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मंगलवार, जनवरी 17, 2017

कल सताएगा मगर, लगता है

कोई सीने से अगर लगता है
जी क्यूँ फिर सीना बदर लगता है

तूने तो की थी दुआ फिर भी मगर
ओखली में ही ये सर लगता है

पास आ जा के हरारत हो ज़रा
सर्द सी रात है डर लगता है

अपने इस तीरे नज़र पर फ़िलहाल
तू लगाया है ज़हर, लगता है

लाख कोशिश पे सुधर पाया न मैं
मुझपे तेरा ही असर लगता है

रोज़ अख़बारों में आ जाने से
अब तू मुरझाई ख़बर लगता है

आज ग़ाफ़िल से ख़फ़ा है तू सही
कल सताएगा मगर, लगता है

-‘ग़ाफ़िल’

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