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मंगलवार, मई 23, 2017

तू बता तेरा था जो तूने भी क्या जी भर दिया

क्या है रब यह तूने उसके हाथ में ख़ंजर दिया
और मेरे सीने को पत्थर सरीखा कर दिया

तू बता पहले ही कैसे मैं भला देता जवाब
तेरा ख़त बस आज ही तो मुझको नामाबर दिया

कोई तो लौटा दे थोड़ा वक़्त वह मैंने जिसे
जब ज़ुरूरत थी पड़ी तो लोगों को अक़्सर दिया

हो पता तुझको न लेकिन टूटता है यूँ भी जी
जो रटे है यह के मैंने जो दिया बेह्तर दिया

जो भी था मेरा उसे ग़ाफ़िल लुटाया शौक से
तू बता था तेरा जो तूने भी क्या जी भर दिया

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, मई 20, 2017

जी फिर भी प्यासा रहता है

आँखों में दर्या रहता है
जी फिर भी प्यासा रहता है

जब तू नहीं रहता है जी में
जाने फिर क्या क्या रहता है

तू क्या जाने मुझे नशा तो
तेरी उल्फ़त का रहता है

मेरी आँखों में झाँके तो
तू ही, देखेगा, रहता है

गिरगिट रंग बदल ले कितना
साँपों का चारा रहता है

साँप नेवले के खेले सा
जग सारा चलता रहता है

मैं ग़ाफ़िल हूँ लेकिन तू तो
राेज़ो शब सोया रहता है

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, मई 18, 2017

मेरी है आज तो कल तेरी भी बारी होगी

अपने गेसू की तरह तूने सँवारी होगी
तेरी ही मिस्ल तेरी बात भी न्यारी होगी

है पता बज़्म में तेरी जो चली मेरी ज़ुबाँ
फिर तो गर्दन पे मेरी चल रही आरी होगी

वक़्त अब मांग रहा आदमी होने का सुबूत
मेरी है आज तो कल तेरी भी बारी होगी

वैसे तो हिज़्र की ही रात थी दोनों की मगर
ख़ाक तू मेरी तरह रात गुज़ारी होगी

तू सताया ही नहीं मुझको कभी भी ग़ाफ़िल
तेरी यह बात मेरी ज़ीस्त पे भारी होगी

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, मई 12, 2017

मुझको ग़ैरों के लिए छोड़ के जाने वाले

आह आए ही नहीं जी को जलाने वाले
औ तमाशा भी सभी देखने आने वाले

मुझको जब आने लगा उनके सताने में मज़ा
क्यूँ तभी रूठ गए लोग सताने वाले

वैसे तैयार था नीलामी को अपना भी ज़मीर
पर लगा पाए नहीं दाँव लगाने वाले

जानबख़्सी का मैं एहसान नहीं मानूँगा
मुझको ग़ैरों के लिए छोड़ के जाने वाले

जाने क्यूँ आईना है खाए हुए मुझसे ख़ार
वे भी ग़ाफ़िल हैं थे जो राह पे लाने वाले

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, मई 05, 2017

काश ग़ाफ़िल को कभी भी तो पुकारा होता

कोई दुनिया में न तक़्दीर का मारा होता
हर किसी को जो मुहब्बत का सहारा होता

मैं तेरे नाम की माला न जपा करता यूँ
यार तू मुझको ख़ुदा से जो न प्यारा होता

मान लेता भी के है तुझको मुहब्बत मुझसे
तीर नज़रों का ही सीने में उतारा होता

बाबते इश्क़ मेरी शोख़ तमन्नाओं पर
थे चले संग चला काश के आरा होता

मेरी आवारगी इस तर्ह न बढ़ जाती अगर
तू भले गुल से ही पर खेंच के मारा होता

थोड़ा सा अश्क जो लोगों पे लुटा देता तो
बात पक्की है समंदर न यूँ ख़ारा होता

तू पुकारा तो ज़माने को मगर क्या हासिल
काश ग़ाफ़िल को कभी भी तो पुकारा होता

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, मई 02, 2017

गो निहारी न गई राह मेरी

कैसे कह दूँ के है तनख़्वाह मेरी
आप कहते हैं जिसे आह मेरी

आपके दर पे चला आया हूँ मैं
गो निहारी न गयी राह मेरी

वक़्त मेरा है वहीं गुज़रा जहाँ
एक को भी थी नहीं चाह मेरी

लीजिए पढ़ तो दिया शे’र तमाम
अब तो लौटाइए जी वाह मेरी

थी तो ग़ाफ़िल ही मगर क्या थी ग़ज़ब
हाँ जवानी वो शहंशाह मेरी

-‘ग़ाफ़िल’