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शुक्रवार, जून 23, 2017

मगर उल्फ़त के अफ़साने रहेंगे

आदाब दोस्तो! यह दो शे’र आप सबके हवाले-

सफ़र की राह ही यूँ है के साथ अब
रहेंगे गर तो वीराने रहेंगे
भले ही दुनिया से उठ जाएँ उश्शाक़
मगर उल्फ़त के अफ़साने रहेंगे

-‘ग़ाफ़िल’


गुरुवार, जून 22, 2017

क्यूँ उधर जाऊँ

आदाब अर्ज़ है!

हुस्न भी गो प्यार की है बात करता
पर लगे है बात उसकी दोगली है
और पत्थर सह नहीं पाऊँगा तो फिर
क्यूँ उधर जाऊँ जिधर उसकी गली है

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, जून 15, 2017

तू नज़र भर देख तो ले क्या से क्या हो जाऊँगा

बेवफ़ा मैं आज हूँ कल बावफ़ा हो जाऊँगा
तू नज़र भर देख तो ले क्या से क्या हो जाऊँगा

आ तो मेरे सामने तू सज सँवर कर एक दिन
है सिफ़त मुझमें तेरा मैं आईना हो जाऊँगा

यूँ ही आगे भी सताया तू नहीं मुझको अगर
तुझसे फिर मैं ज़िन्दगी भर को ख़फ़ा हो जाऊँगा

है तुझे क्या इल्म भी रस्मे वफ़ा क्या चीज़ है
खेलना चाहेगा मुझको खेल सा हो जाऊँगा

तू हुआ ग़ाफ़िल अगर मेरी मुहब्बत से कभी
बस उसी ही पल यक़ीनन मैं हवा हो जाऊँगा

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, जून 14, 2017

अब कोई और नशेबाज़ बुलाया जाए

मेरे भी सामने खुलकर कभी आया जाए
आतिशे हुस्न से मुझको भी जलाया जाए

इश्क़बाज़ों को बुरे अच्छे का हो इल्म ही क्यूँ
उनपे अब और न इल्ज़ाम लगाया जाए

क़स्म खा कर ही दिया प्यार की इक रस्म अदा
तू बता और है क्या यूँ भी जो खाया जाए

है किसे होश यहाँ पी के नज़र वाली शराब
अब कोई और नशेबाज़ बुलाया जाए

जो भी ग़ुमराह किया करते हैं वो हैं अपने
यह सबक याद है कुछ और बताया जाए

रहबरी कर तो मैं सकता हूँ अपाहिज़ की भी
शर्त यह है के उसे राह पे लाया जाए

चैन जी को है मिले उसके ही दर ग़ाफ़िल जी
किस बहाने से मगर सोचिए जाया जाए

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, जून 12, 2017

हम्‍माम

हम्‍माम में तो वैसे भी नंगे हैं सभी लोग
हम्‍माम भी कुछ यूँ है न छत है न है दीवार

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, जून 10, 2017

लोग ज्यूँ बैंडबाज़े हुए

आप माना के मेरे हुए
पर हुआ अर्सा देखे हुए

मैं बताऊँ भी तो किस तरह
हादिसे कैसे कैसे हुए

ग़ैरमुम्क़िन है पाना सुक़ूँ
लोग ज्यूँ बैंडबाज़े हुए

मेरा गिरने का ग़म भी गया
आपको देख हँसते हुए

कम नहीं झेलना आपका
शे’र ग़ाफ़िल के जितने हुए

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, जून 05, 2017

चुभी पर मुझे तो तेरी ही नज़र है

जो रुस्वाइयों की हसीं सी डगर है
भला क्यूँ जी उस पर ही ज़ेरे सफ़र है

तेरी याद में आ तो जाऊँ मैं लेकिन
तू फिर भूल जाएगा मुझको ये डर है

हूँ मैं ही तराशा ख़ुदा जो बना तू
अरे संग इसकी तुझे क्या ख़बर है

सबक इश्क़ का बेश्तर याद करना
लगे गोया इसमें ही सारी उमर है

हूँ क़ाइल शबे वस्ल का इसलिए मैं
के यह चुलबुली है भले मुख़्तसर है

ज़माना कहे तो कहे तुझको ग़ाफ़िल
चुभी पर मुझे तो तेरी ही नज़र है

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, जून 01, 2017