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रविवार, नवंबर 30, 2014

कम तो नहीं हैं

रुख़ यूँ भी सजाने केे हुनर कम तो नहीं हैं
रुख़सार पे अश्कों केे गुहर कम तो नहीं हैं

सैलाब भी हो प्यास भी जिस राहेगुज़र ही
यूँ चश्‍मेख़ुसूसी भी इधर कम तो नहीं हैं

-‘ग़ाफ़िल’

5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत उन्दा अशहार |अच्छी रचना |
    आशा

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  2. सुंदर प्रस्तुति...
    मुझे आप को सुचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी का लिंक 05-07-2013 यानी आने वाले शुकरवार की नई पुरानी हलचल पर भी है...
    आप भी इस हलचल में शामिल होकर इस की शोभा बढ़ाएं तथा इसमें शामिल पोस्ट पर नजर डालें और नयी पुरानी हलचल को समृद्ध बनाएं.... आपकी एक टिप्पणी हलचल में शामिल पोस्ट्स को आकर्षण प्रदान और रचनाकारोम का मनोबल बढ़ाएगी...
    मिलते हैं फिर शुकरवार को आप की इस रचना के साथ।



    जय हिंद जय भारत...


    मन का मंथन... मेरे विचारों कादर्पण...

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