फ़ेसबुक पर अनुसरण करें-

मेरी फ़ोटो

मेरे बारे में अधिक जानने के लिए यहाँ क्लिक करें

बुधवार, मई 16, 2018

जो कुछ भी बरसे मेरे यहाँ बेहिसाब बरसे

जनाब की अंजुमन में कुछ पल गुलाब बरसे
पता नहीं क्यूँ बुरी तरह फिर जनाब बरसे

हो तेरी नफ़्रत के मेरे मौला हो तेरी रहमत
जो कुछ भी बरसे मेरे यहाँ बेहिसाब बरसे

कभी तो ऐसा भी हो के मुझ पर तेरी नज़र हो
मगर न आँखों से तेरी उस दम अज़ाब बरसे

हसीं दिलों की पनाह मुझको हुई मयस्सर
फ़लक़ से यारो अब आग बरसे के आब बरसे

न पा सकेगी मक़ाम ग़ाफ़िल तेरी ये हसरत
के कुछ किए बिन ही तेरे बाबत सवाब बरसे

-‘ग़ाफ़िल’