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शुक्रवार, अगस्त 18, 2017

निहारा नहीं गया

गो चाँदनी थी मैं थी मेरे रू-ब-रू वो थे
भर आँख उनको फिर भी निहारा नहीं गया

-‘ग़ाफ़िल’


किस्सा गुलाब का

कोठी भी जा चुकी है न कोठे की बात कर
होगा बुरा अब और भी क्या मह्वेख़्वाब का

काँटों से अट चुका है मुसल्सल मेरा लिबास
फ़ुर्सत मिली तो लिक्खूँगा किस्सा गुलाब का

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, अगस्त 17, 2017

तिश्नगी का मगर सिलसिला रह गया

फिर वही का वही फ़ासिला रह गया
तू रहा और मैं देखता रह गया

बारहा क्यूँ तसव्वुर में आता है तू
बोल तेरा यहाँ और क्या रह गया

था गुमाँ रंग लाएगी सुह्बत तेरी
मैं यहाँ भी लुटा का लुटा रह गया

आज की चाल में था उछाल और ही
टूट इक्का गया बादशा रह गया

लज़्ज़ते हिज़्र तारी रही इस क़दर
वस्ल का जोश था जूँ, धरा रह गया

रोज़ की तर्ह फिर गुम मनाज़िल हुईं
शुक्र है पर मेरा रास्ता रह गया

आख़िरी वक़्त पर क्या मुसलमान हों
सोचकर क्यूँ यही मैं जो था रह गया

आह! यह क्या हुआ साथ मेरे ग़ज़ब
मैं गया टूट और आईना रह गया

रू-ब-रू शर्बती चश्म ग़ाफ़िल थे गो
तिश्नगी का मगर सिलसिला रह गया

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, अगस्त 16, 2017

तुझपे इल्ज़ाम लगाएँ तो लगाएँ कैसे

तू ही तो बाइसे रुस्वाई है लेकिन ग़ाफ़िल
तुझपे इल्ज़ाम लगाएँ तो लगाएँ कैसे

-‘ग़ाफ़िल’

