे

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, फ़रवरी 08, 2017

कहाँ मैं थोक हूँ मैं भी तो यार खुदरा हूँ

मुझे निहार ले किस्मत सँवार सकता हूँ
भले ही टूट के गिरता हुआ मैं तारा हूँ

नहीं ये मील के पत्थर मुझे सँभाले कभी
पता था गो के इन्हें रास्ते से भटका हूँ

सिसक रहा है कोई मुस्कुरा रहा है कोई
न मुस्कुरा ही सका मैं न सिसक पाया हूँ

मेरी भी हो न हो बढ़ जाए कोई शब क़ीमत
कहाँ मैं थोक हूँ मैं भी तो यार खुदरा हूँ

ख़बर सुनी तो सही तूने ज़माने से भले
यही के इश्क़ में तेरे मैं कैसे रुस्वा हूँ

जो मुझसे आज मुख़ातिब है यह भी कम है कहाँ
भले ही कहता रहे तू के मैं पराया हूँ

न चुभ सके है चुभाए भी ख़ार ग़ाफ़िल अब
मैं इतने ख़ार भरे रास्तों से गुज़रा हूँ

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, फ़रवरी 07, 2017

आह! यह क्या से क्या हो गया

बावफ़ा बेवफ़ा हो गया
आह! यह क्या से क्या हो गया

उनसे आँखे मिलीं मेरा जी
ख़ूब था बावरा हो गया

एक क़त्आ-
आप तक़्दीर के हैं धनी
हिज़्र में भी नफ़ा हो गया
हिज़्र में इखि़्तयार आप पर
देखिए आपका हो गया

यार ग़ाफ़िल यहाँ हर कोई
क्यूँ भला सरफिरा हो गया

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, फ़रवरी 06, 2017

साक़ी इधर भी ला न ज़रा और ढाल कर

मैं लुट चुका हूँ वैसे भी अब तू न चाल कर
जैसा भी मेरा दिल है उसे रख सँभाल कर

साहिल पे अब है डूब रही ऐ मेरे ख़ुदा
तूफ़ान से जो नाव था लाया निकाल कर

अब संगो ख़ार से ही रहे इश्क़ है अटी
रक्खे कोई क़दम तो ज़रा देख भाल कर

थोड़ी सी ही तो मै थी जिसे पी चुका हूँ अब
साक़ी इधर भी ला न ज़रा और ढाल कर

ग़ाफ़िल हैं जोड़ तोड़ रवायात इश्क़ की
मेरे नहीं तो ख़ुद के ही जी का ख़याल कर

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, फ़रवरी 04, 2017

सो मिल गया है आज मुझे दार, क्या करूँ?

हूँ जामे चश्म तेरा तलबगार, क्या करूँ?
तक़्दीर से पै आज हूँ लाचार, क्या करूँ?

कोई तो आह! शौक से मारा नज़र का तीर
जी चाहे गो के फिर भी पलटवार क्या करूँ?

तू देख गर तो जी मैं तुझे कबका दे चुका
वैसे भी और बोल मेरे यार, क्या करूँ?

माना के एक बार किया था गुनाहे इश्क़
यारो वही गुनाह मैं हर बार क्या करूँ?

ग़ाफ़िल हूँ मैं इसीलिए शायद क़फ़स था कम
सो मिल गया है आज मुझे दार, क्या करूँ?

(क़फ़स=पिंजड़ा, दार=फाँसी)

-‘ग़ाफ़िल’
(चित्र गूगल से साभार)

शुक्रवार, फ़रवरी 03, 2017

कोई ग़ाफ़िल कहाँ भला जाए

जी मेरा भी सुक़ून पा जाए
तेरा जी भी जो मुझपे आ जाए

काश आ जाऊँ तेरे दर पे मैं और
वाँ मेरा गाम लड़खड़ा जाए

जाने से तेरे जाए जी मेरा
सोचता हूँ के तेरा क्या जाए

मैं कहूँगा के मैं कहूँगा भी क्या
मुझसे कहने को गर कहा जाए

क्या करेगा तू उसका मोलो फ़रोख़्त
जो दिखे भर के जी पे छा जाए

न तआरूफ़ ठहरा तुझसे भी तो
कोई ग़ाफ़िल कहाँ भला जाए

(गाम=क़दम, तआरूफ़=परिचय)

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, जनवरी 30, 2017

हाए!

थोड़ी अलसाई दोपहरी
कुछ नीली कुछ पीली गहरी
मुझको अपने पास बुलाए
कुछ भी समझ न आए, हाए!

लता विटप सी लिपटी तन पर
अधरों को धरि मम अधरन पर
कामिनि जिमि नहिं तनिक लजाए
कुछ भी समझ न आए, हाए!

अधर सुधा यहि भाँति पान करि
विलग हुई संध्यानुमान करि
तृप्ता मन्द मन्द मुस्काए
कुछ भी समझ न आए, हाए!

