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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Saturday, March 17, 2018

ऐंठे ऐंठे हुए तेवर नहीं देखे जाते

रुख़ पे उल्फ़त के जो जेवर नहीं देखे जाते
आईने ऐसे भी शब भर नहीं देखे जाते

देखा जाता है महज़ उड़ता है कितना कोई
उड़ने वालों के कभी पर नहीं देखे जाते

ये ही क्‍या कम है के हो जाते हैं जी को महसूस
आप इस तर्फ़ तो अक़्सर नहीं देखे जाते

हो तबस्सुम जो लबों पर तो बने बात भी कुछ
ऐंठे ऐंठे हुए तेवर नहीं देखे जाते

आओ क्यूँ हम भी न इस जश्न में शामिल हो लें
खेल अब इश्क़ के छुपकर नहीं देखे जाते

आएगी वस्ल की शब अपनी भी क्या ग़ाफ़िल जी
आप तो अपने से बाहर नहीं देखे जाते

-‘ग़ाफ़िल’

1 comment:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, १७ मार्च - भारत के दो नायाब नगीनों की जयंती का दिन“ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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