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गुरुवार, अगस्त 17, 2017

तिश्नगी का मगर सिलसिला रह गया

फिर वही का वही फ़ासिला रह गया
तू रहा और मैं देखता रह गया

बारहा क्यूँ तसव्वुर में आता है तू
बोल तेरा यहाँ और क्या रह गया

था गुमाँ रंग लाएगी सुह्बत तेरी
मैं यहाँ भी लुटा का लुटा रह गया

आज की चाल में था उछाल और ही
टूट इक्का गया बादशा रह गया

लज़्ज़ते हिज़्र तारी रही इस क़दर
वस्ल का जोश था जूँ, धरा रह गया

रोज़ की तर्ह फिर गुम मनाज़िल हुईं
शुक्र है पर मेरा रास्ता रह गया

आख़िरी वक़्त पर क्या मुसलमान हों
सोचकर क्यूँ यही मैं जो था रह गया

आह! यह क्या हुआ साथ मेरे ग़ज़ब
मैं गया टूट और आईना रह गया

रू-ब-रू शर्बती चश्म ग़ाफ़िल थे गो
तिश्नगी का मगर सिलसिला रह गया

-‘ग़ाफ़िल’

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (18-08-2017) को "सुख के सूरज से सजी धरा" (चर्चा अंक 2700) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    स्वतन्त्रता दिवस और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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