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ग़ाफ़िल

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Babhnan, Gonda, Uttar Pradesh, India

Saturday, December 29, 2018

लोग आते जाते हैं

फ़र्क़ क्या करे कोई ऐसे पल भी आते हैं
वर्क़ कौंधती है या आप मुस्कुराते हैं

बात एक ही तो है यह के राहे उल्फ़त में
लुत्फ़ मुझको आ जाए आप या के पाते हैं

सच तो है जो लगता है दिल सराय सा अपना
देखता हूँ कितने ही लोग आते जाते हैं

उसकी अपनी ख़ूबी है हिज़्र को न कम आँको
जी से पास हैं जो सब दूरियों के नाते हैं

मानता हूँ ग़ाफ़िल हूँ है अक़ूबदारी पर
क्यूँ कहूँ के आप इतना क्यूँ मुझे बनाते हैं

-‘ग़ाफ़िल’

Saturday, December 22, 2018

प्यार हिस्से में मेरे आपका इतना आया

याद हो या के न हो नींद में क्या क्या आया
हाँ मगर ये है मुझे ख़्वाब सुहाना आया
मैं दबा जाता रहा ख़ुश्बुओं के बोझ तले
प्यार हिस्से में मेरे आपका इतना आया

-‘ग़ाफ़िल’

Thursday, December 20, 2018

आनी जानी है ज़िन्दगानी पर

गो ख़ुदा की है मिह्रबानी पर
यूँ भी इतरा नहीं जवानी पर
हाँ तमाशा रहेगा दुनिया का
आनी जानी है ज़िन्दगानी पर

-‘ग़ाफ़िल’

Tuesday, December 18, 2018

आखि़री पल बचा वस्ल का है

है यहाँ या वहाँ फ़र्क़ क्या है
ज़िन्दगी का यही फलसफा है

आज रंगीं है अपनी तबीयत
आज तो ज़ह्र भी बा-मज़ा है

हुस्न तो हुस्न है उसकी बाबत
क्या हुआ कोई क्या सोचता है

ला पिला अब तो साक़ी मये लब
आखि़री पल बचा वस्ल का है

कोई हरक़त न हो गर ज़रा भी
सोचिए इश्क़ में क्या रहा है

हुस्न वालों की है राय अपनी
इश्क़ है क्या नहीं और क्या है

तो हुआ क्या है गर नाम ग़ाफ़िल
देखिए आदमी वह भला है

-‘ग़ाफ़िल’

Sunday, December 09, 2018

हाँ तेरा साथ निभाने की सज़ा पाएँगे

दो क़त्आ-

1-
लोग तो आते हैं जाते हैं चले राज़ी ख़ुशी
हम हैं जो तेरे सू आने की सज़ा पाएँगे
इल्म तो है ही के हो और भी कुछ या के न हो
हाँ तेरा साथ निभाने की सज़ा पाएँगे

-‘ग़ाफ़िल’

2-
गो पता है के हम आएँगे तेरे दर पे अगर
तेरी नफ़रत के सिवा और भी क्या पाएँगे
टूट जाएँगे न पाएँगे अगर तुझसे वफ़ा
क्या हुआ हम जो ज़माने से वफ़ा पाएँगे

-‘ग़ाफ़िल’

Saturday, December 08, 2018

मुलाक़ात अपनी है ये आख़िरी क्या

जो कहना है कहेंगे आप ही क्या?
पता है क्या, है क्या नेकी बदी क्या??

नहीं है धड़कनों पर इख़्तियार आज
मुलाक़ात अपनी है ये आख़िरी क्या

शबो रोज़ उसका ही करना तसव्वुर
न है गर बंदगी है बंदगी क्या

हुई जाती है अहले दुनिया दुश्मन
हमारे पास है ज़िंदादिली क्या

कहे क्यूँ आपबीती उससे ग़ाफ़िल
कभी गुज़री है उसपे तीरगी क्या

-‘ग़ाफ़िल’

Wednesday, December 05, 2018

फिर भी ग़ाफ़िल मेरे सर इल्ज़ाम आया

बारहा होंटों पे तेरा नाम आया
टोटका ये भी कुछ अपने काम आया

आ गईं ख़ुशियाँ जहाँ की मेरे हिस्से
जब तसव्वुर में मेरा गुलफ़ाम आया

आ नहीं सकता था मेरा जिस्म लेकिन
जी मेरा सू तेरे सुब्हो शाम आया

है नहीं जिसको सलीक़ा मैक़दे का
जाने क्यूँ उसके ही नामे जाम आया

गो किया तूने ही था इज़्हारे उल्फ़त
फिर भी ग़ाफ़िल मेरे सर इल्ज़ाम आया

-‘ग़ाफ़िल’

लगती है राहे ख़ुल्द भी क्यूँ पुरख़तर मुझे

है बाख़बर जताए वो यूँ बेख़बर मुझे
गोया है रू-ब-रू ही बुलाता है पर मुझे

जैसे भी और जो भी मेरा हश्र हो वहाँ
आना है तेरे दर पे सितमगर मगर मुझे

मुट्ठी की रेत और मैं दोनों हैं हममिज़ाज
वैसे ही कोई रोज़ है जाना बिखर मुझे

आया कभी क़मर है भला क्या किसी के हाथ
ढूँढे फिरे हो आप जो शामो सहर मुझे

ग़ाफ़िल जी दर्द देती है शीरीं ज़ुबाँ भी क्या
लगती है राहे ख़ुल्द भी क्यूँ पुरख़तर मुझे

-‘ग़ाफ़िल’

Monday, December 03, 2018

जो कल थी वही आज है ज़िन्दगी

बड़ी ही कलाबाज है ज़िन्दगी
नुमा तो है पर राज़ है जिन्दगी

अजल तू है मंज़िल ये सच है मगर
कहाँ तेरी मुह्ताज़ है ज़िन्दगी

है बदला ज़ुरूर आज अंदाज़ पर
जो कल थी वही आज है ज़िन्दगी

मुझे नाज़ फिर भी है उस पर बहुत
भले ही दगाबाज है ज़िन्दगी

हक़ीक़त यही है के है ख़ुशनुमा
हुआ क्या जो नासाज है ज़िन्दगी

कोई सुन ले कोई नहीं सुन सके
कुछ ऐसी ही आवाज़ है ज़िन्दगी

जो ग़ाफ़िल हो ख़ुद से कुछ इस तर्ह के
परिंदे की परवाज़ है ज़िन्दगी

-‘ग़ाफ़िल’