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बुधवार, मार्च 08, 2017

चलो ग़ाफ़िल हम अब अपनी दुआओं का असर ढूँढें

है जी की ज़िद के जिस भी तर्ह उसको ढूँढें पर ढूँढें
मगर क्या आस्माँ अपना हुआ जो हम क़मर ढूँढें

कहीं हम खो चुकें हैं यार दुनियाबी क़वायद में
समझ आए नहीं कुछ ख़ुद को आख़िर कौन दर ढूँढें

मिले जी को सुक़ूँ जिससे फ़रेबों से तिही हो जो
नए अख़बार में आओ कोई ऐसी ख़बर ढूँढें

हुआ ग़ायब है जिनका जी उन्हें मिल जाएगा पक्का
वो अपना जी नहीं ऐ बेवफ़ा तुझको अगर ढूँढें

किसी वीरान सी शब में कभी दिल के दरीचे से
हमें देखी थी जो वह क्यूँ न उल्फ़त की नज़र ढूँढें

किसी भी चीज़ की गोया नहीं चाहत रही अपनी
न जाने क्यूँ है कहता जी के हम तुझको मगर ढूँढें

चला होगा यक़ीनन रह में ही गुम हो गया होगा
चलो ग़ाफ़िल हम अब अपनी दुआओं का असर ढूँढें

-‘ग़ाफ़िल’

1 टिप्पणी:

  1. चला होगा यकीनन राह में ही गुम हो गया होगा
    चलो ग़ाफ़िल हम अब अपनी दुआओं का असर ढूँढें !

    वाह ! सुभानल्लाह !

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