-‘ग़ाफ़िल’

अगर आ गया, बड़बड़ाता रहेगा

न भुन पाए फिर भी भुनाता रहेगा
तू अपना हुनर आजमाता रहेगा

बड़ा खब्बू टाइप का है यार तू तो
क्या भेजा मेरा यूँ ही खाता रहेगा

बताएगा भी अब के तुझको हुआ क्या
मुहर्रम के या गीत गाता रहेगा

फिसड्डे क्या अपनी फिसड्डी सी रातें
जलाकर जिगर जगमगाता रहेगा?

ये ग़ाफ़िल है कोई इसे रोको वर्ना
अगर आ गया, बड़बड़ाता रहेगा

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, जनवरी 25, 2017

लज़्ज़त और बढ़ती है

तुम्हारे साथ होने भर से ताक़त और बढ़ती है
मेरी तो मेरी बर्बादी पे हिम्मत और बढ़ती है

भले तुम बेअदब कहते रहो फिर भी मगर अपनी
तुम्हारे मुस्कुरा देने से ज़ुर्रत और बढ़ती है

है सच तो यह के है क़ीमत गुलों की चंद कौड़ी ही
किसी के गेसुओं से जुड़ के क़ीमत और बढ़ती है

हसीं साक़ी शराबे लब न जाने और क्या क्या क्या
पता गो है के ऐसी लत से ज़ेह्मत और बढ़ती है

नहीं इंसाफ़ है यह भी के कर लो हुस्न पोशीदः
न हो गर पर्दादारी भी तो ज़िल्लत और बढ़ती है

निवालों की ये ख़ूबी आज़मा लेना कभी ग़ाफ़िल
के कुछ फ़ाक़े हों गर पहले तो लज़्ज़त और बढ़ती है

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, जनवरी 23, 2017

शनिवार, जनवरी 21, 2017

मिस्ले नाली नदी हो गई

क्या कहूँ दिल्लगी हो गई
मेरी शब और की हो गई

जाएगी किस तरफ़ क्या पता
ज़िन्दगी सिरफिरी हो गई

क्या करोगे भला दोस्त जब
बात ही लिजलिजी हो गई

वक़्त का ही करिश्मा है जो
मिस्ले नाली नदी हो गई

ये ले ग़ाफिल तेरी भी ग़ज़ल
कुछ जली, कुछ बुझी, हो गई

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, जनवरी 17, 2017

कल सताएगा मगर, लगता है

कोई सीने से अगर लगता है
जी क्यूँ फिर सीना बदर लगता है

तूने तो की थी दुआ फिर भी मगर
ओखली में ही ये सर लगता है

पास आ जा के हरारत हो ज़रा
सर्द सी रात है डर लगता है

अपने इस तीरे नज़र पर फ़िलहाल
तू लगाया है ज़हर, लगता है

लाख कोशिश पे सुधर पाया न मैं
मुझपे तेरा ही असर लगता है

रोज़ अख़बारों में आ जाने से
अब तू मुरझाई ख़बर लगता है

आज ग़ाफ़िल से ख़फ़ा है तू सही
कल सताएगा मगर, लगता है

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, जनवरी 15, 2017

सब

निकल पाएगा दस्तो पा भला कैसे फँसा है सब
मुझे यह इश्क़ो चाहत क़ैद जैसा लग रहा है सब

कभी बह्रे मुहब्बत में अगर डूबे तो बोलोगे
के जो डूबा कहीं पर भी उसी को ही मिला है सब

किसी से इश्क़ हो जाना फिरा करना जूँ मजनू फिर
ये दैवी आपदा सा है कहाँ अपना किया है सब

छुपे रहते हो बेजा तुम नहीं तुमको पता शायद
के है अल्लाह और उसको ज़माने का पता है सब

रहा कुछ मेरा कुछ तेरा क़ुसूर उल्फ़त निबाही में
नहीं दावे से कह सकता है ग़ाफ़िल एक का है सब

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, जनवरी 14, 2017

चाँद के भी पार होना चाहिए

ठीक है व्यापार होना चाहिए
फिर भी लेकिन प्यार होना चाहिए

मुझको आने को बतौरे चारागर
कोई तो बीमार होना चाहिए

आप हों या मैं मगर इस बाग़ का
एक पहरेदार होना चाहिए

दरमियाने दिल है तो फ़िलवक़्त ही
प्यार का इज़हार होना चाहिए

शर्म तो आती है फिर भी एक बार
चश्म तो दो चार होना चाहिए

हम न मिल पाएँ भले पर जी में रब्त
दोस्त आख़िरकार होना चाहिए

अब तो ग़ाफ़िल हौसिले का अपने रुख़
चाँद के भी पार होना चाहिए

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, जनवरी 11, 2017

आतिशे उल्फ़त को हर कोई हवा देने लगे

बोसा-ओ-गुल फोन पर अब रोज़हा देने लगे
हाए यूँ उश्शाक़ माशूकः को क्या देने लगे

ख़ैर जब जब मैं रक़ीबों की मनाया मुझको तब
गालियाँ वे सह्न पर मेरे ही आ देने लगे

आशियाँ दिल का मेरे बच पाएगा किस तर्ह गर
आतिशे उल्फ़त को हर कोई हवा देने लगे

जाने जाँ तेरे क़सीदे में हुए जो भी अश्आर
मिलके सब ग़ज़ले मुक़म्मल का मज़ा देने लगे