मेरा सम्मान अब होने लगा है

ज़रा नुक़्सान अब होने लगा है
कोई नादान अब होने लगा है

किसी के प्यार की बारिश बिना दिल
जूँ रेगिस्तान अब होने लगा है

न जाने क्यूँ, जो आँसू आईना था
वो बेईमान अब होने लगा है

सिफ़त मेरी है या है मर्तबे की
मेरा सम्मान अब होने लगा है

रिवाज़े डांस है, गाना-बज़ाना
बिना सुर-तान अब होने लगा है

ख़याल उम्दा ही ये होगा बरहना
अगर इंसान अब होने लगा है

तसव्वुर से ही तेरे वक़्त ग़ाफ़िल
अहा! आसान अब होने लगा है

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, अगस्त 14, 2017

भला मैं किस तरह ज़िन्दा रहूँगा

मुझे लगता नहीं अच्छा रहूँगा
यूँ तेरे कू में गर आता रहूँगा

अड़ा है तू न मिलने की ही ज़िद पर
न जानूँ मैं के अब कैसा रहूँगा

तू यूँ ही तैरने आता रहे मैं
क़सम से उम्र भर दर्या रहूँगा

भले ही जाम टकराता हूँ शब् भर
मैं तेरी दीद का प्यासा रहूँगा

नसीब अब हो ही जाए हाथ इक दो
तू है बादिश तो मैं इक्का रहूँगा

रहा महरूम गर शिक़्वों से तेरे
भला मैं किस तरह ज़िन्दा रहूँगा

सँवारूँगा मैं किस्मत तेरी ग़ाफ़िल
भले टूटा हुआ तारा रहूँगा

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, अगस्त 12, 2017

क़ुद्रतन गोया मैं गंगाजल रहा हूँ

जिस तरह उल्फ़त में तेरी जल रहा हूँ
क्या कभी इस तर्ह भी बेकल रहा हूँ

ख़ुश हुआ जिसने भी ओढ़ा या बिछाया
हर जनम मैं मख़मली कम्बल रहा हूँ

तू तो इस दर्ज़ा ख़फ़ा है आह मुझसे!
एक पल नज़रों से क्या ओझल रहा हूँ

आग है तू दूर हट ऐ जज़्बा-ए-दिल
बर्फ़ के मानिन्द मैं अब गल रहा हूँ

तू किसी भी तर्ह मेरा हो न पाया
गो तेरी आँखों का मैं काज़ल रहा हूँ

काश! तुझको इल्म हो जाता के मैं ही
तुझमें उल्फ़त का वो कल बल छल रहा हूँ

पीने वाले पी रहे ज्यूँ आबे अह्मर
फ़ित्रतन गोया मैं गंगाजल रहा हूँ

नब्ज़ अपनी की शुरू क्या जाँच करनी
लोग बोले कबका मैं पागल रहा हूँ

वक़्त ने पकड़ाई है जो राह उस पर
रोते हँसते गिरते उठते चल रहा हूँ

भूल जाए लाख तू पर हर दफा मैं
खुरदुरे प्रश्नो का तेरे हल रहा हूँ

देना तो होगा सुबूत अब तुझको ग़ाफ़िल
मैं हूँ सोना क्यूँ कहा पीतल रहा हूँ

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, अगस्त 08, 2017

हमारे चश्म में अब भी लचक है

न यह समझो के बस दो चार तक है
रसूख़ अपना ज़मीं से ता’फ़लक़ है

नशा तारी है पीए बिन यहाँ जो
फ़ज़ाओं में हमारी ही महक़ है

बिछे हैं गुल जो आने की हमारे
हो जैसे भी बहारों को भनक है

तुम्हारी सिम्त हैं नज़रें हमारी
रक़ीबों का तुम्हारे चेहरा फ़क है

एक क़त्आ-

गई दुनिया बदल बस इस सबब ही
हमारे होने में अब हमको शक है
वगरना हम वही हैं थे कभी जो
हमें तो याद अब तक हर सबक है

फ़तह ब्रह्माण्ड हो सकता है ग़ाफ़िल
हमारे चश्म में अब भी लचक है

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, अगस्त 03, 2017

तू मेरा है मुझे लगता नहीं है

जो पहले था बस वो बच्चा नहीं है
न देख अब और मुझमें क्या नहीं है

तेरे दिल की ज़मीं पर इश्क़ हर दिन
मैं बोता हूँ मगर उगता नहीं है

न टपका ख़ूँ न झेला संग इक भी
तू आशिक़ है मगर मुझसा नहीं है

तसव्वुर में गुज़ारी उम्र पर अब
तू मेरा है मुझे लगता नहीं है

तबस्सुम पर तेरे क़ुर्बां थीं रातें
वो तब जूँ था ये अब वैसा नहीं है

उधर रुख़ है तेरे तीरे नज़र का
तू क़ातिल है तो पर मेरा नहीं है

अरे ग़ाफ़िल तग़ाफ़ुल का तेरे अब
मुझे कोई गिला शिक़्वा नहीं है

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, अगस्त 02, 2017

क्या पता दिन है कहाँ रात किधर होती है

तेरे अश्कों की कहाँ मुझको ख़बर होती है
लाख मैं कहता रहूँ बात ये पर होती है

मैं लगा डालूँगा फिर अपने हर इक इल्मो फ़न
ये तेरी ज़ुल्फ़ किसी तर्ह जो सर होती है

तज़्किरा आज ही क्यूँ फ़र्च बयानी पे मेरी
ऐसी नादानी तो याँ शामो सहर होती है

सोचता हूँ के मेरा हाल भला क्या होगा
नाज़नीना तू अगर ज़ेरे नज़र होती है

एक बंजारे का मत पूछ ठिकाना, अपना
क्या पता दिन है कहाँ रात किधर होती है

ख़ाक तो डाल दिया मैंने ज़फ़ाई पे तेरी
दिल में रह-रहके मेरे टीस मगर होती है

होनी तो है ही किसी रोज़ फ़ज़ीहत अपनी
फ़र्क़ क्या आज ही ग़ाफ़िल जी अगर होती है

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, अगस्त 01, 2017

आशिक़ी

आदाब दोस्तो!

मैं हूँ आशिक़ शे’र लिखना शाइरों का है शगल
मैंने तो बस वह लिखा है जो लिखाई आशिक़ी

पास होना था, हुआ, पर कैसे बतलाऊँ मुझे,
कब, कहाँ, किस तर्ह, कितना आज़माई आशिक़ी

-‘ग़ाफ़िल’