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Wednesday, November 04, 2020

न हो गर आईना सूरत कभी अपनी नहीं दिखती

हैं कहते लोग अब वो तेरी गुस्ताख़ी नहीं दिखती
कहें कैसे हम उनसे यह के हमको भी नहीं दिखती

हमारा क़त्ल करने वाला हमको दिख तो जाता है
मगर नज़रों की थी जो अब वो जासूसी नहीं दिखती

न जाने क्या हुआ है आजकल सारे नज़ारों को
तबीयत है हमारी जैसी वो वैसी नहीं दिखती

हमारी याद अपने साथ रक्खो फ़ाइदा होगा
न हो गर आईना सूरत कभी अपनी नहीं दिखती

भरम होता था ग़ाफ़िल यह के क्या रक्खें किसे छोड़ें
चमन में ख़ुश्बुओं की तब सी रा’नाई नहीं दिखती

-‘ग़ाफ़िल’

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