ढूँढने ग़ाफ़िल को अपने था चला पर मुझको सब
कैसी चालाकी से मेरा ही पता देने लगे

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, जनवरी 10, 2017

नज़र अपना निशाना जानती है : दो क़त्आ

1.
जो अपना सब गँवाना जानता है
वो अपना हक़ भी पाना जानता है
फँसाओगे उसे क्या जाल में तुम
जो हर इक ताना बाना जानता है
2.
किसी पे क़ह्र ढाना जानती है
तो महफ़िल भी सजाना जानती है
न बातों से इसे तुम बर्गलाओ
नज़र अपना निशाना जानती है

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, जनवरी 06, 2017

सजाकर जो पलक पर आँसुओं का हार रखता है

कहोगे क्या उसे जो तिफ़्ल ख़िदमतगार रखता है
औ तुर्रा यह के दूकाँ में सरे बाज़ार रखता है

कहा जाता है वह गद्दार इस दुनिया-ए-फ़ानी में
जो रहता है इधर औ जी समुन्दर पार रखता है

वो सपने टूट जाते हैं, जो पाक़ीज़ः नहीं होते
और उनको देखने का जज़्बा भी गद्दार रखता है

पता है तू न आएगा न जाने क्यूँ मगर फिर भी
उमीद आने की तेरे यह तेरा बीमार रखता है

उसे अदना समझने की न ग़ाफ़िल भूल कर देना
सजाकर जो पलक पर आँसुओं का हार रखता है

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, जनवरी 05, 2017

चाँद सह्न पर आया होगा

होगी आग के दर्या होगा
देखो आगे क्या क्या होगा

ख़ून रगों में लगा उछलने
चाँद सह्न पर आया होगा

रस्म हुई हाइल गो फिर भी
मुझको वह ख़त लिखता होगा

मुझे पता था शम्स उगेगा
फिर से और उजाला होगा

जो टुकड़ों में आप बँटा हो
क्या तेरा क्या मेरा होगा

जो भी तर्क़ करेगा मुझको
बिल्कुल तेरे जैसा होगा

छोड़ गया था मुझे मगर अब
तू पत्ते सा उड़ता होगा

सोचा नहीं था ज़ीस्त में अपने
उल्फ़त जैसा धोखा होगा

ग़ाफ़िल तो रहता है सबमें
तू बस ख़ुद में रहता होगा

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, जनवरी 04, 2017

उल्फत की रह में आग का दर्या ज़ुरूर है

फिर भी नहीं है शम्स, उजाला ज़ुरूर है
देखे न देखे कोई, तमाशा ज़ुरूर है

ये गुल बग़ैर ख़ुश्बू के ही खिल रहे जो अब
इनका भी ज़र से हो न हो रिश्ता ज़ुरूर है

तुझसे भी नाज़ लेकिन उठाया नहीं गया
बज़्मे तरब में आज तू आया ज़ुरूर है

मत पूछ यह के जी है भटकता कहाँ कहाँ
गो मेरा जिस्म उसका घरौंदा ज़ुरूर है

हासिल करूँगा फिर भी किसी तर्ह मैं मुक़ाम
उल्फत की रह में आग का दर्या ज़ुरूर है

है आख़िरी उड़ान यही सोच और उड़
मंज़िल जो तुझको अबके ही पाना ज़ुरूर है

ग़ाफ़िल न मिल सका है अभी तक मुझे सुक़ून
कहते हैं तेरे दर पे ये मिलता ज़ुरूर है

-‘ग़ाफ़िल’


सोमवार, जनवरी 02, 2017

किस सिफ़त का ऐ मेरे मौला तेरा इजलास है

इस शबे फ़ुर्क़त में तारीकी तो अपने पास है
क्यूँ हुआ ग़ाफ़िल उदास इक यूँ भी अपना ख़ास है

दूर रह सकती है कोई जान कब तक जिस्म से
जान होने का उसे गर वाक़ई एहसास है

प्यास की शिद्दत मेरी पूछो न मुझसे दोस्तो!
बह्र से तफ़्तीश कर लो उसकी कैसी प्यास है

क़त्ल भी मेरा हुआ इल्ज़ाम भी है मेरे सर
किस सिफ़त का ऐ मेरे मौला तेरा इजलास है

मेरी भी हाँ तेरी भी हाँ जब है तो मेरे सनम
फ़ासिला जो दरमियाँ है क्या फ़क़त बकवास है

-‘ग़ाफ़िल’