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बुधवार, अक्तूबर 16, 2019

अब किधर है वो गली याद नहीं

कोई नाज़ुक सी कली याद नहीं
कब थी पुरवाई चली याद नहीं

हुस्न ये सच है तेरी ख़्वाहिश कब
मेरी आँखों में पली याद नहीं

जब गुज़रता रहा वक़्त और था वह
अब किधर है वो गली याद नहीं

हिज्र तो याद है पर वस्ल की रात
आई कब और ढली याद नहीं

गो मैं ग़ाफ़िल हूँ नहीं इश्क़ की पर
आग थी कैसे जली याद नहीं

-‘ग़ाफ़िल’